Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
जब ढलेगा आज का सूरज
तो उसके साथ ही बुझ जाएगी
वो आख़िरी उम्मीद भी
जो साल भर पहले
लगा बैठे थे तुमसे हम सभी।
याद है मुझको
करोड़ों कामनाएं गूंज उठी थीं
सभी मोबाइलों में;
शुभ, मुबारक़ और कितने ही
हसीं अल्फ़ाज़ लिखे थे तुम्हारे साथ
घड़ी के एक-एक सेकेण्ड की आवाज़ पर
उम्मीद का आकार बढ़ता जा रहा था
ठिठुरती रात में
जब रूह तक जमने लगी थी
तुम्हारी पहली आहट को तरसते लोग
सड़कों पर खड़े थे
घड़ी में जिस जगह बारह लिखा था
घड़ी की सबसे छोटी सूई
उस जानिब बहुत धीरे सरकती आ रही थी
बड़ी सूई ज़रा सी तेज़ थी
पर तीसरी दोनों बड़ी-छोटी को मिलवाने की ख़ातिर
कई चक्कर लगाती जा रही थी
मुझे सेकेण्ड की सूई का हर ठुमका
अभी तक याद है अच्छी तरह
बहुत बेचैन थी उस रात ये दुनिया
तुम्हारी इन्तज़ारी में
तुम्हारी राह में जो फूल बिखरे थे
अभी वो ठीक से सूखे नहीं थे
कि तुमने ख़ूबसूरत ख़्वाब सारे तोड़ डाले
तुम्हारे नाम से जो दिन नुमाया थे
उन्हें रोती हुई आँखों का चस्का लग गया था
तुम्हारे कान आहों का नशा करने लगे थे
तुम्हारी एक-एक तारीख़ डाकू की तरह
हर रोज़ दुनिया के कई गौहर चुराती जा रही थी
सुनो, ये जो तुम्हारे कारनामे हैं
उन्हें भूला भी जा सकता नहीं है
और उनकी याद के आगोश में
उम्मीद का दामन पकड़ने से
हमें डर लग रहा है
निगाहें फिर घड़ी पर टिक रही हैं
किसी जादू की गुंजाइश नहीं है
मग़र ये आज पहली बार होगा
कि दुनिया
आने वाले साल की ख़ातिर
भले ख़ुश हो या ना हो
मग़र तुम जा रहे हो
इस ख़ुशी में नाच उठेगा ज़माना।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
‘बंधन भी सुख का कारण हो सकता है’ – इस अद्भुत सत्य का अनोखा उदाहरण है रक्षाबंधन! यद्यपि मैं जानता हूँ कि ईश्वर ने सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को आत्मरक्षा हेतु आत्मनिर्भर बनाया है तथापि मुझे इस बात का एहसास है कि नाड़ी पर एक धागा बांधकर मन में अपनत्व की जिस अपेक्षा को गतिमान किया जाता है; वह संवेदना के स्नायु तंत्र को आनन्दित कर देती है।
कोई हम पर इतना अधिकार रखे कि हमें अपनी रक्षा का दायित्व सौंप दे… अहा! इस अनुभूति से मन कितना बलिष्ठ हो उठता है।
सम्भवतः हम इस त्यौहार की इस अलौकिक ख़ुशी को सही से समझ ही नहीं सके हैं। इसीलिए हमने इसको किन्हीं अर्थों में परिहास बना डाला है। यदि किसी लड़की को अहसास हो जाए कि अमुक परिचित लड़का उसके प्रति प्रेम का भाव रखता है, अथवा उसे प्रपोज़ करनेवाला है तो वह लड़की उसको राखी बांधने निकल पड़ती है! उधर लड़के को अनुमान हो जाए कि जिससे वह प्रेम करता है, वह उसे राखी बांधने की जुगत में है तो लड़का राखी से बचने का उपाय खोजने लगता है!
इस परिस्थिति के दोनों ही पात्र बचकानी हरकतें कर रहे हैं। जिसकी नीयत में तुम्हें खोट दिखाई दे रहा है, उसको राखी जैसे सम्मान से सम्मानित कैसे किया जा सकता है? और जिसकी तुम राखी से भयभीत हो, उससे तुम कम से कम प्रेम तो कभी नहीं कर सकते!
राखी एक पदक है। राखी एक सम्मान है। यदि कोई स्त्री किसी पुरुष को इस सम्मान के योग्य समझती है तो यह उस पुरुष के लिए गौरव का विषय है। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के इस युग में जब स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को भौंडा करके परोसने के सभी द्वार खुले हैं ऐसे में राखी का एक धागा संवेदनाशून्य होते सम्बन्धों पर संवेदना के काँचुकीय की भूमिका निर्वाह करता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
सावन की हरियाली
उतर आई है
हथेलियों पर
…महकने लगा है भाग्य!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
स्वयं को भगवान मानने की महत्वाकांक्षा में हिरण्यकश्यप ने होलिका के वरदान का दुरुपयोग किया। चिता ने चीख-चीख कर कहा कि, ‘मूर्ख हिरण्यकश्यप, जनता पर इतना अत्याचार न कर कि तेरे ही महल के खंभे तेरे विनाश का उद्गम बन जाएँ!’
मदान्ध राजा ने चिता की बात अनसुनी कर दी। फिर एक दिन पत्थर की भी छाती फट गयी। फिर एक दिन सारे वरदान उसके विरुद्ध खड़े हो गये। फिर एक दिन नियति के नाख़ून, अत्याचारी के पाप से अधिक बड़े हो गये।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
बेतरतीबी से लगाया जाये
तो गुलाबी रंग से भी आदमी पागल हो जाता है
और सलीके से लगाया जाये
तो काला रंग भी काजल हो जाता है।
✍️ चिराग़ जैन