Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
गणेश… बुद्धि के अधिपति।
गणेश… रिद्धि-सिद्धि के स्वामी।
गणेश… शुभ-लाभ के पिता।
गणेश… संतोषी के जनक।
भारतीय पौराणिक साहित्य में गणेश अद्वितीय हैं। गणेश जी को लेकर जो प्रतीक विधान गढ़ा गया है वह लक्षणा नहीं, विलक्षण है।
पाराशर ऋषि के आश्रम को विनष्ट करने वाले मूषक को ‘कुतर्क’ का प्रतीक मानकर ‘बुद्धि’ के देव द्वारा उसको परास्त करने की कथा, चातुर्य तथा हास्यबोध से परिपूर्ण है। पराजित मूषक अपने विजेता गणेश से कहता है कि वर मांगो। उसकी इस धृष्टता पर गणेश क्रुद्ध नहीं होते, अपितु हँस पड़ते हैं। क्रोध आ गया होता तो वध कर दिया होता मूषक का। किंतु बुद्धि के अधिपति हैं, सो क्रुद्ध न हुए… खिलखिला उठे। मूषक की धृष्टता को एक खिलखिलाहट से ओछा बना दिया। मूषक आश्वस्त रहा होगा कि मैं ऐसा अनापेक्षित आचरण करूंगा तो क्रोध आ ही जाएगा। लेकिन गणेश ने उसके अनुमान को असत्य कर दिया। और इतना ही नहीं, उससे वर भी मांग लिया। और वर भी ऐसा जिसका कुतर्की को अनुमान तक नहीं हो सकता। लेकिन गणेश बुद्धिमान हैं। वे कुतर्की को कुतर्क से घेरने में निष्णात हैं। वे मूषक की धृष्टता से क्रुद्ध होकर उस पर वार करने की बजाय उस पर सवार हो जाने का वर मांग लेते हैं। यह कथा हमें यह सिखाना चाहती है कि यदि शत्रु अपनी धूर्त बुद्धि की क्षमता से तुम्हें परास्त करना चाहे तो तुम अपनी बुद्धिमत्ता से उसे उसकी हीनता का बोध करा दो। गणपति ने धूर्त हुए जा रहे मूषक को तुरंत उसकी काया की क्षुद्र अवस्था याद दिला दी और हमेशा के लिए उसके ऊपर सवार हो गए।
गणपति स्वयं में एक प्रेरणा हैं। प्रत्येक असंभव को सम्भव बना देने का उपाय हैं। गणेश से जुड़ी प्रत्येक कथा सतर्क और सविवेक हो जाने का आह्वान है। समान्य नियमों के पार जाकर जीवन की संभावना तलाशने का मार्ग हैं गणेश। परिस्थिति का सम्मान करते हुए स्वयं को ढाल लेने का कौशल हैं गणेश।
गणपति अपने इसी गुण के कारण प्रथम पूज्य हैं। कैसा भी आयोजन हो, कैसा भी विधान हो, कैसी भी आवश्यकता हो… गणेश तो एडजस्ट हो ही जाएंगे। बाकी देवताओं को निमंत्रण देने से पूर्व अवसर का विचार करना पड़ेगा। बाकी सब देवता प्रकृतिस्थ हैं किंतु गणेश प्रकृत्यातीत हैं। वे हेय से सृजित हैं। वे मानव देह पर पशु का सिर सम्भव कर लेते हैं। वे मोदक भी खाते हैं और उन्हें दूर्वा भी प्रिय है। वे अद्भुत हैं। वे अद्वितीय हैं। वे यंत्रवत महाभारत लिखकर एक ऐसे भाव का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें लेखक अपनी बुद्धि, अपने विचार, अपनी सोच का हस्तक्षेप किए बिना चिंतक के आशुलिपिक बनना सम्भव हो सके।
गणपति का रूप एक जीवन शैली का दर्शन है। गणपति स्थापना से विसर्जन तक की सम्पूर्णता हैं। गणपति अनन्त हैं, यही कारण है उनका जाना भी उनके आने की आशा जगाता है। इसीलिए हम गणपति को यह कहकर विदा करते हैं कि ‘अगले बरस तू जल्दी आ!’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
एक वर्ष पूर्ण हो गया। आज ही के दिन सुबह दस बजे अपने घर को और घर के दरवाज़े पर खड़ी माँ को जी भरकर निहारने के बाद मैं अस्पताल पहुँच गया था। मेदांता के एक बेड पर मेरा नाम लिख दिया गया था। हाथ पर एक पट्टा बांध दिया गया था, जिसके रहते अस्पताल की अनुमति के बिना सशरीर उस परिसर से बाहर निकलना सम्भव नहीं था।
डॉ अनिल भान ने मेरी रिपोर्ट्स देखकर अगले ही दिन ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। अगले दिन ऑपरेशन हो जाए इसके लिए अच्छी-ख़ासी रक़म एडवान्स जमा करनी थी। उस पर भी तकनीक का तुर्रा ये कि अस्पताल केवल क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ही राशि स्वीकार करता था। लाखों रुपये यकायक क्रेडिट कार्डस से भुगतान करने के लिए मेरा परिवार एक-एक संपर्क को फोन करने में जुट गया।
अस्पताल प्रशासन को अनुभव था कि जिसका मरीज़ जीवन-मृत्यु के बीच जूझ रहा हो वह पैसा जुटा ही लेगा। सो, परिवारवालों को उनके संघर्ष के भरोसे छोड़कर मेरी आवश्यक जाँच कराने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। व्हीलचेयर पर बैठकर मैं विभाग दर विभाग भटकता रहा। हाथों में इतनी बार सूई चुभ चुकी थी कि अब दर्द होना बंद हो गया था।
परिवार का जो सदस्य मेरे साथ इस परीक्षण-पर्यटन में उपस्थित होता, वह बाहर चल रही आर्थिक कवायद को छुपाने का भरसक प्रयास करता लेकिन भय से भीगी आँखों में उत्पन्न झुंझलाहट में मैं वह सब पढ़ पा रहा था।
मेरी दोनों बहनों और बहनोई ने धरती-अम्बर एक करके रात 2 बजे तक अस्पताल की पेमेंट क्लियर कर दी। इस संघर्ष से पार पाकर जब छोटी बहन मेरे पास आई तो मुझे एंजियोग्राफी के लिए ले जाया जा रहा था। सुबह जिस भाई को स्मार्ट कपड़ों में भर्ती कराया था उसे अस्पताल के ढीले ढाले कपड़ों में नलियों से घिरा देखकर उसके चेहरे का रंग उतर गया। मुझसे नज़रें मिलीं तो अलक तक चढ़ आए आँसू को भीतर धकेलने की हिम्मत दिखाते हुए बोली- ‘सब फिट हो गया, डॉक्टर ने कहा है कल ऑपरेट हो जाएगा। सारे टेस्ट परफेक्ट हैं।’
मैं भी अपने हिस्से का अभिनय करता हुआ हामी भरकर एंजियोग्राफी के लिए चल पड़ा। सुबह से उपवास पर था, और उस पर परीक्षण की भागदौड़ के कारण सामने खड़ी मृत्यु से भयभीत होने की फुर्सत ही नहीं मिली।
जब भी कोई नर्स या डॉक्टर इंजेक्शन लेकर आता तो मैं ‘मंटो’ की ‘खोल दो’ कहानी याद करके हँसते हुए दोनों हाथ आगे कर देता था। अस्पताल के भीतर समय का भान ग़ायब हो गया था।
थकान जब तनाव से लिपट कर सो रही थी, तब मुझे यह सोचने की मोहलत मिली कि शायद अपना सफ़र यहीं तक का था। यह बात सोचकर घबराने ही वाला था कि किसी ने कान में कहा- ‘मूर्ख, विचलित क्यों होता है। यही तो विवेक की परीक्षा है। विपरीत परिस्थिति में सहज रह सके तभी तो पता चलेगा कि स्थितप्रज्ञ क्या होता है।’ नज़र घुमाकर देखा तो कमरे में कोई नहीं था। शायद मैं ख़ुद से बात कर रहा था।
‘समस्या को स्वीकार कर लेना समाधान की ओर पहला क़दम है। जो होगा देखा जाएगा, तू बस इस पूरी प्रक्रिया को साक्षीभाव से देख। अगर जिवित बच गया तो यह अनुभव तेरे सृजन को प्रभावी बना देगा।’
मैंने आँख खोली तो नीले कपड़े पहने एक नर्स अपनी पूरी जान लगाकर मेरे हाथ पर एक पट्टी कस रही थी। कलाई पर जहाँ एंजियोग्राफी का कट लगा था, उस हिस्से पर बिटाडीन जैसी कोई दवाई पुती हुई थी और एक सख़्त-सी चीज़ से कटी हुई नस को दबाकर बहुत टाइट पट्टी बांध दी गई थी। वह सख़्त चीज़ लगातार हाथ को पीड़ा पहुँचा रही थी। पीड़ा का अभ्यास करते हुए जाने कब मुझे नींद आ गई। सुबह आँख खुली तो पूरी कलाई पर नील पड़ गया था। समान्य स्थिति में इतना गहरा नील दिखता तो चिन्ता हो जाती, लेकिन अब एक बड़ी समस्या सामने थी इसलिए इस नील से कोई भय उत्पन्न नहीं हुआ।
कलाई लगातार दुःख रही थी। लेकिन मैं इस प्रक्रिया के अधिकतम कष्ट को स्वीकार कर चुका था, सो यह पीड़ा मेरी भंगिमा को प्रभावित नहीं कर पा रही थी। मुझे समझ आ गया था कि यह जो कुछ हो रहा है इसका न तो कारण मैं हूँ, न ही इसका निवारण मेरे पास है। इसलिए क्षोभ, करुणा, पीड़ा जैसा कोई भाव मुझे स्पर्श नहीं कर पाता था। सृजन का भरपूर सुख भोगा था इसलिए जीवन से कोई शिक़ायत भी नहीं थी। वैभव और सांसारिक कष्ट ख़ूब भोगे थे इसलिए कोई अधूरी इच्छा भी याद नहीं आ रही थी। माता-पिता के बुढ़ापे को सोचकर पलकें भीगी ज़रूर, लेकिन अपनी बहनों के समर्पण और विश्वास का सम्मान रखने के लिए नयन कोर को आँसू के भार से बचाए रखा।
बच्चे याद आए तो भी मन को यह कहकर समझा लिया कि वे अपनी ‘माँ’ के संरक्षण में हैं, इसलिए मेरा अभाव झेल जाएंगे।
मेरी दोनों बहनें और बहनोई मुझे यमराज से छीन लाने की सावित्री साधना कर रहे थे। माँ घर पर रहकर इस संशय से जूझते हुए सबका खाना बनाकर भेजती रही और पिताजी मेरी तरह निःशब्द होकर इस घड़ी के बीत जाने की बाट जोहते रहे।
नर्स ने बताया, पेशेंट को सर्जरी के लिए ले जाना है। जो बहनें इस घड़ी के लिए कल रात तक पैसा जुटा रही थीं, उनका मौन चीख पड़ा। कुछ ही मिनिट बाद मैं सब अपनों से दूर प्री-ओटी में था। यहाँ एक बार फिर ब्लड प्रेशर और स्ट्रेस लेवल की जाँच की गई। रिपोर्ट का हर आँकड़ा परफेक्ट था। मेरी देह और मेरा मानस शल्यक्रिया के लिए तैयार था।
एनेस्थीसिया के डॉक्टर ने मुझे पहचान लिया। वह टीवी पर मुझे देख चुका था। उसने बातचीत करनी शुरू की और मेरी सहजता को और निश्चिंत कर दिया।
मुझे व्हीलचेयर पर बैठकर ऑपरेशन थियेटर तक चलने को कहा गया लेकिन मैंने अनुरोध करके अपने पैरों पर चलकर जाना चाहा। हल्की सी ना-नुकर के बाद डॉक्टर ने मेरा अनुरोध मान लिया। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं इस महत्वपूर्ण सफ़र को अपने पैरों से तय करना चाहता था।
मुझे अच्छी तरह याद है, ओटी की ओर जाते समय डॉ भान ने एक दरवाज़े में से झाँककर कहा था- ‘चलो कवि जी, आपसे दिल खोलकर मिलते हैं।’
मुझे उनका हास्यबोध अच्छा लगा। ओटी में स्ट्रेचर पर लेटते ही डॉक्टर्स की एक फौज ने मेरे स्ट्रेचर को घेर लिया। सब तेज़ी से अपने अपने काम में जुट गए। मेरे शरीर पर अलग-अलग नलियाँ लगने लगीं, तरह-तरह की मशीनों से मुझे जोड़ दिया गया। मेरठ के एक डॉक्टर साहब ने मुझसे कविता सुनाने का आग्रह किया। मैं थोड़ा घबराया हुआ था सो उन डॉक्टर साहब की शक्ल देखने लगा। वे मेरी मनोदशा भाँप गए और बोले, चलो मैं सुनाता हूँ। उन्होंने रश्मिरथी का शांतिपर्व पढ़ने की शुरुआत की। …सह धूप घाम पानी पत्थर …पाण्डव आए कुछ और निखर …मेरा भय विलुप्त हो गया। मुझे लगा कि यह शल्यक्रिया मृत्यु की ओर नहीं ब्लकि एक निखरे हुए जीवन की ओर ले जा रही है। मेरी मनोदशा सकारात्मक हो गई।
क्षण भर में मैंने महसूस किया कि देशभर में मेरे अपने मेरे जीवन की दुआ कर रहे हैं। सुरेन्द्र जी, अरुण जी, मनीषा, प्रवीन, देवदत्त, सुष्मीत, पँवार जी… इन सबसे तो मेरी बात हुई थी। सभी की आवाज़ में स्नेहसिक्त चिंता थी। जब इतने सारे लोग चिन्ता करने के लिए उपस्थित हैं तो मैं क्यों चिन्ता करूँ। मैंने रश्मिरथी के पाठ में अपना स्वर मिला दिया। …मुझमें विलीन झंकार सकल …मुझमें लय है संसार सकल …अमरत्व फूलता है मुझमें …तभी मेरी काया में सूई चुभी और मेरी चेतना लुप्त हो गयी।
इसके बाद किसी ने मेरे गाल थपथपाते हुए मेरा नाम पुकारा। मैंने आँखें खोलीं तो नाक, मुँह और पेट में अलग-अलग तरह की नलियाँ लगी थीं। गाल थपथपाने वाले व्यक्ति ने पूछा- ‘कुछ पिछला याद है?’ मैंने वेंटिलेटर लगे गले से बोलने का प्रयास किया- ‘सब कुछ।’
डॉक्टर- ‘कुछ ऐसा याद करो, जो बचपन में पढ़ा हो।’
मैं- ‘जटाटवीगलज्ज्वल प्रवाहपावितस्थले…’
‘मेमोरी ओके!’ -डॉक्टर ने बीच में ही टोक दिया।
डॉक्टर के चेहरे के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि युद्ध जीता जा चुका है, अब ये नलियाँ हटाने की साधना करनी है।
अब तक बाहर खड़े रहकर मेरी मृत्यु से लड़ रहे मेरे अपने आईसीयू के द्वार तक आ पहुँचे थे। मैं उन सबकी हँसती हुई आँखों में वो सारा दर्द देख पा रहा था, जो मेरे दिल की चीर-फाड़ के समय एनेस्थीसिया की ओट में छिप गया था।
एक महीने बाद जब घर लौटा तो घर में घुसते ही मैं बिलखकर रो पड़ा था। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि इस घर में मैं सही-सलामत लौट आया हूँ।
अब वही भागदौड़, वही व्यस्तता, वही आपाधापी फिर से जीवन का हिस्सा बन गई है। इस एक वर्ष में मैंने हर उस दुआ का आभार व्यक्त किया है जो उस समय मेरे जीवन यज्ञ की समिधा बनने को तैयार थी।
अब जब कभी कोई संकट मेरे पास आना चाहता है, तो मैं उसे 6-7 जुलाई 2021 की कहानी सुनाकर ठहाका लगाता हूँ कि कहीं और जा बे, मैं तेरे अब्बा से मिल चुका हूँ!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
अपनेपन के बाहुपाश में
धड़कन ने ये शब्द सुनाए-
“अलग-अलग कर्त्तव्य रहें; पर
आपस का अधिकार बहुत है।”
बस इतना-सा प्यार बहुत है
सबकी अपनी-अपनी गति है, सबका अपना-अपना पथ है
सूरज के कुनबे में लेकिन, ना कोई इति है ना अथ है
हम-तुम अगर निकट से गुज़रे, इस अनवरत अथक घुर्णन में
तो आपस में टकराने की, इच्छा जन्म नहीं ले मन में
हम इक-दूजे के होने का कर पाएं सत्कार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है
उद्गम का हर इक कतरा तो साथ नहीं बहता जीवन भर
साथ नहीं होने का मतलब प्रतिद्वंदी होना कब है पर
पल-पल बनती और बिगड़ती लहर अलग हैं नदी एक है,
जिसमें हम सब तैर रहे हैं, इस युग की वह सदी एक है
अब तुम आगे, अब हम आगे, बहती जाए धार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है
सब नियमित संवाद कर सकें ऐसा कहीं प्रबंध नहीं है
रोज़-रोज़ मिलना सम्भव हो ऐसा भी अनुबंध नहीं है
पर मिलने का योग बने तो, सुख से खिल उठता वह क्षण हो
भावुक करती मुस्कानें हों, साँसें भरता आलिंगन हो
मुड़कर देखो हर रिश्ते में होठों का विस्तार बहुत है
बस इतना सा प्यार बहुत है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
कोई हमारे नसीब को इक नयी कहानी सुना रहा है
हथेलियों पर कई लकीरें बना रहा है, मिटा रहा है
बहुत दिनों से जिस एक खिड़की के पार किरणें न आ सकी थीं
अब एक उम्मीद का परिंदा उसी के पल्ले हिला रहा है
जिसे बचाने की कोशिशों में हरेक हसरत दबा ली हमने
उसी अना को सलाम करके कहीं कोई मुस्कुरा रहा है
अंधेरा आँखों में यूँ भरा था कि रौशनी की जगह नहीं थी
पर एक तारा हमारी पुतली में आजकल जगमगा रहा है
ग़ज़ब तो ये है कि हम मुक़द्दर की नींद पर हँस रहे थे अब तक
नसीब करवट बदल रहा है तो आज रोना क्यों आ रहा है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
जो शांति का उपाय खोजने के लिए अन्तिम प्रयास तक जूझता रहे, उसे शांतिदूत कहा जाता है। जब दोनों ही पक्ष ख़ून-ख़राबे के उन्माद में हों तथा किसी तरह शांति का उपाय न सूझ रहा हो, उस समय भी शांति का उपाय खोजना ऐसा ही है, ज्यों सींग भिड़ाए खड़े दो बिजारों को लड़ने से रोकना हो। इस स्थिति में स्वयं के लहूलुहान होने का संकट रहता है।
हमारे पौराणिक साहित्य में शांति के ऐसे प्रयासों के दो विशिष्ट उदाहरण मिलते हैं। प्रथम, राम की सेना लंका को घेरे खड़ी है और सीता की खोज, लंका दहन तथा सेतुनिर्माण सरीखी अविश्वसनीय घटनाओं से रावण का मनोबल टूटा हुआ है। वानर सेना आत्मविश्वास से भरी हुई है। ऐसे में भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अंगद को शांतिदूत बनाकर लंका की राजसभा में भेजा। अंगद ने जब राघव का प्रस्ताव रावण के सम्मुख रखा तो रक्ष-शक्ति के बलाभिमान से उन्मादी हुए रावण को लगा कि राम युद्ध से डरकर शांति की बात कर रहे हैं। इसी उन्माद में रावण ने शांतिदूत अंगद का अपमान किया किन्तु अंगद ने अपना बल प्रदर्शित कर रावण के अहंकार को चूर कर दिया। ध्यान से देखें तो समझ आता है कि रावण के दरबार में पैर जमाने वाले अंगद कोई करतब नहीं कर रहे थे, अपितु वे उन्मादी अहंकार को यह जताना चाह रहे थे कि जिस रक्षशक्ति के बूते वह युद्ध में विजयी होने का दम्भ भर रहा है, उसके सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं को अकेला एक अंगद परास्त करके जा रहा है। अंगद रावण को यह बताना चाह रहे थे कि शांति की बात करनेवाले को कायर नहीं, दूरदर्शी समझना चाहिए। उसका धन्यवाद करना चाहिए कि वह उस महाविनाश को देखकर, उससे एक युग को बचा लेना चाहता है, जिसे उन्मादी आँखें नहीं देख पा रही हैं।
दूसरे, जब यह तय हो गया कि अब कौरव और पाण्डव कुरुक्षेत्र में घात-प्रतिघात से पूरे द्वापर को लहूलुहान कर देंगे, तब स्वयं नारायण श्रीकृष्ण ने यह निर्णय लिया कि इस युद्ध को रोकने का एक प्रयास और किया जाना चाहिए। युगनायक वासुदेव श्रीकृष्ण स्वयं ‘शांतिदूत’ बनकर हस्तिनापुर पहुँचे और पाण्डवों की ओर से संधि का उपाय सुझाया। किन्तु इस क्षण भी अपने बाहुबल के मद से ग्रसित सुयोधन ने न केवल शांतिदूत का अपमान किया अपितु श्रीकृष्ण को बंदी बनाने की भी चेष्टा की। इस स्थिति में भी श्रीकृष्ण ने विराट स्वरूप प्रदर्शित कर उसके उन्माद की गति को विराम देने का ही प्रयास किया था। नारायण सरीखे व्यक्तित्व को आत्मश्लाघा की डींगें हाँकने की कोई आवश्यकता नहीं थी, वे तो युद्धोन्मत्त मूढ़ों को यह बताना चाहते थे कि जिस बाहुबल पर वह बौराये फिर रहे हैं, उससे अधिक शक्तिशाली होकर भी हम शांति की भाषा बोल रहे हैं।
शांति की बात करने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है। युद्ध की राह पर धकेलने के लिए तो केवल बाहुबल चाहिए, जबकि शांति की राह पर लाने के लिए बाहुबल के साथ-साथ बुद्धिबल तथा आत्मबल भी आवश्यक होता है। इसीलिए शांति की राह सुझाने वाला युद्धोन्मत्त उन्मादी से तीन गुना अधिक बलवान होता है।
यही कारण है कि जिसने शांति की बात करनेवाले को कायर समझकर उसका अपमान किया है, उसे समूल नाश की दुर्दशा झेलनी पड़ी है।
युद्ध से रक्तरंजित हुए समाज पर मातम और वैधव्य का जो सन्नाटा पसरता है, वह किसी शकुनि या मंथरा से यह प्रश्न नहीं करता कि लाशों की उस अतिवृष्टि को जन्म देनेवाले बादल किस कुचक्र के आकाश में निर्मित हुए थे, वह तो हमेशा भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर और कृष्ण से ही पूछता है कि जब वे बादल घुमड़ रहे थे तब इनकी छतरियाँ क्या कर रही थीं!
सड़क पर भिड़ने जा रहे दो बिजारों को दूर करनेवाला व्यक्ति करुणा से उत्पन्न साहस से संचालित होता है। उसके शांतिप्रयासों का अपमान करके उसी पर धावा बोलनेवालों को या तो अहंकारी रावण कहा जाएगा, या अशिष्ट सुयोधन या फिर उसे कोरा जानवर कहा जाएगा… ‘जानवर’!
✍️ चिराग़ जैन