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छलना

मटक-मटक लट झटक-झटक; हिया- पट खटपट खटकाती है गुजरिया ठक-ठक-ठक खटकात नटखट मोरे हिवड़ा के पट, बतलाती है गुजरिया लाग न लपट, तज अंगना का वट झट जमना के तट, चली आती है गुजरिया लेवे करवट जब मन का कपट उस पल झटपट नट जाती है गुजरिया ✍️ चिराग़...

दिल में कोई कराह

बाक़ी नहीं है दिल में कोई कराह शायद मुद्दत हुई, हुए थे, हम भी तबाह शायद फिर से जहान वाले बदनाम कर रहे हैं फिर से हुई है हम पर उनकी निगाह शायद किस बात पर तू सबसे इतना ख़फ़ा-ख़फ़ा है तुझको कचोटता है तेरा गुनाह शायद फिर रेत पर लहू की बूंदें दिखाई दी हैं कोई ढूंढने चला है सहरा...

पनिहारी

पानी भरने को पनिहारी पनघट चली मटकिया मटकती कटि में दबात है गोरी के बदन की छुअन ऐसी मदभरी मदहोश गगरिया झूम-झूम गात है अंग-अंग में सुगन्ध ता पे मतवारी चाल मोरनी भी नत है, हिरनिया भी मात है चूम-चूम पतली कमरिया गुजरिया की गगरिया गोरी संग ठुमका लगात है क्वारी पनिहारी लिए...

विवशता

चुप-चुप देखती थीं राधिका कन्हैया जी को हौले-हौले उठ रहे शोर से विवश थी साँवरे के पास खींच लाती थी जो बार-बार प्रीत की अनोखी उस डोर से विवश थी इत होरी की उमंग, उत दुनिया से तंग फागुन में गोरी चहुँ ओर से विवश थी लोक-लाज तज भगी चली आई गोकुल में मनवा में उठती हिलोर से...

बेचैनियाँ

वक्त क़े हाथों मिलीं मायूसियाँ हैं किस क़दर रुत बिछड़ने की है और नज़दीकियाँ हैं किस क़दर एक ही पल में ख़ुशी भी है, तड़प भी, दर्द भी क्या बताएँ इस घड़ी बेचैनियाँ हैं किस क़दर ✍️ चिराग़...
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