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शऊर

शऊर हो तो नश्तर से भी गुदगुदी की जा सकती है ✍️ चिराग़ जैन

भीतर-बाहर

ख़ुश होते तो आँख चमकती मन हँसता तो देह दमकती डर लगता तो दिल की धड़कन ख़ुद चेहरे तक आन धमकती क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे हाथ-पैर हिलते-डुलते हैं, पर मन में उत्साह नहीं है साँसें आती हैं, जाती हैं पर...

सनातन धर्म और सहिष्णुता

सनातन संस्कृति की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि यहाँ भक्त और भगवान के मध्य जो बातचीत होती है, वह केवल भक्तिरस तक ही सीमित नहीं है। बल्कि उसमें काव्य के अन्य सभी रसों की सृष्टि सम्भव है। विश्व के अन्य किसी धर्म में यह चमत्कार सम्भव नहीं है। किसी अन्य धर्म के आराध्य की...

शिव : साधना सहजता की

शिव… जहाँ पीड़ा और उत्स एकाकार हो जाते हैं। शिव… जहाँ काव्य के नौ रस बिना किसी भेदभाव के एक साथ रहते हैं। शिव… जहाँ सृष्टि के समस्त भावों को प्रश्रय मिल जाता है। शिव… जिसके द्वार किसी के लिए भी बंद नहीं हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि जहाँ द्वार जैसा...

या में दो न समाय

सीमित संसाधनों में असीमित सुख भोगने का साधन है- प्रेम। भौतिकता और नैतिकता; इन दोनों की कुण्डली से मुक्त होकर निस्पृह विचरण का निमित्त है- प्रेम। क्रोध, मान, माया और लोभ -इन चारों से रहित होकर निश्छल हो जाने की अनुभूति है- प्रेम। अमूर्त को देख लेने की कला है- प्रेम।...
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