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दिल्ली

वे भी दिन थे जब पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ अकारण ही मुस्कुरा देती थीं नज़र मिलने पर अजनबियों से भी। दरियागंज की हवेलियाँ अक्सर देखा करती थीं एक कटोरी को देहरी लांघकर इतराते हुए दूसरी देहरी तक जाते कुछ दशक पहले तक। शाहदरा के बेतरबीब मकान चिलचिलाती धूप में अक्सर दरवाज़ा...

प्यार भर देंगे

तेरे दामन में प्यार भर देंगे तेरे मन में शृंगार भर देंगे कब तलक तू हमें न चाहेगा ख़ुद को तुझ पर निसार कर देंगे ✍️ चिराग़...

वसंत (दो चित्र)

परेशानियों में यदि उलझा हो अंतस् तो कैसा लगता है ये वसंत मत पूछिये एक-एक दिन एक युग लगता है; और कैसे होता है युगों का अंत मत पूछिये प्रेमगीत शोर लगते हैं और लिपियों के चुभते हैं कितने हलन्त मत पूछिये जल विच कमल सरीख़ा लगता है मन काहे बनता है कोई सन्त मत पूछिये धरती के...

आज़माइश

यहाँ चलता नहीं दस्तूर कोई भी ज़माने का ग़ज़ब है लुत्फ़ इन राहों पे सब कुछ हार जाने का नज़र मिलते ही दिल काबू से बाहर जान पड़ता है मुहब्बत में कहाँ मिलता है मौक़ा आज़माने का ✍️ चिराग़...

सुरों की आह

ज़माने ने सुरों की आह को झनकार माना है कहीं संवेदना जीती तो उसको हार माना है बड़े बईमान मानी तय किए हैं भावनाओं के जहाँ दो दिल तड़पते हों उसी को प्यार माना है ✍️ चिराग़...
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