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लम्हों का अक्स

न जाने कितने ही लम्हों का अक्स है इसमें ये मेरी शक़्ल एक दौर की झलक भर है ✍️ चिराग़ जैन

मैं महज किरदार जीता हूँ

एक मैं, कितना झमेला विश्व मुझ जैसों का मेला इस समूची सृष्टि को जो साध लेता है अकेला बस उसी के खेल का विस्तार जीता हूँ मैं महज किरदार जीता हूँ मैं वही जिसने जनम के साथ इक परिवार पाया हार हो या जीत हो, परिवार सब स्वीकार पाया जब जहाँ जो भी मिला सब भोगकर जीता रहा हूँ...

तर्जनी

समय साक्षी है कि चंद्रगुप्त के बाहुबल को विष्णुगुप्त के निर्देशन ने सम्राट बनाया। कृष्ण के मार्गदर्शन में ही पार्थ सरीखा धनुर्धर युग-विजेता बन सका। समाज के सम्यक हिताभिलाषी सरस्वती पुत्र सत्ता के सम्मुख सावचेतना की तर्जनी लेकर प्रकट होते हैं, स्तुति के जुड़े हुए हाथ...

देह और प्राण

देह के कष्ट से जिनको परहेज है प्राण का सुख उन्हें मिल सकेगा नहीं संकुचित ही रहेगी अगर पाँखुरी कोई गुल बाग में खिल सकेगा नहीं सत्य है, जो खिले वो सभी एक दिन पत्ती-पत्ती चमन में बिखर जाएंगे पर बिखरने के डर से जिन्होंने सुमन बंद करके रखा वो भी मर जाएंगे प्रेम पिंजरा अगर...

नकारात्मकता भी आवश्यक है

नकारात्मक और सकारात्मक दोनों से मिलकर ही सृष्टि संचालित होती है। हमने नकारात्मकता को ‘ग़लत’ का पर्यायवाची समझकर बड़ी भूल की है। नेगेटिव और पॉजिटिव में से कोई भी एक तार हटा दो तो विद्युत अवरुद्ध हो जाएगी। संचरण यकायक रुक जाएगा। इसीलिए महावीर कर्म शून्यता की अवस्था को...
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