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हो रही है थकान पानी को

किसलिए है गुमान पानी को
मारता है उफ़ान, पानी को

कुछ नमी हो तो घर हुआ जाए
ढूंढता है मकान पानी को

चैन से बैठती नहीं लहरें
हो रही है थकान पानी को

रेत में दफ़्न हो गया क़तरा
देने निकला था जान पानी को

सबके अंदर का सच बयां होगा
मिल गई गर ज़ुबान पानी को

✍️ चिराग़ जैन

मीडिया

मुद्दा, मुद्दई, मुजरिम तीनों लुटकर घर जाते हैं, पर
इस मेले में रोज़ मदारी का पैसा बन जाता है
सच को सच साबित करने में लगती है जितनी मेहनत
उससे कम में झूठ यहाँ पर सच जैसा बन जाता है

✍️ चिराग़ जैन

मत पूछिए

शायरी में ढूंढ लेना सिसकियों की दास्तां
चश्मे-तर की सुर्ख़ियां अख़बार से मत पूछिए

आदमी होकर सियासत में दख़ल मुम्किन नहीं
आदमीयत का पता सरकार से मत पूछिए

दुश्मनी ही कर रहे हो तो ज़रा तल्ख़ी रखो
सच बता दूँगा मैं सब कुछ, प्यार से मत पूछिए

शुक्र है आवाज़ से महरूम होती है दुआ
किस क़दर ऊबा है घर, बीमार से; मत पूछिए

✍️ चिराग़ जैन

शायरी से गुज़र रहा हूँ मैं

अब सही काम कर रहा हूँ मैं
अपने अंदर उतर रहा हूँ मैं

मैं कहाँ हूँ बता नहीं सकता
शायरी से गुज़र रहा हूँ मैं

चाहतें जो मुझे चिढ़ाती थीं
उनके अब पर कतर रहा हूँ मैं

जी रहा हूँ ये बात भी सच है
ये भी सच है कि मर रहा हूँ मैं

✍️ चिराग़ जैन

मातम का माहौल न जाने

ज़िद पर आ जाएं तो क्या से क्या कर डालें साहिब जी
नाले के बहते पानी से आग जला लें साहिब जी

दर्द तुम्हारा सुन भी लेंगे, कर भी देंगे ठीक इलाज
लेकिन पहले ख़ुद तो अपने होश संभालें साहिब जी

मातम का माहौल न जाने कितना लम्बा चलना है
पहले अपना बढ़िया से फोटू खिंचवा लें साहिब जी

✍️ चिराग़ जैन

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