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सपने कभी नहीं मरते

बचपन में मेरी मजबूरियों ने मुझसे कुछ सपने छीनकर फेंक दिये थे ज़मीन पर कुछ समय तक देखता रहा मैं उन्हें दूर से ही फिर उन पर चढ़ गयीं कई परतें …व्यस्तताओं की …समय की …और बेख्याली की मुझे लगा कि समा गये हैं वे सब सपने क़ब्र में। लेकिन मैं ग़लत था बीते कुछ...

तहख़ाना

विचारों के भाजी बाज़ार से दूर, मस्तिष्क के पिछवाड़े वाले तहख़ाने में भरे पड़े हैं ऐसे हज़ारों बिम्ब जिन्हें आँखों ने चित्त के शिकंजे से बचाकर यहाँ छिपा दिया था। जब कभी सहजता की सवारी करके प्रिविष्ट हुआ हूँ इस तहख़ाने में बस तभी बटोर लाया हूँ …ढेर सारे बिम्ब …ढेर...

गंगा और शव

कौन कहता है कि गंगा में लाशें बह रही हैं अब तो लाशों में गंगा बह रही है। कौन कहता है कि प्रशासन साम्प्रदायिक भेदभाव करता है प्रशासन तो सब लाशों से एक जैसा बर्ताव करता है। कौन कहता है नदी किनारे मानव सभ्यता पनपती है अब तो नदी तट पर मानवता की रूह दहलती है। साहेब! एक बात...

सत्यमेव जयते

सत्य के आधार पर खड़े चार-चार शेर भी झूठ बोलनेवालों को कुछ नहीं कहते। देश की हर सरकारी मुहर पर एक झूठ लिखा है – ‘सत्यमेव जयते’। ✍️ चिराग़...

मदद की होड़

रेगिस्तान की दोपहर में पानी को तरस रहा एक प्यासा तपती हुई रेत में पड़ा था; ऊपर से सूरज का भी रुख कड़ा था। उसको पानी देने के लिए केंद्र सरकार ने बिल पास किया; राज्य सरकार ने भी उसका स्वतः संज्ञान लिया। लेकिन ज्यों ही राज्य सरकार का कारिंदा मदद लेकर प्यासे की ओर बढ़ा, उसके...

व्यवस्था

इसने कहा कि उसकी वजह से व्यवस्था फेल हो गयी उसने कहा कि इसकी वजह से व्यवस्था फेल हो गयी लेकिन एक बात तो दोनों ने कही- ‘व्यवस्था फेल हो गयी।’ ✍️ चिराग़...
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