Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
सब बातों पर ध्यान न देना
हर निंदा को कान न देना
इक पल की इच्छा पूरी कर
इक युग को अपमान न देना
धोबी ने कब आकर पूछा हाल अकेले राम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का
जग की निंदा से चिंतित हो, कोख जने को तज दोगे क्या
रश्मिरथी के उज्ज्वल पथ पर, मन भर पीड़ा रच दोगे क्या
वह पग-पग अपमान सहेगा जीवन भर चुपचाप दहेगा
किसके पापों से पीड़ित है इस सच से अनजान रहेगा
कुन्ती का मन दुःख झेलेगा, इस भीषण संग्राम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का
माता का आदेश सुना तो भिक्षा सम बाँटी पांचाली
अपनी चूक निभाने भर को, उस बेचारी को दी गाली
एक कथन को नहीं सुधारा इक नारी के मन को मारा
फिर उसका भी बीच सभा में वेश्या कहकर नाम पुकारा
इस पल में ही बीज पड़ा था, कुल के पूर्णविराम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का
कैकयी की हठ पूरी करके, ख़ुशियों को जंगल मत भेजो
झूठी शान दिखाना छोड़ो, जीवन भर का हर्ष सहेजो
कोई लौटे नाक कटाकर कोई मारे ध्यान बँटाकर
पूरा कुल अर्पण मत करना इक पल का आवेश दिखाकर
शूर्पनखा से कारण पूछो, लंका के परिणाम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
सारे ही सुख थे बगिया में, फिर क्यों तुमने पीर चुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
क्या तुमने भी महसूसा है, एकाकी हो जाना जग में
क्या तुमने जी भर भोगा है, सब अपने खो जाना जग में
क्या तुमने भी भावुकता को लुट कर मरते देख लिया है
क्या तुमने भी अपनेपन का रंग उतरते देख लिया है
क्या तुमने भी जान लिया है अपने ही घर में शकुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
सच बतलाओ क्या तुमने भी चेहरा देखा है रिश्तों का
मुरझाने के बाद कभी क्या सेहरा देखा है रिश्तों का
क्या तुमने भी हर उत्सव के अगले पल सन्नाटा झेला
दिल के व्यापारों का दुनिया की मंडी में घाटा झेला
कोमलता की देह धुने बिन किन कंधों की शॉल बुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सपनों की आँखें पथराईं
हिम्मत की पाँखें कुम्हलाईं
संघर्षों की तेज पवन ने
प्राणों की शाखें दहलाईं
इन सारे झंझावातों से लोहा लिया ज़मीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
राजतिलक की शुभ वेला में राघव को वनवास मिला
स्वर्ण जड़ित आभूषण उतरे, जंगल का संत्रास मिला
लक्ष्मण, वैदेही, रघुराई
और न कोई संग सहाई
इतनी पीर सही तीनों ने
विधिना की आँखें भर आईं
फिर भी कब आँसू छलकाए, पुरुषोत्तम रघुबीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
किष्किंधा के द्वार खुले थे, किन्तु न नगर प्रवेश किया
निज अनुशासन की सीमा में, जीवन सकल निवेश किया
रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्राण जाएँ पर वचन न जाई
दशकंधर से लंका जीती
और विभीषण को लौटाई
तीरों से कब मोह किया है, वीरों के तूणीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
हर चर्चा का सार बने हैं, जन-जन के अभिवादन हैं
आशा का आधार बने हैं, हर सम्भव के साधन हैं
केवट ने ली जो उतराई
शबरी जो झोली भर लाई
जो पूंजी जोड़ी रघुपति ने
उसकी चमक युगों पर छाई
सबकी दौलत ओछी कर दी, राघव की जागीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Purushottam
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
दुनिया के ऐरे-ग़ैरे फरमानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
रोज़ी-रोटी के पचड़ों में उम्र गँवाने वाले लोग
दिल की भाषा भूल चुके हैं अक्ल चलाने वाले लोग
पैसा-पैसा करते इन नादानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
लानत की कुछ फिक्र नहीं है, तारीफ़ों की चाह नहीं
दुनिया वाले क्या सोचेंगे अब इसकी परवाह नहीं
कभी-कभी आने वाले मेहमानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
एक झलक पर दुनिया को कुर्बान किया जा सकता है
सब कुछ खोकर मिलने का अरमान जिया जा सकता है
दिल की सुनने वाले हम धनवानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
इश्क़ बरसता है तो हर मौसम सावन हो जाता है
प्यार अगर सच्चा हो तो फिर मन पावन हो जाता है
ईटू-मीटू जैसे इन अभियानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
✍️ चिराग़ जैन