याचक और साधक
कहीं मन्नत के धागे बांध कर आने नहीं पड़ते
किसी लालच से अपने तीर्थ फुसलाने नहीं पड़ते
हमारे देव बिन मांगे ही देते हैं हमें सब कुछ
हमें कुछ मांगने को हाथ फैलाने नहीं पड़ते
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Jainism, Muktak, Poetry
कहीं मन्नत के धागे बांध कर आने नहीं पड़ते
किसी लालच से अपने तीर्थ फुसलाने नहीं पड़ते
हमारे देव बिन मांगे ही देते हैं हमें सब कुछ
हमें कुछ मांगने को हाथ फैलाने नहीं पड़ते
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
भाग्य की सारी लकीरें, मोड़ने की राह में हूँ
मैं अभी दिन-रात केवल, एक ही परवाह में हूँ
इस समर के बीच में ही
तुम अचानक छूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना
ग्रहदशा बिगड़ी हुई है, इसलिए कुछ अस्त हूँ मैं
पीर को गाता नहीं हूँ, ये न समझो मस्त हूँ मैं
बस किसी दुर्भाग्य के अंधे कुएँ में आ गिरा हूँ
बस इसी अंधे कुएँ को भेदने में व्यस्त हूँ मैं
तुम कहीं इस व्यस्तता से
त्रस्त होकर रूठ मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना
यह प्रतीक्षा का मरुस्थल, तप रहा है, जानता हूँ
एक पत्थर मौन मुझको जप रहा है, जानता हूँ
जानता हूँ उठ रहा है प्रश्नचिन्हों का बवंडर
और तुम्हारा मन निरन्तर कँप रहा है जानता हूँ
इस बवंडर में बिखर कर
स्वप्न सारे लूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना
चाहतों की बढ़ रही चिंघाड़ में उतरा हुआ हूँ
विष भरे काँटे चुभे हैं, झाड़ में उतरा हुआ हूँ
दृष्टि तुम पर है, नदी का वेग बढ़ता जा रहा है
बस तुम्हारे ही भरोसे बाढ़ में उतरा हुआ हूँ
अब किसी कच्चे घड़े सम
बीच धारा, फूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिन डेरों ने उत्सव पूरा था रैना के आँचल में
भोर उन्हीं डेरों पर इक वीराना पाती है
अंधियारे में जीवन सबका रंग-रंगीला लगता है
पहली किरण उदासी का अफ़साना पाती है
जिनके बिन हर महफ़िल का सिंगार अधूरा होता है
उन फूलों का गुच्छा सुबह केवल घूरा होता है
जिसके दम पर महफ़िल अपना सिर ऊँचा कर लेती है
वो सब कुछ सुबह होने तक चूरा-चूरा होता है
झूठे रंग उतर जाते हैं रात गुज़रने से पहले
भोर महज सच का बदरंग ख़ज़ाना पाती है
साज पड़े होते हैं लेकिन सुर थक कर सो जाते हैं
देह पड़ी रह जाती है और प्राण कहीं खो जाते हैं
जिनका आकर्षण था उनसे दिल घबराने लगता है
जश्न सुबह की क्यारी में इक सन्नाटा बो जाते हैं
रात जवानी की बाँहों में रास रचाती फिरती है
और सुबह रंगरलियों से उकताना पाती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
मरने की चाह, ज़िन्दगी जीने से कम रही
लहरों की चाल मेरे सफ़ीने से कम रही
दौलत की चमक सबसे ज़ियादा रही मग़र
मजदूर के माथे के पसीने से कम रही
सेहरा की तेज़ धूप में भी तिश्नगी तो थी
पर हिज्र में सावन के महीने से कम रही
ताउम्र मैं ख़ुशी की शक्ल भूल न पाया
आफ़त भी मेरे पास क़रीने से कम रही
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया
आज समझ आया चूड़ी बिन
कैसे कंगन जी पाया
जिस पल मथुरा का आकर्षण वृंदावन से ज़्यादा था
कर्तव्यों का मोह किसी को अपनेपन से ज़्यादा था
निर्णय ले बैठा निर्मोही, बिरहन याद नहीं आई
दाँतों ने अधरों को काटा, नयनों में लाली छाई
आज तुम्हारा निर्णय सुनकर
राधा का मन जी आया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया
राघव स्वयं नहीं सक्षम थे, जो सच्चाई कहने में
वैदेही पर क्या बीती थी, वो सच्चाई सहने में
जब लक्ष्मण वन में ले जाकर, सीता को बतलाते हैं
उस पल सिय के मन में क्या क्या, भाव उमड़कर आते हैं
पाँव जमे, आँखें पथराईं
ख़ुद का तर्पण जी आया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया
आंधी से मिलकर जब अमुआ, बौर गिराने लगता है
तब सहमी सहमी कोयल का, मन घबराने लगता है
अब समझा जब कोहरे में छुप सूरज को बिसराते हैं
तब इन हरियाले पेड़ों से पत्ते क्यों झड़ जाते हैं
आज अचानक मैं मन ही मन
रूठा सावन जी पाया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी पाया
✍️ चिराग़ जैन