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दिल्ली

रोज़ उजड़े, रोज़ सँवरे, इस शहर का दिल अलग है मत मिसालें दो हमारी, अपना मुस्तकबिल अलग है कुछ अलग है नूर दिल्ली का दिल बहुत मशहूर दिल्ली का खण्डहरों के साथ कितने युग खड़े हैं मुँह उठाए ख़ून में भीगी रही है साज़िशों के ज़ख़्म खाए पर इन्हीं सब साज़िशों ने रच दिया इतिहास जग में...

उजियारे के अवशेष

गाँव का पुराना मकान कच्चा-पक्का फ़र्श दीमक लगी जर्जर चौखट और देहरी के दोनों ओर चिकनाई के दो गोल निशान!मुद्दत हुई हर साल दीपावली पर दीपक जलाते थे दो हाथ। फिर अपने पल्लू की ओट में छिपाकर हवा के झोंके से बचाते हुए दीवार की आड़ में हौले से देहरी पर दो दीपक धर आते थे दो हाथ।...

शरद पूर्णिमा

शरद रात्रि का चंद्रमा, किसे सुनावे पीर ना जमना में नीर है, ना अंगना में खीर सखी! शरद की पूर्णिमा, मन हो गया अधीर मैं तरसूं निज श्याम को, दुनिया खाए खीर ✍️ चिराग़...

आपदा-प्रबंधन

संकट हो कोई समक्ष खड़ा या फिर घिर आए युद्ध बड़ा जीवन की हर कठिनाई से मानव का पुत्र सदैव लड़ा मानवता का इक दिव्य भाव, अंतस् में धारण कर लेंगे आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे सागर ने लांघी मर्यादा सूनामी यम का रूप बनी भूकम्पों की मनमानी से जब धरा मृत्यु का कूप...

दिल्ली

वे भी दिन थे जब पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ अकारण ही मुस्कुरा देती थीं नज़र मिलने पर अजनबियों से भी। दरियागंज की हवेलियाँ अक्सर देखा करती थीं एक कटोरी को देहरी लांघकर इतराते हुए दूसरी देहरी तक जाते कुछ दशक पहले तक। शाहदरा के बेतरबीब मकान चिलचिलाती धूप में अक्सर दरवाज़ा...
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