Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
रात काटें जागकर हम
दिन बिताते भागकर हम
व्यस्तता से घिर रहे हैं
क्यों उनींदे फिर रहे हैं
इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो
आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो
व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन ऐसा चुरा लें
काश बेपरवाह होकर आँख मूंदें, मुस्कुरा लें
याद की कुछ गठरियाँ खोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
पिंडलियों में नींद के अन्याय की पीड़ा भरी है
भृकुटियों पर एक मुद्दत से बहुत चिंता धरी है
भीड़ के जंजाल से हटकर कभी एकांत बुन लें
शांत हों इतने कि अपनी देह की आवाज़ सुन लें
एक दिन ख़ुद के लिए रो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
विश्व का हमने कोई कर्जा नहीं खाया हुआ है
किसलिए मुस्कान का ये झूठ चिपकाया हुआ है
एक दिन बस एक दिन की ज़िंदगी का लुत्फ़ ले लें
जीतने और हारने से दूर होकर खेल खेलें
ज़िंदगी में ज़िन्दगी बो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
सबने भर भर के अपनी पिचकारी, विरोधियों पे मारी
होली का चढ़ा रंग भाइयो!
कहीं लाठी बजी है कहीं गारी, कहीं कुर्सी की खुमारी
सभी का न्यारा ढंग भाइयो!
बच्चन जी ने खूब कहा था मेल कराती मधुशाला
पर सत्ता का कैसा-कैसा खेल कराती मधुशाला
शिक्षामंत्री जैसों को भी फेल कराती मधुशाला
अब जाकर ये ज्ञान हुआ है, जेल कराती मधुशाला
सीबीआई ने आरती उतारी, ईमान के पुजारी
हुए हैं कैसे तंग भाइयों
नई ख़बर चल पड़ी देश में, बात पुरानी भूल गए
उनका अन्ना याद रहा अपना अडवानी भूल गए
इनकी करतूतों में अपनी कारस्तानी भूल गए
मधुशाला का शोर मचा तो लोग अडानी भूल गए
उनकी झाड़ू की तीलियां बेचारी, कमल ने बुहारी
दिल्ली में छिड़ी जंग भाइयो!
मोदी पर आरोप लगाए सीधे-सीधे राहुल ने
संसद तक में घोटालों के पढ़े कसीदे राहुल ने
जिसे छुआ उसके ही तीनों लोक पलीदे राहुल ने
कहीं अडानी के शेयर तो नहीं खरीदे राहुल ने
किसने पंजे की ले ली सुपारी, न नकदी, न उधारी
दुबला हुआ ये अंग भाइयो!
ऐसा रंग खिला है सारे बने फिर रहे बंदर हैं
कोई डर कर बाहर भागे, कोई डरकर अंदर है
सबकी चाबी भरकर बैठा देखे खेल कलंदर है
जनता को बस इतना बोला, महँगा हुआ सिलेंडर है
सुन के जनता की छूटी सिसकारी, पर बोली न बेचारी
ठंडी हुई उमंग भाइयो!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
एक मैं, कितना झमेला
विश्व मुझ जैसों का मेला
इस समूची सृष्टि को जो
साध लेता है अकेला
बस उसी के खेल का विस्तार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
मैं वही जिसने जनम के साथ इक परिवार पाया
हार हो या जीत हो, परिवार सब स्वीकार पाया
जब जहाँ जो भी मिला सब भोगकर जीता रहा हूँ
प्यार और मनुहार और अधिकार और सत्कार पाया
जब मिले दुत्कार तो दुत्कार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
मंच पर हूँ, मंच का मालिक मगर बेशक नहीं हूँ
पात्र भर हूँ, किन्तु मैं इस स्वांग का लेखक नहीं हूँ
जब मिले जो भूमिका, भरपूर उसको खेलता हूँ
क्यों कहानी की करूँ चिंता मैं निर्देशक नहीं हूँ
रोग का हो दृश्य तो उपचार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
हर कोई है इस जहाँ में, हर किसी का इक जहाँ है
हर किसी को इस कथा का केंद्र होने का गुमाँ है
कौन जाने कौन किसका कब कहाँ पर्दा गिरा दे
मैं अभी तक मंच पर हूँ ये कृपा भी कम कहाँ है
जो निरंतर हो रहा उपकार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Purushottam
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो!
तुमने त्याग दिया है मुझको, पर मुझमें बाक़ी हो तुम
मैं तुमको संग ले आयी हूँ, कितने एकाकी हो तुम
मुझको बस वनवास दिया है, ख़़ुद को कारावास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
कैसे जनता सिंहासन की हर लाचारी समझेगी
दीवारें और छत भी कैसे बात तुम्हारी समझेंगी
थोड़ा दुःख ही साझा करती, रहती मैं यदि पास सुनो!
लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो!
पहले उससे रण करना था, जिसने हमको कष्ट दिया
अब उसका पालन करना है, जिसने सब सुख ध्वस्त किया
तब वल्कल में शर साधा, अब महलों में संन्यास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
राजमुकुट ने कब-कब काटा, मैं समझूँ या तुम समझो
इस सौदे में कितना घाटा, मैं समझूँ या तुम समझो
आदर्शों की क्या क़ीमत है, मुझको है आभास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
छोड़ चलूँ इस राजमहल को, ख़़ुद से कहते तो होंगे
मुस्कानों के पीछे छिपकर, आँसू बहते तो होंगे
पर मर्यादा ही जीतेगी, है मुझको विश्वास सुनो
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़़ुद को इतना त्रास सुनो!
मेरी पीड़ा ले जायेगी मुझको माँ के आँचल तक
तुम जलता मन ले जाओगे इक दिन सरयू के जल तक
साँसों के उस पार मिलेगी हमको सुख की साँस सुनो!
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़़ुद को इतना त्रास सुनो!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है
मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम
याद फिर से आ रही हो तुम
त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं
चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है
हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे
उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं
याद के उस छोर पर बाँहें पसारे तुम खड़ी हो
सज रही तुम पर वही कुमकुम
याद फिर से आ रही हो तुम
फिर तुम्हारी देह का मकरंद मन में घुल रहा है
आह, मेरे ओंठ आपस में अचानक गुंथ गए हैं
साँस बढ़-चढ़कर स्वयं सिसकारियाँ बनने लगी हैं
नैन फिर आनन्द की हद तक पहुँच कर मुंद गए हैं
कान में एहसास का संगीत गूंजे जा रहा है
सज उठी फिर याद की अंजुम
याद फिर से आ रही हो तुम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
देह के कष्ट से जिनको परहेज है
प्राण का सुख उन्हें मिल सकेगा नहीं
संकुचित ही रहेगी अगर पाँखुरी
कोई गुल बाग में खिल सकेगा नहीं
सत्य है, जो खिले वो सभी एक दिन
पत्ती-पत्ती चमन में बिखर जाएंगे
पर बिखरने के डर से जिन्होंने सुमन
बंद करके रखा वो भी मर जाएंगे
प्रेम पिंजरा अगर बन गया तो तुम्हें
प्रेम का साथ भी झिल सकेगा नहीं
देह की पीर के पार आनंद है
भोग में, योग में, जोग में हर जगह
जो भी सुविधा जुटाते रहे काय की
वो घिरे हैं किसी रोग में हर जगह
देह के नेह में प्राण घुट जाएंगे
हो तुम्हें कुछ भी हासिल सकेगा नहीं
✍️ चिराग़ जैन