Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
रास्ता दूभर बहुत था
हारने का डर बहुत था
राह की धरती नहीं थी
चाह का अम्बर बहुत था
जूझने में व्यस्त थे, सुबकी नहीं आई
जीतने पर आँख भर आई
ज़िन्दगी की नाव की पतवार का एहसास भी था
साथ ही इस अनकहे से प्यार का आभास भी था
यूँ समझ लो, द्वार पर शिशुपाल भी था, कंस भी था
और मन के कुंजवन में अनवरत इक रास भी था
और उस पर रीतियों का बोझ हरजाई
जीतने पर आँख भर आई
देह के संवाद पर सब दोस्त-यारों की नज़र थी
और मन के हाल पर बस चांद-तारों की नज़र थी
हम निरंतर शुष्क होती कोंपलों से काँपते थे
पर हमारी डालियों पर भी बहारों की नज़र थी
एक दिन ख़ुद ही समूची डाल हरियाई
जीतने पर आँख भर आई
एक दिन पाया बिवाई में महावर भर गया है
एक दिन देखा हर इक निःशब्द में स्वर भर गया है
पीस की हर टीस सहकर अब हथेली रच उठी है
और इक सौभाग्य का क्षण मांग आकर भर गया है
हर पुरानी याद मुस्काई
जीतने पर आँख भर आई
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
झोंपड़ी को यह नहीं भूलना चाहिए
कि बड़ी इमारत का मलबा भी
झोंपड़ी से ऊँचा होता है।
और मलबे को भी
यह नहीं भूलना चाहिए
कि मलबा
कितना भी ऊँचा हो जाए,
उसे इमारत नहीं कहा जा सकता।
इमारत ध्यान रखे
कि चाटनेवाले दीमक कहलाते हैं
और
मरम्मत की आवाज़ें
शोर होती हैं, संगीत नहीं!
झोंपड़ी ध्यान रखे
कि इमारत पर कीचड़ फेंकेगी
तो ओछी कहलाएगी
और अपना आंगन लीपती रहेगी
तो मज़बूत भी बनी रहेगी
और सुन्दर भी!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
रात काटें जागकर हम
दिन बिताते भागकर हम
व्यस्तता से घिर रहे हैं
क्यों उनींदे फिर रहे हैं
इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो
आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो
व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन ऐसा चुरा लें
काश बेपरवाह होकर आँख मूंदें, मुस्कुरा लें
याद की कुछ गठरियाँ खोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
पिंडलियों में नींद के अन्याय की पीड़ा भरी है
भृकुटियों पर एक मुद्दत से बहुत चिंता धरी है
भीड़ के जंजाल से हटकर कभी एकांत बुन लें
शांत हों इतने कि अपनी देह की आवाज़ सुन लें
एक दिन ख़ुद के लिए रो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
विश्व का हमने कोई कर्जा नहीं खाया हुआ है
किसलिए मुस्कान का ये झूठ चिपकाया हुआ है
एक दिन बस एक दिन की ज़िंदगी का लुत्फ़ ले लें
जीतने और हारने से दूर होकर खेल खेलें
ज़िंदगी में ज़िन्दगी बो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
अगाध समर्पण का साकार रूप हैं हनुमान। निस्पृह भक्ति का शाश्वत उदाहरण हैं हनुमान। श्रीमत् हनुमान की वीरता अन्य किसी भी वीर की वीरता से इसलिए विशेष है, क्योंकि हनुमान की वीरता समर्पण से उत्पन्न हुई है। श्रीराम के प्रति वीरवर हनुमान का जो समर्पित प्रेम था, उसी की कुक्षि से यह भाव उपजा कि चाहे धरती-अम्बर एक करना पड़े, चाहे पहाड़ उठाना पड़े, चाहे सागर लांघना पड़े, किन्तु श्रीराम का कोई काम रुकना नहीं चाहिए -प्रेम का ऐसा उदाहरण विश्व के अन्य किसी कथानक में नहीं मिलता।
और इतने समर्पण के बाद भी लेशमात्र आकांक्षा नहीं। रत्तीभर भी अपेक्षा नहीं। राम जी के लिए अनवरत दौड़ने के बाद भी कभी किसी सिंहासन पर अधिकार नहीं जताए; ऐसा पात्र अन्यत्र नहीं मिलता। अन्य किसी भी समर्पित पात्र का मन टटोला जाए तो उसमें कोई महत्वाकांक्षा, कोई प्रत्याशा, कोई उम्मीद, कोई कामना अथवा कोई योजना अवश्य मिल जाएगी किन्तु हनुमान का मन भी टटोला गया तो उसमें भी राम ही मिले।
यह भक्त और भगवान के संबंध से भी कुछ आगे का मुआमला है। भक्त भी ईश्वर को पाने के अपेक्षा करता है। किन्तु हनुमान तो केवल स्वयं को समर्पित करते दिखाई देते हैं, कुछ पाने की आकांक्षा तो उनमें दिखाई ही नहीं देती। वे राम जी के हर काम को ‘अपना’ काम समझकर ही करते हैं। स्व से इतर समझा जाए तो काम में इतनी ऊर्जा लग ही नहीं सकती। वे संजीवनी लाना अपना उत्तरदायित्व समझते हैं। यदि ऐसा न होता तो वे सागर तट से द्रोणाचल पर्वत तक की दूरी को इतनी कम अवधि में तय कर ही नहीं सकते थे। उस रात श्रीमत् हनुमान ने यह अनुभूत किया होगा कि यह मृत्यु लक्ष्मण पर नहीं अपितु स्वयं उन पर मंडरा रही है। क्योंकि मृत्यु पीछे हो तभी प्राणी असंभव को संभव कर पाता है। हनुमान जी की इस अनुभूति क्षमता ने उनके पौरुष को अद्वितीय बना दिया।
ज्यों, संतति के आँसू देखकर माँ-बाप पूरी दुनिया से लड़ने को तैयार हो जाते हैं। प्रकृति के हर नियम को बदल डालने को आतुर हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार माँ सीता के विरह में व्याकुल अपने आराध्य को देखकर जब हनुमान सागर लांघ गए तो इसके पीछे भक्ति से अधिक राम के प्रति उनके मन में उमड़े वात्सल्य की भूमिका रही होगी। तभी यह संभव था कि दुनिया की कोई सुरसा उनका पथ न रोक सकी। वात्सल्य के इसी चरम पर लंका की सुरक्षा में नियुक्त लंकिनी स्वयं उन्हें कहती है कि जिसकी पीड़ा को देखकर तुम सौ योजन का समुद्र लांघ आए हो, उसकी को हृदय में रखकर लंका में प्रवेश करना ताकि लंका के भीतर का भी कोई व्यवधान तुम्हारा पथ अवरुद्ध न कर सके। …हृदय राखि कौसलपुर राजा!
हनुमान समर्पण का विश्वविद्यालय हैं। हनुमान का चरित्र समर्पण का व्याकरण सिखाता है। हनुमान का समर्पण कुछ प्राप्त करने की योजना से दूषित नहीं है। हनुमान का समर्पण किसी ख्याति की आकांक्षा से विहीन है। उस पर किसी कामना का भार नहीं है, इसीलिए हनुमान अपने समर्पण के पंख लगाकर आसानी से उड़ लेते हैं। कामनाएँ हमारी उड़ान को अवरुद्ध करती हैं। हनुमान कामना से अछूते हैं। वे राम से भक्ति का अधिकार भी नहीं मांगते। इसीलिए राम स्वयं उन्हें ‘मित्र’ का सम्मान देते हैं। क्योंकि राम जानते हैं कि भक्त कामनायुक्त होता है, लेकिन ‘मित्र’ बिना किसी कामना के मित्र का साथ दे सकता है। भक्त और भगवान में किसी के बड़ा और किसी के छोटा होने का विमर्श संभव है, लेकिन मित्र सर्वदा समान होते हैं। उनमें कोई बड़ा-छोटा नहीं होता। इसीलिए राम हनुमान को मित्र कहते हैं। …बिन मांगे मोती मिले। हनुमान ने कुछ मांगा ही नहीं। इसीलिए उन्हें मित्रपद मिला। मांग लेते या चाह लेते तो भक्त बनकर रह जाते।
इसीलिए बाबा तुलसी ने लिखा कि रामकाज करिबे को आतुर। यदि कोई काम राम का काम है तो हनुमान को निर्दिष्ट नहीं करना पड़ेगा। यदि कोई काम राम का काम हो तो हनुमान जी से प्रार्थना न करनी पड़ेगी कि इस काम को कर दो। ‘रामचंद्र के काम सँवारे’। काम यदि राम जी का है तो हुआ ही समझो। …सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज ‘सकल’ तुम साजा- यहाँ ‘सकल’ शब्द का प्रयोग करना आसान नहीं रहा होगा तुलसीदास जी के लिए। क्योंकि वे स्वयं राम के प्रेम में डूबे थे। किन्तु हनुमान का चरित्र इतना समर्पित है कि राम के प्रेम में डूबकर स्वयं तुलसी लिख रहे हैं कि रामजी के ‘सकल’ काम हनुमान साधते थे। अहा…, यह भी स्वयं में अद्वितीय उदाहरण है कि रामनाम का चंदन घिसते हुए बाबा तुलसी स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि रामनाम का रसायन तो हनुमान जी के ही पास है।
हनुमान का शौर्य उनके समर्पण से उपजा है। इसीलिए वे हृदय में राम को बसाकर रामजी के काम करके आनन्द पाते हैं। इसीलिए वे रामजी के काम करते हुए कभी थकते नहीं हैं। इसीलिए वे रामजी के काम करने को हमेशा तत्पर दिखाई देते हैं। इसीलिए हनुमान जी का स्मरण करते हुए राम जी का स्मरण स्वयमेव हो जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
सत्य के लिए व्याकरण की नहीं अंतःकरण की आवश्यकता होती है।
✍️ चिराग़ जैन