Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
वर्ष 2005 में हिंदी कवि सम्मेलन टेलिविज़न के परदे पर नए रूप में अस्तित्व खोज रहे थे। तमाम चैनल प्राइम टाइम में कवि सम्मेलन दिखा रहे थे, लेकिन कवि सम्मेलनों का परंपरागत प्रारूप टीवी के फॉर्मेट में फिट नहीं हो पा रहा था। ऐसे में सम्भवतः 2005 में talent hunt का प्रयोग करके कवि सम्मेलन का प्रारूप टीवी के अनुरूप बनाने का प्रयोग किया गया। प्रयोग बहुत सफल तो नहीं रहा लेकिन यहाँ से यह बात सिद्ध हो गई कि बिना स्वरूप परिवर्तन के कवि-सम्मेलन को अधिक समय तक टीवी पर दिखाना सम्भव नहीं है।
इस talent hunt में मैं भी एक प्रतिभागी था, निर्णायक मंडल में थे श्री ओमप्रकाश आदित्य, डॉ बशीर बद्र और उर्वशी ढोलकिया। एंकर थे शैलेश लोढा और तनाज़ करीम। शंभू शिखर, पवन आगरी और रमेश मुस्कान सरीखे कवि भी इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे।
मेरा शैलेश भाई से पहला परिचय पहले हो चुका था, लेकिन इस शो के सेट पर उनकी लगभग सनकी धुन ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
इसके बाद मैंने अनेक बार शैलेश भाई से मुलाकात की। हर समय शरारत से भरे रहना और हर क्षण सतर्क रहने का उनका कौशल देखकर, उन्हें और अधिक जानने की जिज्ञासा जी उठी।
समान्य दृष्टि से उन्हें समझ पाना सम्भव नहीं है। उनसे जब मिलो, वे किसी अलग मानसिकता अथवा दार्शनिक अवस्था में मिलते हैं। मुंबइया जीवन की रूखी व्यावसायिकता से घिरे हुए जब उन्हें कवि सम्मेलन का कोई पुराना साथी मिल जाता है तो वे एक झटके में ग्लैमर और सेलिब्रिटिज्म का कोट उतारकर, कवि सम्मेलन के देसी गमछे से मेकअप पोंछ डालते हैं। इस अनुष्ठान के उपरांत वे जोधपुर के बेहद भावुक और सरल इंसान बन जाते हैं। इस अवस्था में वे सिर से पाँव तक खालिस ‘दोस्त’ होते हैं। इस समय उन पर अधिकार जताया जा सकता है, इस समय उनसे बेतकल्लुफ बातचीत की जा सकती है, इस समय उनके साथ ‘जी लगदा यार फकीरी में’ का अनुभव लिया जा सकता है।
इसी समय में वे अपने सर्वाधिक ख़ूबसूरत पल जी रहे होते हैं। इस समय वे सर्वाधिक निश्चिंत होते हैं।
लेकिन इस निश्चिंतता में कोई ख़लल न पड़े, इसलिए इस निश्चिंत महफ़िल को संजोने में वे कई बार आवश्यकता से अधिक चौकन्ने रहने का प्रयास करते हैं। दोस्तों पर वे संदेह नहीं करते, लेकिन किसी को दोस्ती के दायरे तक लाने से पहले अच्छी तरह विचार अवश्य करते हैं।
उनकी भावुक आँखों में उतरी पनीली लकीरों में मुझे भावुकता के हाथों छले जाने के उनके कटु अनुभवों को कई बार लाली बिखेरते देखा है।
अतीत की यादों का सूरज जब आँखों में उगता है तो कड़वाहट से आंखें लाल हो जाती हैं और भावुकता से नम!
मैंने नमी और लाली के इस क्षितिज पर अपनी व्यस्तता से जूझकर अपने लिए मुट्ठी भर समय जीत लाने वाले शैलेश लोढा को हर बार दिल से प्यार किया है, और अपने मन की महफ़िल के सम्मोहन से मुख मोड़कर अपनी व्यस्तता के घने जंगल की ओर दौड़ जाने वाले शैलेश लोढा का जी भर आदर किया है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
ख़ुद से मिलने की ख़ुशी क्या होती है, इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैंने कम्यून में प्रवेश किया। हर चेहरे पर एक नैसर्गिक प्रसन्नता, हर आँख में एक प्राकृतिक चमक, हर पाँव में एक अनायास थिरक …उत्सव वहाँ आयोजित नहीं, घटित हो रहा था। वहाँ सब अपने पूरे अस्तित्व के साथ घूम रहे थे। वहाँ सब अपने पूरे अस्तित्व के साथ ख़ुश थे।
यत्र तत्र सर्वत्र मैरून रोब में ‘मनुष्य’ घूम रहे थे। मैंने पहली बार महसूस किया कि यदि तरतीब से उकेरा जाए तो हरियाली के बीच कंक्रीट की उपस्थिति भी ख़ूबसूरत लगने लगती है। कम्यून में कहीं भी प्रकृति से होड़ नहीं दिखाई देती, बल्कि ऐसा अनुभूत होता है कि कोई पूर्ण मनुष्य प्रकृति के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा हो गया होगा और प्रकृति ने ‘सहर्ष’ उसे स्वीकार लिया होगा। यही कारण है कि पूरे परिसर में प्रकृति और मनुष्य के मध्य परस्पर ‘अभय’ का सम्बंध है।
जब मैं चाय लेने के लिए काउंटर पर गया तो एक मोर अपने गज भर लंबे पंखों के साथ मेरे आगे क्यू में लगा हुआ था। दिन में प्लाजा में बैठे थे तो एक कौवा मनुष्यों के साथ अपने पूरे अस्तित्व के साथ सहज ही बैठा रहा।
मन में आह्लाद लिए जब कोई मनुष्य वंश-झुरमुट के पास से गुज़रता है तो वयोवृद्ध बांस भी हवा का हाथ थामकर अंगड़ाई लेने लगते हैं। उस समय बांस के परस्पर स्पर्श से जो आवाज़ उत्पन्न होती है वह किसी पुराने किवाड़ के खुलने का स्वर है। सचमुच, उस परिसर में विवेक के कपाट खुलने लगते हैं। सचमुच, उस परिसर में सोच ख़ूबसूरत होने लगती है। सचमुच उस परिसर में काग का कर्कश स्वर भी जीवन के अनवरत संगीत का सहयोग करने लगता है।
नृत्य और हास्य; इन दो तत्वों से परिसर का वातावरण लबालब भरा हुआ है। और इन्हीं दोनों तत्वों ने पूरे परिसर को आनंदधाम बना दिया है। परिसर की वनस्पति इस पवित्र आनंद से एकाकार हो चुकी है। यही कारण है कि सूर्य की रोशनी भी कम्यून की धरती को स्पर्श करने से पहले पेड़ों की शीतलता से कर-प्रक्षालन कर लेती है।
ओशो समाधि के पीछे एक लगभग जंगल जैसा रास्ता भोजनालय की ओर जाता है। इस रास्ते पर कहीं पेड़ के नीचे बुद्ध की मूर्ति रखी दिखाई देती है, तो कहीं बुद्धत्व की एकांत साधना में तिष्ठ कोई साधक दिखाई दे जाते हैं। एकांत और मौन कितना सुंदर होता है, यह इस छोटे से जंगल में पता चलता है।
भोजन करने के बाद हम ओशो समाधि पर गए। लगभग 25-30 मिनिट उस स्थान पर बैठकर मैंने मौन का सुख भोगा। मैंने महसूस किया कि जब कान दुनियावी आवाज़ों से फ़ुरसत पाते हैं तो कुछ देर तक मन मुखर हो जाता है और जब मन भी अवाक् हो जाता है, तब जो घटित होता है …वह आनंदातीत है।
मैंने अनुभव किया उत्सव तक पहुँचने के लिए निश्छल होना प्रथम वरीयता है। उत्सव आसान काम नहीं है। उत्सव के लिए संपूर्ण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसीलिए उत्सव मनाते समय मन को अपनी समस्त चेतना एकाग्र करनी होती है। तब कहीं जाकर भीतर के टर्बाइन घूमते हैं, तब कहीं जाकर विद्युत उत्पन्न होती है, तब कहीं जाकर जीवन उज्ज्वल हो उठता है।
इस प्रक्रिया में अन्यत्र ध्यान ले जाने की गुंजाईश ही नहीं है। इस प्रक्रिया में ध्यान भटकाने का स्कोप ही नहीं है। इस प्रक्रिया में किसी अनुसरण का होश ही नहीं है। इस प्रक्रिया में कोई प्रक्रिया ही नहीं है। इसीलिए वहाँ हर व्यक्ति अपने पूरे अस्तित्व के साथ उत्सवमयी था।
कोई एकांत में बैठकर ध्यान कर रहा है, तो कोई पिछले द्वार पर बनी दो समाधियों के पास चटाई बिछाकर सो रहा है। कोई किसी वृक्ष से आलिंगनबद्ध है, तो कोई बस यूँ ही किसी शिला पर बैठकर वातावरण को जी रहा है। कोई आते-जाते मनुष्यों को साक्षीभाव से निहार रहा है तो कोई प्रकृति के अनवरत अनायास संगीत पर थिरक रहा है। कहीं मेज के चारों ओर कुर्सियाँ बिछाकर ठहाकों का रॉक शो हो रहा है तो कहीं स्वादिष्ट भोजन के चटखारे से स्वाद की ग्रंथियां सरस हो रही हैं।
शाम होते-होते मैरून मनुष्य श्वेतवर्णी हो उठे। बड़े से जलाशय के मध्य काले पत्थर से बने रास्ते को ये श्वेताकृतियाँ जब समूह में पार करती हैं, तो किसी कल्पनालोक का दृश्य उपस्थित होता है। सरोवर के श्यामल दर्पण में जब इन श्वेतवसनधारियों का प्रतिबिंब बनता है तो ऐसा लगता है मानो रात के निविड़ अंधियारे में हंस तैर रहे हों।
ऐसे न जाने कितने ही एल्बम छप गए हैं मेरे अंतस पर। दो दिन के प्रवास के बाद जब शाम को कवि-सम्मेलन प्रारम्भ हुआ तो ऐसा लगा, जैसे ये सब लोग इतने दिन से यही तैयारी कर रहे थे कि हँसी की किसी बात पर ठहाका लगाने से चूक न जाएँ। इतनी सहज खिलखिलाहटें, इतने निश्छल ठहाके, इतनी नैसर्गिक हँसी… मैं काव्यपाठ के दौरान आनंद से भर रहा था। मैंने पहली बार अपने भीतर से फूटती हँसी का स्वाद चखा।
दो दिन का कम्यून जीकर मैं पुनः घर लौट आया हूँ, लेकिन इस बार मैं अपने भीतर रत्ती भर ओशो चुरा लाया हूँ, जो रह रहकर मुझे मेरे अस्तित्व से मिलवाते रहेंगे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
बात उस दौर की है, जब हिन्दी कवि सम्मेलनों के समापन काव्य पाठ की डोर पर से गीतकारों की गिरफ्त ढीली पड़ रही थी। राजनैतिक परिप्रेक्ष्य और सामरिक परिदृश्य ने तनाव इतना बढ़ा दिया था कि मंच के एक कोने में बैठने वाला हास्य-कवि जनता को आकृष्ट करने लगा था। कवि सम्मेलन बदलकर ‘हास्य कवि सम्मेलन’ होने लगे थे।
घनाक्षरी और दोहे जैसे छन्द हास्य के परिधान पहन कर इतराने लगे थे। हास्य गीत, पैरोडी, बतरस, चुटकियां और चुटकुले लोकप्रियता के सिंहासन पर विराजमान थे। भीगी कोरों और गुलाबी मुस्कानों के स्थान पर ‘ठहाकों’ ने श्रोता दीर्घा को आलिंगनबद्ध कर लिया था।
यद्यपि गीत के अनेक पुराने अलमबरदार मंच पर अभी भी उपस्थित थे किंतु हास्य की प्रभावशाली सत्ता के कारण मंच पर आनेवाले नए रंगरूटों का आकर्षण, गीत के स्थान पर हास्य की ओर अधिक था।
इस स्थिति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक नौजवान अपनी आवाज़ में खनक और संस्कारों में बृज का परिवेश लेकर मंच पर चढ़ा। इस युवा की भाषा इतनी सरल थी कि ठहाके के मोहपाश में बंधे हुए श्रोता भी शृंगार के इस स्वर को अनसुना न कर सके। श्याम रंग में रंगा यह गीतकार, अपना इकहरा बदन लिए जब माइक तक आता था, तो समान्य देहयष्टि के कारण बहुत समान्य ही प्रतीत होता था किंतु जैसे ही अपनी सधी हुई आवाज़ में डुबोकर शब्दों का उच्चारण करता था तो श्रोता दीर्घा को सम्मोहित कर लेता था।
बीच में ऐसे भी दौर आए जब कारगिल युद्ध के समय लोगों ने अपने मूल स्वभाव को छोड़कर वीर रस लिखना शुरू कर दिया। लेकिन डॉ विष्णु सक्सेना ने हर दौर में, हर हाल में बस प्रेम ही गाया।
इस एकाग्र साधना के परिणामस्वरूप आज कवि-सम्मेलन जगत् में उनका न केवल अलग मुकाम है, अपितु विशेष पहचान भी है। डॉ विष्णु सक्सेना उन अंगुलगणित कवियों में शुमार हैं, जिनका अपना नैसर्गिक फैन्स क्लब है।
गीत और सृजन के प्रति उनकी निष्ठा तथा अनवरत सक्रियता उन्हें अनुकरणीय बनाती है। लगभग चार दशक के उनके कवि सम्मेलनीय जीवन मे कई खरगोश उन्हें चुनौती देते हुए दौड़ गए, किंतु अपने छोटे-छोटे कदमों से धरती नापते हुए वे लगातार चल रहे हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि कौन इस ट्रैक पर उनसे आगे दौड़ रहा है और कौन उन्हें ओवरटेक कर रहा है!
तकनीक के बदलते चेहरे पर अपनी साधना का तिलक लगाने के लिए वे आजकल अनवरत कार्य कर रहे हैं। कवि-सम्मेलन की यात्राओं के बावजूद निरंतर सृजनरत रहकर कला की पूंजी को समृद्ध करनेवाले चुनिंदा लोगों में से एक डॉ विष्णु सक्सेना का आज जन्मदिन है।
ईश्वर उनकी एकाग्र साधना में त्राटक सिद्ध करे! सृजन की ईमानदार साधना उनकी सकारात्मकता के तंतुओं को पुष्ट करे! प्रेम की सुगंध का आवरण उन्हें कपट की खरपतवार से अछूता रखे -इसी शुभेच्छा के साथ उन्हें जन्मदिन की lovely बधाइयाँ।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
शेर कहने का सलीक़ा तो ज़रूरी है मगर
शेर सुनने के भी आदाब हुआ करते हैं
कविता सुनने वाले अगर कविता की हर पंक्ति से प्रस्फुटित रश्मियों के पीछे दौड़कर अर्थ के असंख्य बिम्ब देख पाएं तो कविता-पाठ करने वाले को आनंद आ जाता है। कवि की भावभूमि का पर्यटन यदि श्रोता न कर पाए, तो कविता-पाठ नाद बनने की बजाय शोर बनकर रह जाता है।
लेकिन बीते बुधवार अर्द्धचंद्र की संतुलित चांदनी में गुलाबी सर्दी की मीठी बयार के बीच, कविता के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बैठक में सुनाने वालों को भी सुनने वालों से कम आनंद नहीं आया होगा।
यूँ समझ लीजिए कि खेत से निकलकर फसल मंडी में बिकने की बजाय बीज बन रही थी। श्रोता दीर्घा में श्रीमती ममता कालिया, डॉ सरिता शर्मा, गुणवीर राणा,
श्लेष गौतम, सुदीप भोला, राजीव राज, निकुंज शर्मा, रामायण धर द्विवेदी, स्वयं श्रीवास्तव, ज्ञान प्रकाश आकुल, गौरव दुबे, शिखा दीप्ति, शंभू शिखर, रमेश मुस्कान, मध्यम सक्सेना, ओम निश्छल, कुमार संजाॅय सिंह, सुमित अवस्थी, अरुण महेश्वरी, विमल त्यागी, आयुष और अदिति सरीखे सावचेत मन विद्यमान हों। काव्यपाठ के लिए कबीरी तेवर के यश मालवीय जी हों, किशन सरोज सरीखी गीतता से युक्त विनोद श्रीवास्तव जी हों और ऑलपिन पर शहद लगाने का हुनर रखने वाले शायर इक़बाल अशहर हों। संचालन के माइक पर कविता तिवारी हों। व्यवस्था को चाक चौबंद रखने के लिए प्रवीन पाण्डेय जैसे कुशल व्यवस्थापक हों और इस पूरे वृत्त के निर्माण का केन्द्रबिन्दु डॉ कुमार विश्वास का सम्मोहक व्यक्तित्व हो तो ऊर्जा और आनंद के लिए वहाँ घटित होना स्वाभाविक था।
इस महफ़िल में हर पंक्ति पर प्रतिक्रिया थी। आँसू को भी कविता बना लेने वाले ये श्रोता कभी दर्द में डूबी हुई किसी ग़ज़ल पर ठठाकर हँस पड़ते थे, तो कभी किसी आनंद की अभिव्यक्ति को सुनकर उस आनंद के पार्श्व में विराजित टीस पर त्राटक करने लगते थे। कभी मिसरा-ए-सानी की अदायगी से पहले ही किसी चुटकी से महफ़िल में ठहाका गूँज जाता था तो कभी किसी गीत-सूक्ति पर कोई दो श्रोता आँखों ही आँखों में हज़ारों बातें कर गुज़रते थे। लेकिन श्रोता दीर्घा की यह जीवंतता कविता-पाठ के लिए व्यवधान न होकर संगत बनी जाती थी।
बहुत दिन बाद ऐसे कविता सुनी, जैसे आज से एक दशक पहले मंच पर बैठकर हम और हमारे वरिष्ठ सुनते थे। जीवंतता और आनंद की कोई कमी नहीं होती थी, प्रत्युत्पन्नमति के अस्त्र से कविता पाठ कर रहे कवि के साथ थोड़ी छेड़छाड़ और शरारत भी हो जाती थी लेकिन इस सबसे काव्यपाठ में व्यवधान नहीं होता था। लोगों का मानना है कि उस दिन केवी कुटीर में अच्छा कवि होने की झलकी दिखाई गई, जबकि मुझे लगता है कि इस कार्यक्रम की श्रोतादीर्घा वाले कैमरे को मास्टर बनाकर एडिटिंग की जाए तो दुनिया समझ पाएगी कि- “देखो, ऐसे सुनी जाती है कविता!”
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आर्टिस्ट ग्रीन रूम में तैयार था मगर
इस ज़िन्दगी ने मंच का परदा गिरा दिया
जिजीविषा की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद ठहाके का हिचकी में तब्दील होना यकायक पलकें नम कर गया। ऐसा लगा ज्यों किसी ने अचानक हमारे बिल्कुल आसपास की रौनक को वीराने में बदल दिया हो। मृत्यु को बहुत नज़दीक से देखा है, इसलिए भयभीत तो नहीं हुआ लेकिन विरक्ति का एक आश्चर्यबोध मन में अवश्य भर गया।
इस ख़बर को सुनने के बाद स्वयं से देर तक वाद-विवाद हुआ। क्या हम कलाकारों का संघर्ष कभी यह विश्व समझ पाएगा? क्या सफलता-विफलता के मध्य खड़े एक कोरे मनुष्य के ललाट का लेखा पढ़ने की फ़ुरसत कभी इस जगत् को मिल सकेगी? ट्रेड मिल पर दौड़कर स्वयं को सुदर्शन बनाए रखने की क़वायद हमें क्यों करनी पड़ती है, क्या इस प्रश्न का उत्तर यह दुनिया कभी ख़ुद से मांगेगी?
दिल्ली के निगम बोध घाट पहुँचा तो राजू भाई की अंत्येष्टि में भारी भीड़ थी। इस हुज़ूम में दस प्रतिशत मीडियाकर्मी थे, जो दुनिया को अलविदा कहकर जा रहे कलाकार की अंतिम यात्रा की कुछ फुटेज जुटाने के उद्देश्य से वहाँ उपस्थित थे। दस प्रतिशत कुटुम्बीगण थे, जिनके भीतर का रीतापन माप पाना उस दिन किसी पैमाने के वश में नहीं था। पन्द्रह-बीस प्रतिशत मित्र, सहकर्मी तथा प्रशंसक रहे होंगे, जो किसी साथी के छूट जाने की अंतिम छुअन को अनुभूत करने वहाँ पहुँचे थे।
इसके अतिरिक्त शेष सभी वहाँ एक साथ कई सारे सेलिब्रिटीज़ के साथ सेल्फ़ी खिंचाने का अवसर भुनाने पहुँचे थे। मसान के भयावह सत्य में एक ओर फूलों से सजी गाड़ी में से दिवंगत राजू श्रीवास्तव का पार्थिव शरीर उतारा जा रहा था और दूसरी ओर ‘अबे देख सुरेन्दर शर्मा’; ‘ओए वो देख अशोक चक्रधर’ की उत्सुक प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए लोग अपने स्मार्टफोन में तस्वीरें उतारने में व्यस्त थे।
एक बार तो मुझे लगा कि डिजिटाइज़ेशन ने मृत्यु की भयावहता को घिनौना भी बना दिया है। लेकिन फिर समझ आया कि एक आमजन के जीवन में कलाकार का कुल अस्तित्व मनोरंजन की एक रात या सेल्फी के एक अवसर से अधिक कुछ नहीं है। मैं भीड़ से दूर एक बेंच पर बैठा सब कुछ देख रहा था, कोई मेरे साथ फोटो खिंचाने आया भी तो मैंने अपने विरक्तिसिक्त मन से उसकी इच्छा पूरी कर दी।
एक ओर मंत्र पढ़े जा रहे थे, दूसरी ओर कुछ जोशीले युवा ‘राजू भाई अमर रहें’ के नारे लगा रहे थे। एक तरफ़ कुछ आँखें भीग रही थीं, दूसरी ओर कुछ चेहरों पर इस बात की ख़ुशी थी कि कितने सारे सितारे इतनी आसानी से मिल गए।
इस आसानी की क़ीमत चुकाकर राजू भाई चिता पर लेट चुके थे। शो-बिज़ का भौंडा दिखावा ज़ारी था। छोटे-मोटे कलाकार भरे मन से इस दिखावटी दुनिया में होने का मूल्य अदा कर रहे थे और असली फनकार चिता की लपटों में लिपटा हवा हुए जा रहा था। चिता के धुएं से हवा में कुछ आकृतियाँ उभर रही थीं, मानो ठहाकों का शहंशाह हवा की मिमिक्री करता हुए दूसरे लोक में जा रहा हो…!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
एक वर्ष पूर्ण हो गया। आज ही के दिन सुबह दस बजे अपने घर को और घर के दरवाज़े पर खड़ी माँ को जी भरकर निहारने के बाद मैं अस्पताल पहुँच गया था। मेदांता के एक बेड पर मेरा नाम लिख दिया गया था। हाथ पर एक पट्टा बांध दिया गया था, जिसके रहते अस्पताल की अनुमति के बिना सशरीर उस परिसर से बाहर निकलना सम्भव नहीं था।
डॉ अनिल भान ने मेरी रिपोर्ट्स देखकर अगले ही दिन ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। अगले दिन ऑपरेशन हो जाए इसके लिए अच्छी-ख़ासी रक़म एडवान्स जमा करनी थी। उस पर भी तकनीक का तुर्रा ये कि अस्पताल केवल क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ही राशि स्वीकार करता था। लाखों रुपये यकायक क्रेडिट कार्डस से भुगतान करने के लिए मेरा परिवार एक-एक संपर्क को फोन करने में जुट गया।
अस्पताल प्रशासन को अनुभव था कि जिसका मरीज़ जीवन-मृत्यु के बीच जूझ रहा हो वह पैसा जुटा ही लेगा। सो, परिवारवालों को उनके संघर्ष के भरोसे छोड़कर मेरी आवश्यक जाँच कराने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। व्हीलचेयर पर बैठकर मैं विभाग दर विभाग भटकता रहा। हाथों में इतनी बार सूई चुभ चुकी थी कि अब दर्द होना बंद हो गया था।
परिवार का जो सदस्य मेरे साथ इस परीक्षण-पर्यटन में उपस्थित होता, वह बाहर चल रही आर्थिक कवायद को छुपाने का भरसक प्रयास करता लेकिन भय से भीगी आँखों में उत्पन्न झुंझलाहट में मैं वह सब पढ़ पा रहा था।
मेरी दोनों बहनों और बहनोई ने धरती-अम्बर एक करके रात 2 बजे तक अस्पताल की पेमेंट क्लियर कर दी। इस संघर्ष से पार पाकर जब छोटी बहन मेरे पास आई तो मुझे एंजियोग्राफी के लिए ले जाया जा रहा था। सुबह जिस भाई को स्मार्ट कपड़ों में भर्ती कराया था उसे अस्पताल के ढीले ढाले कपड़ों में नलियों से घिरा देखकर उसके चेहरे का रंग उतर गया। मुझसे नज़रें मिलीं तो अलक तक चढ़ आए आँसू को भीतर धकेलने की हिम्मत दिखाते हुए बोली- ‘सब फिट हो गया, डॉक्टर ने कहा है कल ऑपरेट हो जाएगा। सारे टेस्ट परफेक्ट हैं।’
मैं भी अपने हिस्से का अभिनय करता हुआ हामी भरकर एंजियोग्राफी के लिए चल पड़ा। सुबह से उपवास पर था, और उस पर परीक्षण की भागदौड़ के कारण सामने खड़ी मृत्यु से भयभीत होने की फुर्सत ही नहीं मिली।
जब भी कोई नर्स या डॉक्टर इंजेक्शन लेकर आता तो मैं ‘मंटो’ की ‘खोल दो’ कहानी याद करके हँसते हुए दोनों हाथ आगे कर देता था। अस्पताल के भीतर समय का भान ग़ायब हो गया था।
थकान जब तनाव से लिपट कर सो रही थी, तब मुझे यह सोचने की मोहलत मिली कि शायद अपना सफ़र यहीं तक का था। यह बात सोचकर घबराने ही वाला था कि किसी ने कान में कहा- ‘मूर्ख, विचलित क्यों होता है। यही तो विवेक की परीक्षा है। विपरीत परिस्थिति में सहज रह सके तभी तो पता चलेगा कि स्थितप्रज्ञ क्या होता है।’ नज़र घुमाकर देखा तो कमरे में कोई नहीं था। शायद मैं ख़ुद से बात कर रहा था।
‘समस्या को स्वीकार कर लेना समाधान की ओर पहला क़दम है। जो होगा देखा जाएगा, तू बस इस पूरी प्रक्रिया को साक्षीभाव से देख। अगर जिवित बच गया तो यह अनुभव तेरे सृजन को प्रभावी बना देगा।’
मैंने आँख खोली तो नीले कपड़े पहने एक नर्स अपनी पूरी जान लगाकर मेरे हाथ पर एक पट्टी कस रही थी। कलाई पर जहाँ एंजियोग्राफी का कट लगा था, उस हिस्से पर बिटाडीन जैसी कोई दवाई पुती हुई थी और एक सख़्त-सी चीज़ से कटी हुई नस को दबाकर बहुत टाइट पट्टी बांध दी गई थी। वह सख़्त चीज़ लगातार हाथ को पीड़ा पहुँचा रही थी। पीड़ा का अभ्यास करते हुए जाने कब मुझे नींद आ गई। सुबह आँख खुली तो पूरी कलाई पर नील पड़ गया था। समान्य स्थिति में इतना गहरा नील दिखता तो चिन्ता हो जाती, लेकिन अब एक बड़ी समस्या सामने थी इसलिए इस नील से कोई भय उत्पन्न नहीं हुआ।
कलाई लगातार दुःख रही थी। लेकिन मैं इस प्रक्रिया के अधिकतम कष्ट को स्वीकार कर चुका था, सो यह पीड़ा मेरी भंगिमा को प्रभावित नहीं कर पा रही थी। मुझे समझ आ गया था कि यह जो कुछ हो रहा है इसका न तो कारण मैं हूँ, न ही इसका निवारण मेरे पास है। इसलिए क्षोभ, करुणा, पीड़ा जैसा कोई भाव मुझे स्पर्श नहीं कर पाता था। सृजन का भरपूर सुख भोगा था इसलिए जीवन से कोई शिक़ायत भी नहीं थी। वैभव और सांसारिक कष्ट ख़ूब भोगे थे इसलिए कोई अधूरी इच्छा भी याद नहीं आ रही थी। माता-पिता के बुढ़ापे को सोचकर पलकें भीगी ज़रूर, लेकिन अपनी बहनों के समर्पण और विश्वास का सम्मान रखने के लिए नयन कोर को आँसू के भार से बचाए रखा।
बच्चे याद आए तो भी मन को यह कहकर समझा लिया कि वे अपनी ‘माँ’ के संरक्षण में हैं, इसलिए मेरा अभाव झेल जाएंगे।
मेरी दोनों बहनें और बहनोई मुझे यमराज से छीन लाने की सावित्री साधना कर रहे थे। माँ घर पर रहकर इस संशय से जूझते हुए सबका खाना बनाकर भेजती रही और पिताजी मेरी तरह निःशब्द होकर इस घड़ी के बीत जाने की बाट जोहते रहे।
नर्स ने बताया, पेशेंट को सर्जरी के लिए ले जाना है। जो बहनें इस घड़ी के लिए कल रात तक पैसा जुटा रही थीं, उनका मौन चीख पड़ा। कुछ ही मिनिट बाद मैं सब अपनों से दूर प्री-ओटी में था। यहाँ एक बार फिर ब्लड प्रेशर और स्ट्रेस लेवल की जाँच की गई। रिपोर्ट का हर आँकड़ा परफेक्ट था। मेरी देह और मेरा मानस शल्यक्रिया के लिए तैयार था।
एनेस्थीसिया के डॉक्टर ने मुझे पहचान लिया। वह टीवी पर मुझे देख चुका था। उसने बातचीत करनी शुरू की और मेरी सहजता को और निश्चिंत कर दिया।
मुझे व्हीलचेयर पर बैठकर ऑपरेशन थियेटर तक चलने को कहा गया लेकिन मैंने अनुरोध करके अपने पैरों पर चलकर जाना चाहा। हल्की सी ना-नुकर के बाद डॉक्टर ने मेरा अनुरोध मान लिया। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं इस महत्वपूर्ण सफ़र को अपने पैरों से तय करना चाहता था।
मुझे अच्छी तरह याद है, ओटी की ओर जाते समय डॉ भान ने एक दरवाज़े में से झाँककर कहा था- ‘चलो कवि जी, आपसे दिल खोलकर मिलते हैं।’
मुझे उनका हास्यबोध अच्छा लगा। ओटी में स्ट्रेचर पर लेटते ही डॉक्टर्स की एक फौज ने मेरे स्ट्रेचर को घेर लिया। सब तेज़ी से अपने अपने काम में जुट गए। मेरे शरीर पर अलग-अलग नलियाँ लगने लगीं, तरह-तरह की मशीनों से मुझे जोड़ दिया गया। मेरठ के एक डॉक्टर साहब ने मुझसे कविता सुनाने का आग्रह किया। मैं थोड़ा घबराया हुआ था सो उन डॉक्टर साहब की शक्ल देखने लगा। वे मेरी मनोदशा भाँप गए और बोले, चलो मैं सुनाता हूँ। उन्होंने रश्मिरथी का शांतिपर्व पढ़ने की शुरुआत की। …सह धूप घाम पानी पत्थर …पाण्डव आए कुछ और निखर …मेरा भय विलुप्त हो गया। मुझे लगा कि यह शल्यक्रिया मृत्यु की ओर नहीं ब्लकि एक निखरे हुए जीवन की ओर ले जा रही है। मेरी मनोदशा सकारात्मक हो गई।
क्षण भर में मैंने महसूस किया कि देशभर में मेरे अपने मेरे जीवन की दुआ कर रहे हैं। सुरेन्द्र जी, अरुण जी, मनीषा, प्रवीन, देवदत्त, सुष्मीत, पँवार जी… इन सबसे तो मेरी बात हुई थी। सभी की आवाज़ में स्नेहसिक्त चिंता थी। जब इतने सारे लोग चिन्ता करने के लिए उपस्थित हैं तो मैं क्यों चिन्ता करूँ। मैंने रश्मिरथी के पाठ में अपना स्वर मिला दिया। …मुझमें विलीन झंकार सकल …मुझमें लय है संसार सकल …अमरत्व फूलता है मुझमें …तभी मेरी काया में सूई चुभी और मेरी चेतना लुप्त हो गयी।
इसके बाद किसी ने मेरे गाल थपथपाते हुए मेरा नाम पुकारा। मैंने आँखें खोलीं तो नाक, मुँह और पेट में अलग-अलग तरह की नलियाँ लगी थीं। गाल थपथपाने वाले व्यक्ति ने पूछा- ‘कुछ पिछला याद है?’ मैंने वेंटिलेटर लगे गले से बोलने का प्रयास किया- ‘सब कुछ।’
डॉक्टर- ‘कुछ ऐसा याद करो, जो बचपन में पढ़ा हो।’
मैं- ‘जटाटवीगलज्ज्वल प्रवाहपावितस्थले…’
‘मेमोरी ओके!’ -डॉक्टर ने बीच में ही टोक दिया।
डॉक्टर के चेहरे के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि युद्ध जीता जा चुका है, अब ये नलियाँ हटाने की साधना करनी है।
अब तक बाहर खड़े रहकर मेरी मृत्यु से लड़ रहे मेरे अपने आईसीयू के द्वार तक आ पहुँचे थे। मैं उन सबकी हँसती हुई आँखों में वो सारा दर्द देख पा रहा था, जो मेरे दिल की चीर-फाड़ के समय एनेस्थीसिया की ओट में छिप गया था।
एक महीने बाद जब घर लौटा तो घर में घुसते ही मैं बिलखकर रो पड़ा था। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि इस घर में मैं सही-सलामत लौट आया हूँ।
अब वही भागदौड़, वही व्यस्तता, वही आपाधापी फिर से जीवन का हिस्सा बन गई है। इस एक वर्ष में मैंने हर उस दुआ का आभार व्यक्त किया है जो उस समय मेरे जीवन यज्ञ की समिधा बनने को तैयार थी।
अब जब कभी कोई संकट मेरे पास आना चाहता है, तो मैं उसे 6-7 जुलाई 2021 की कहानी सुनाकर ठहाका लगाता हूँ कि कहीं और जा बे, मैं तेरे अब्बा से मिल चुका हूँ!
✍️ चिराग़ जैन