Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
मन की विकलता ने आँखों से नींद छीन ली है। यद्यपि कठिन था, लेकिन मानव की मृत्यु के समाचार सुन-सुनकर भी मैं किसी तरह ख़ुद को थामे हुए था। लेकिन आज मैंने अपनी आँखों से मानवता की मृत्यु का दृश्य देखा। इन चीत्कारों के बीच कुटिल मुस्कान और अट्टहास के वैभत्स्य ने आत्मा को छलनी कर दिया।
आह! ये किस समाज में श्वास ले रहे हैं हम लोग! किसी की मृत्यु भी उपालम्भ, उपहास अथवा प्रतिशोध-प्रदर्शन का ‘अवसर’ हो सकता है… यह अविश्वसनीय सत्य आज मेरी आँखों के सामने था। हालाँकि लगभग ऐसा ही नंगा नाच हम गौरी लंकेश, इरफान, सुशांत सिंह राजपूत, ऋषि कपूर और राहत इंदौरी के निधन पर भी देख चुके हैं। तब भी संवेदनाएँ इस कृत्य से आहत हुई थीं; लेकिन न जाने आज क्यों यह दृश्य कुछ अधिक ही विदीर्ण कर गया।
आज पूरे देश में मातम पसरा है। मृत्यु किसी बवंडर की तरह सबको अपने आगोश में समेटे लिए जा रही है। चिता, लाश, श्मशान, श्रद्धांजलि जैसे शब्दों के हम नियमित प्रयोक्ता बन गए हैं। इस स्थिति में भी समाज प्रतिशोध की ज्वाला बचाए रख पाया है और वह भी इतनी वीभत्स की जिसको सोचने भर से जी घृणा से भर जाता है।
यदि इन्हीं सब मनुष्यों के बीच रहना मानव जीवन की विवशता है तो मुझे उन लोगों से ईर्ष्या हो रही है जो यह सब देखने से पहले ही चिरनिद्रा में लीन हो गए।
इस दुनिया में इतने सारे वाद, इतनी सारी विचारधाराएँ, इतने सारे धर्म, इतने सारे सम्प्रदाय, इतनी सारी जातियाँ, इतने सारे पंथ और इतने सारे रंग भर गए हैं कि बेचारी मनुष्यता के लिए जगह ही कहाँ बची है।
लेकिन आज एक बात बिल्कुल साफ हो गयी कि जो भी व्यक्ति किसी वाद, विचारधारा या अन्य किसी भी शब्द के नाम पर अकड़ कर खड़ा है, उसके पैर उस लाश पर जमे हुए हैं, जिसमें कभी उसकी मनुष्यता श्वास लेती थी।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
यह समय अगर गुज़र भी गया तो इसके बाद दुनिया वैसी ही होगी जैसा नादिरशाह के आक्रमण के बाद दिल्ली का लालकिला था या जैसा महाभारत के युद्ध के बाद हस्तिनापुर था। जिनके होने से सब कुछ अच्छा लगता था, वो अपने इस दौर में हमसे दूर चले जा रहे हैं। हर आँख नम है, हर आंगन में मातम है; हर श्मशान भभक रहा है। इन सबके बिना दुनिया बची भी तो उंगलियों के बिना सितार का करेंगे क्या? अधर ही न रहेंगे तो वंशी से सुर नहीं, कराह निकलेगी।
राजनीति, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, कला, साहित्य, संगीत, अभिनय, अध्यात्म… कौन-सा ऐसा गलियारा है जहाँ से कोई जनाज़ा न निकला हो। अल्लाह के बंदे हों या राम के वंशज; महावीर के अनुयायी हों या नानक के प्यारे; सब अपनी-अपनी आस्था की देहरी पर घुटने टेक रहे हैं; लेकिन किसी आसमान से कोई मदद नहीं उतर रही।
वो रात-रात भर के जलसे; वो संगीत की लहरियाँ; वो ढोल-नगाड़े; वो शहनाइयाँ; वो उत्सव; वो रथयात्राएँ; वो प्रभात फेरियाँ, वो मॉर्निंग वॉक, वो ईवनिंग क्लब्स, वो किटी पार्टियाँ… यह सब कुछ दुनिया में फिर से लौट पाएगा या नहीं इसका सटीक उत्तर कोई नहीं दे पा रहा।
सबके मन में एक अजीब-सा भय घर कर रहा है। सब एक अनचाही आशंका को निश्चित मान चुके हैं; लेकिन विध्वंस के इस खौफ़नाक सन्नाटे में यदि जीवन का संगीत बजाने की कोशिश जारी रही तो एक दिन सन्नाटे को चहल-पहल के आगे आत्मसमर्पण करना ही होगा।
जो लोग छूट रहे हैं उनके अन्तिम क्षणों में हमारी जिजीविषा यह आश्वस्ति दर्ज करेगी कि यह संसार बचा रहेगा। उनकी लिखी कविताएँ, उनके बनाए राग, उनकी सजाई कलाकृतियाँ एक दिन फिर से इस संसार का सौंदर्य बढ़ाने के काम आएंगी।
इस सब सृजन को जीवित रखने के लिए हमें तब तक हिम्मत बनाए रखनी होगी जब तक इस संसार में जीवन की एक भी निशानी शेष है। हमें यह नहीं भूलना होगा कि उन रचनाकारों को श्रद्धांजलि देते हुए हमने बार-बार लिखा है कि दद्दा! आप अपनी रचनाओं में हमेशा जीवित रहोगे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
समय का जो चेहरा इस समय यह विश्व देख रहा है, उसकी मनुष्य ने कल्पना भी नहीं की होगी। लेकिन समय, मनुष्यता का जो आचरण इस समय देख रहा है, उसकी समय ने भी कभी कल्पना नहीं की होगी!
ऐसा लग रहा है कि कोई हाथ से सब कुछ छीने लिए जा रहा है। जिनके साथ रोज़-रोज़ यात्राएँ कीं, जिनके साथ रातें काली कीं, जिनको दद्दा कहा, जिनसे दद्दा सुना… वो यकायक हमसे किसी ने छीन लिये। और हम इतने लाचार की जिनकी अटैची उठाई उनको आखि़री बार कंधा भी न दे सके! हथेली में रेत की चमकीली चुभन भी पसीज कर पिघल चुकी है। देह का रोम-रोम शोकग्रस्त है। मन पथरा गया है। और मैं अपनी संवेदनाओं को मौन की शिला में दुबकाए अहल्या मुद्रा में यह सोच रहा हूँ कि मेरी नियति में यूँ ही लाचार खड़े होकर ख़ुद को ख़ाली होते देखना लिखा है अथवा मेरे भाग्य में इन तस्वीरों में शामिल होकर मुस्कुराना तय है। 3 अप्रेल को छत्तीसगढ़ में एक कवि-सम्मेलन में मुझे राजन जी के साथ जाना था, कोरोना के कारण वह कार्यक्रम कैंसिल हुआ तो राजन जी का फोन आया कि यह तो गया, लेकिन अपन जल्दी ही मिलेंगे। …दद्दा! झूठ बोल गए आप मुझसे। अब हम कभी नहीं मिलेंगे। उस दिन मैं बहुत देर तक रोता रहा था दद्दा! उस दिन मुझे दिन भी अंधियारा लगता रहा था। कमलेश द्विवेदी जी से बहुत अधिक संवाद नहीं था, लेकिन मेरी फेसबुक पोस्ट पर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी लगभग आती ही थी। यदा-कदा फोन करके भी समालोचना करके आशीर्वाद दे देते थे। आप भी चले गए यूँ ही…! आखि़री बार टोका भी नहीं, सराहा भी नहीं। समीक्षा विशाल जी का गीत ‘कविग्राम’ में छपा तो आपने साधुवाद का फोन किया था। अब न आप हैं, न समीक्षा जी…! और कुँअर दा आप…! अभी तो बता रहे थे कि ठीक हो रहा हूँ। निश्चिंत से हो गए थे हम सब। लेकिन दुनिया भर की चिंताओं पर प्यार के छींटे देकर कैसे चुपचाप चल दिये…! यह भी कोई व्यवहार हुआ! आप तो ऐसे न थे। आप तो सामाजिक व्यवहार में निष्णात थे। आप तो किसी कवि सम्मेलन से भी बिना बताए नहीं जाते थे। आप तो किसी के निःशुल्क निमंत्रण को भी इस संकोच में मना न कर पाते थे कि उसका दिल दुःखेगा…! आज क्या हो गया दद्दा! आज सबको रोता छोड़ गए। इस समय तो आपके इस कुनबे को आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी कुँअर दा! छोटे-छोटे फूल से बच्चे इस दिवंगत सूची में छापते हुए कलेजा दो टूक हो गया है। आह! इन सबसे तो अभी काफी व्यवहार करना था। लड़ना था, स्नेह करना था… कभी-कभी डाँटना भी था! कुछ न हो सका। मृत्यु के इस चक्रवात ने नन्हें-नन्हें फूलों को भी नहीं बख्शा! हमें चुप कराने मत आना… क्योंकि हम रो नहीं रहे हैं… हम जड़ हो गए हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
परसों रात से ही ऐसे फोन आने लगे थे कि मरीज़ अस्पताल में तो एडमिट है लेकिन ऑक्सीजन न होने के कारण अस्पताल वालों ने बैड ख़ाली करने को कह दिया है। सुनकर दिल दहल गया। जिसे साँस ठीक से नहीं आ रही, वह अस्पताल से भी निकाल दिया गया तो कहाँ जाएगा! ऐसे मरीज़ों की मदद के लिये अस्पतालों में फोन करवाए तो डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन के लोग रोते-बिलखते मिले। उनका कहना है कि जब हमारे पास ऑक्सीजन ख़त्म हो रही है तो हम मरीज़ को यहाँ रखकर क्या करें। वेंटिलेटर हैं, लेकिन उन्हें ऑपरेट करने वाले टेक्नीशियन नहीं हैं। जिन छोटे-छोटे नर्सिंग होम में मरीज़ भरे हुए हैं, वे सामान्यतया विज़िटिंग डॉक्टर्स के बेस पर बने हुए हैं और अब उनमें मरीज़ तो हैं लेकिन डॉक्टर्स की कमी है।
मरीज़ों के परिजन जब विकल हो जाते हैं तो उनका ग़ुस्सा डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन पर उतरता है। विवशता ने इतना अमानवीय बना दिया है कि अस्पताल के बाहर पड़ा रोगी इंतज़ार कर रहा है कि भीतर किसी की साँसें रुक जाएँ तो मुझे बैड मिले!
इन परिस्थितियों में स्वयं को खड़ा करके सोचा तो डॉक्टर्स पर नाराज़ होते परिजन भी ग़लत नहीं लगे; मरीज़ के आगे लाचार खड़े डॉक्टर भी अपनी जगह किसी हद्द तक सही लगे; और अस्पताल के बाहर किसी के मरने की प्रतीक्षा करता रोगी भी पूरी तरह ग़लत नहीं लगा।
फिर ग़लत है कौन? इस सबका दोषी है कौन? राजनैतिक या कार्यपालिका के स्तर पर किसी से पूछो तो वह हमें ‘पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’ का पाठ्यक्रम पढ़ाने लगता है। उसका फोकस समस्या का समाधान ढूंढने से ज़्यादा इस बात पर होता है कि इस समस्या का ठीकरा उसके सिर न फूट जाए। इन चारित्रिक दरिद्रों की स्थिति देखकर मेरा साधारण-सा प्रश्न यह है कि जब अभी तक यही स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस सिस्टम में किस काम के लिए उत्तरदायी कौन होगा, तो पिछले सात-आठ दशक से यह सिस्टम का भौंडा नाटक क्यों चल रहा था?
पूरे तंत्र में हर अधिकारी केवल अपनी टेबल से फाइल को किसी अन्य की टेबल पर स्थानांतरित करने का ‘काम’ कर रहा है।
बाढ़ आने के बाद पुल बनाने का ड्रामा सिस्टम के लिए शर्मनाक है। लेकिन जो गाँववाले बाढ़ आने के बाद बेतरतीबी से ही सही, डूबतों को बचाने के लिए दौड़ पड़ते हैं; वे स्तुत्य होते हैं। हमारे समाज में भी इस समय ऐसे लोगों की उपस्थिति है, जो ख़ुद घुटनों-घुटनों पानी में खड़े होकर किसी डूबते को बचाने के लिए हाथ बढ़ा रहे हैं। लेकिन हमारे समाज में ऐसे भी लोग मौजूद हैं जो इन हाथ बढ़ाते लोगों के पाँव डगमगाने के लिए प्रयासरत हैं।
कालाबाज़ारी और मुनाफाखोरी से ग्रसित इस समाज में यदि कोई सहृदय व्यक्ति किसी समस्या और समाधान के मध्य सेतु बनते हुए किसी का लिंक किसी पीड़ित को फॉरवर्ड कर देता है, और दुर्भाग्य से वह फोरवार्डिड लिंक किसी मुनाफाखोर का निकलता है तो इसमें उस व्यक्ति की क्या ग़लती है, जो लिंक फॉरवर्ड कर रहा है। लेकिन इस स्थिति में हमारा सिस्टम बड़ी जल्दी एक्टिव होने लगता है। वह असली मुनाफाखोर को पकड़ने से पहले इस बेचारे संवेदनशील व्यक्ति को ज़रूर धर दबोचेगा। ऐसा मैं नहीं कह रहा, ऐसा वे लोग बता रहे हैं जो सहायता करनेवालों के हौसले पस्त करना चाहते हैं।
सड़ांध मारते इस सिस्टम में अपराध करना आसान है लेकिन किसी की मदद करना बेहद मुश्किल है। ‘तू ज़्यादा समाजसेवी बन रहा है’; ‘दूसरों के फटे में टांग मत फँसा’; ‘फटी के ढोल ख़रीदे हैं तो बजाने तो पड़ेंगे’ और ‘अपने घर में चुपचाप बैठ, घणी नेतागिरी मत कर’ जैसे जुमलों ने सामाजिक परोपकार की भावना को नपुंसक करने का काम अनवरत किया है। हमारे घरों में भी इन जुमलों से प्रभावित अभिभावकों की पूरी पीढ़ी सक्रिय है।
सामाजिक मदद के लिए आगे बढ़नेवाले का उपहास गली-नुक्कड़ों से लेकर बन्द कमरों तक हर जगह स्थान पा लेता है। हमारे थाने और कचहरियाँ तो इन लोगों के जज़्बे को भौंथरा करने के लिए निर्मित ही किये गए हैं। गांधी, बिनोवा और भगतसिंह के देश में यदि जनसेवा की निष्काम भावना के साथ यही व्यवहार होता रहा तो स्वयं को ‘जनसेवक’ कहकर सत्ता हथियानेवालों के हाथ समाज बार-बार ऐसे ही छला जाता रहेगा कि जिन अस्पतालों में ज़िन्दगी को साँस मिलनी चाहिए थी, वे ख़ुद ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ने लगेंगे और जिन डॉक्टरों की आँखों में तैरता आत्मविश्वास मरीज़ों के परिजनों को हौसला देता था, वे डॉक्टर ख़ुद आँखों में आँसू भरकर अपनी लाचारी का प्रेस्क्रिप्शन लिखते दिखाई देंगे।
एक बात साफ़ समझनी होगी कि जो मरहम लगाने वाले के मरहम को मिर्च कहकर भ्रांति फैला रहा है, उसकी अपनी चुटकी में मरहम तो दूर, मिर्च भी नहीं मिलेगी।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
एक महोदय ने अनजान नम्बर से अभी मुझे व्हाट्सएप पर मैसेज किया कि मैं फलानी जगह पर हूँ और यहाँ अस्पताल में एक परिवार मुझे महान सहायक मानकर मुझसे 10000 रुपये की अपेक्षा कर रहा है। मेरे खाते में केवल 3500 रुपये ही हैं। आप कृपया मुझे 10000 रुपये जमा करवा दो ताकि मैं उसकी दृष्टि में ‘महान’ बना रह सकूँ।
जब तक मैं इस संदेश को पढ़कर समझ पाता, तब तक किसी अन्य का फोन आ गया और मैं किसी कार्य में व्यस्त हो गया। काम निबटाकर जैसे ही व्हाट्सएप देखा तो श्रीमान जी अपने पुराने मेसेज डिलीट फ़ॉर आल करके नीचे सभ्य शब्दों में गाली देकर विदा हो गये।
यह घटना केवल इसलिए बता रहा हूँ कि आपकी भावुकता का लाभ उठाकर कहीं कोई आपके साथ छल करे तो सावधान हो जाएँ। धन की सहायता तब तक किसी की न करें, जब तक उससे आपका या आपके किसी अपने का सीधा परिचय न हो।
आशा है आप मेरा आशय समझ सकेंगे।
चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
कोविड के कारण स्थितियाँ निश्चित रूप से विकट हैं, किंतु इस समय में आपको और हमको अधिक उत्तरदायित्व तथा विवेक के साथ आचरण करने की आवश्यकता है। कुछ बातों का सब लोग ध्यान रखें तो स्थिति सामान्य होने में मदद मिलेगी –
1) यदि घर में कोई रुग्ण हो तो उसका ऑक्सीजन लेवल और तापमान मापते रहें, जब तक ऑक्सीजन लेवल 94 से नीचे न होवे तब तक घबराकर अस्पताल भागने से बचें।
2) किसी अप्रिय स्थिति के अंदेशे में दवाइयाँ और ऑक्सीजन सिलेंडर स्टॉक करके न रखें, यह आचरण शेष लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा है।
3) किसी भी स्थिति में कोविड सम्बन्धी कोई भी जानकारी सार्वजनिक करने से पूर्व उसकी पुष्टि अवश्य करें। एक ग़लत सूचना दर्जनों लोगों का समय नष्ट करके उन्हें मौत के मुँह में पहुँचा सकती है।
4) कोई भी उपयोगी फोन नम्बर सार्वजनिक करने की बजाय वह नम्बर ज़रूरतमंद को इनबॉक्स में दें, अन्यथा अनावश्यक कॉल अटैंड करके लोग परेशान हुए जा रहे हैं।
5) पैनिक न क्रिएट करें, किसी भी चुनौती में धैर्य तथा विवेक से ही समाधान निकल सकेगा। हड़बड़ाहट में काम बनने की बजाय बिगड़ते ही हैं।
6) डॉक्टर्स और अस्पतालों पर भरोसा करें। सामान्यतया कोई डॉक्टर जान-बूझकर अपने किसी मरीज़ को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। किन्तु यह भी ध्यान रखें कि डॉक्टर भी अंततः इंसान ही है। इसलिए ग़लती और अपराध के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित करें।
आपका विवेक ही इस दौर का पहला उपचार है।
चिराग़ जैन