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हमारा लोकतन्त्र महान!

लोकतन्त्र नामक राज्य के आसपास घना ‘लोभारण्य’ था; जिसमें भयानक धनपशु और लाभासुर रहा करते थे। ये लाभासुर जब-तब नागरिकों का रक्त चूसते थे और और धनपशु बर्बरतापूर्वक उनका जीवन नारकीय बना देते थे। ‘नागरिकों’ ने अपनी सुरक्षा के लिए कठिन तपस्या की और व्यवस्था का निर्माण किया। नागरिकों की रक्षा के लिए यह व्यवस्था शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी। अब धनपशु और लाभासुर नागरिकों को प्रताड़ित करने आते थे, तो व्यवस्था उनके प्रयासों को विफल कर देती थी। इस स्थिति का सामना करने के लिए लाभासुरों ने व्यवस्था की घेराबंदी में भ्रष्टकीट छोड़ दिए और धनपशुओं ने जगह-जगह रिश्वत का गोबर करके व्यवस्था की धरती में दीमक प्रविष्ट करवा दी। भ्रष्टकीटों ने व्यवस्था के अस्त्र-शस्त्रों को नपुंसक बना दिया और दीमकों ने व्यवस्था को भीतर से खोखला कर दिया। इस दुर्बलता का लाभ उठाते हुए लाभासुरों और धनपशुओं ने व्यवस्था के भीतर अपने प्रतिनिधियों को घुसा दिया। करत-करत अभ्यास के… ये प्रतिनिधि नियामक बन गए और इन्होंने पूरी व्यवस्था को धनपशुओं और लाभासुरों के पक्ष में नागरिकों के विरुद्ध खड़ा कर दिया। अब जो नागरिक, धनपशुओं और लाभासुरों को अपना रक्त पीने से रोकता था, उसे विकास-विरोधी कहा जाने लगा। जिसने दया की गुहार की, उसे व्यवस्थाद्रोही कहा जाने लगा।
व्यवस्था ने अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करके नागरिकों के हाथ-पैर बांधकर लोभारण्य में फेंक दिया और नागरिकों को यह आदेश दे दिया कि जब कोई तुम्हारा रक्त पीने आए तो प्रतिकार करके उसका अपमान न करना। बल्कि हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहना – ‘हमारा लोकतन्त्र महान!’

✍️ चिराग़ जैन

सिस्टम और हम

सिस्टम की आपसे केवल इतनी अपेक्षा है कि आप सिस्टम से कोई अपेक्षा न करें। जब कोविड से जूझना हो तो डॉक्टर को सिस्टम का सहयोग करना चाहिए। उस समय, न उसे अपने ड्यूटी ऑवर्स की चिंता करनी चाहिए, न अपनी जान की! ऐसा करते हुए उनकी जान चली जाये तो उनका जीवन सार्थक होगा। सिस्टम की मदद करनेवालों पर फूल बरसाये जाएंगे। उनके लिए सब अपनी बालकनी में खड़े होकर ताली बजाते दिखेंगे! सभी के चेहरे पर डॉक्टर के लिए आदर का भाव उभर आएगा। लेकिन डॉक्टर को जब सिस्टम की सहायता चाहिए, तब सिस्टम अपनी शक्ल पर बड़ा-सा शून्य लटका लेगा। अपनी मांग लेकर डॉक्टर सड़कों पर उतरना चाहेंगे तो उन पर ड्यूटी से लापरवाही का आरोप लगेगा। उन्हें ग़ैर-ज़िम्मेदार बताया जाएगा। उनकी मांगों को अनसुना करते हुए उन्हें कर्त्तव्यों का पाठ पढ़ाया जाएगा। उन्होंने सत्ता के विरुद्ध कोई मोर्चा खोला तो उन्हें राष्ट्रद्रोही और ग़द्दार कहने में भी राजनीति नहीं हिचकिचाएगी।
किसी की जान जाती है तो जाए, पर सरकार की साख नहीं जानी चाहिए।
खिलाड़ी देश के लिए मैडल लायें, यह उनका कर्त्तव्य है। उन्हें अपने जीवन की तमाम सम्भावनाओं को ताक पर रखकर देश के लिए खेलना चाहिए। यही राष्ट्र के प्रति उनका कर्त्तव्य है। लेकिन वही खिलाड़ी अपने खानपान, अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए; अपने संस्थान में चल रहे किसी कदाचार के लिए या अपने साथ हुए किसी दुर्व्यवहार के लिए सिस्टम और सत्ता की ओर देखे तो सत्ता पहले उस व्यक्ति का भारोत्तोलन करती है, जिस पर आरोप लगाया गया है। यदि उस पर एक्शन लेने से सरकार को कोई फर्क़ नहीं पड़ता तो सरकार उस भ्रष्टाचारी को उठाकर सिस्टम से बाहर फेंक देती है; लेकिन उस पर कार्रवाई होने से सरकार की सेहत पर फर्क़ पड़ता हो तो सरकार खिलाड़ियों को उठाकर जंतर-मंतर से बाहर फेंक देती है।
किसान देश के लिए अधिक अन्न उपजाने में दिन-रात एक कर दे तो सरकार जगह-जगह ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा पुतवा देती है, लेकिन वही किसान, सरकार की किसी नीति का विरोध करना चाहे तो सरकार उसी किसान पर उन्हीं जवानों से लाठीचार्ज करवा देती है। जिन किसानों को अन्नदाता कहकर गीत गाए जाते थे, उन्हीं को ग़द्दार, खालिस्तानी और आतंकवादी कहा जाने लगता है। जिन किसानों के रास्ते में फूल बिछाये गए थे, उन्हीं के रास्ते में काँटे बिछा दिए जाते हैं।
सैनिक देश के लिए सीमा पर मरे तो उसे शहीद कहा जाता है। उसे तिरंगा ओढ़ाकर विदा किया जाता है। लेकिन वही सैनिक अपने को मिलनेवाले खाने की शिकायत कर दे तो उसे अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है।
सरकार आपको एक नागरिक मानना ही नहीं चाहती। आप सरकार के काम आ रहे हैं तो आपको ‘महान’ माना जाएगा। आपको वॉरियर, देवदूत, भगवान, मनुष्यता का पर्याय और न जाने क्या-क्या कहा जाएगा।
अगर आप सरकार के विरुद्ध हुए तो आपको राष्ट्रद्रोही, ग़द्दार, आतंकवादी, संवेदनहीन, लालची, भ्रष्टाचारी, रैकेटियर जैसे तमगे मिलेंगे। और अगर आपका सरकार से कोई सरोकार नहीं है तब तो आप कीड़े-मकोड़े हैं ही।
यदि नागरिक मान लिया जाए तो न तो किसी को देवता सिद्ध करना पड़ेगा, न हो दानव।
डॉक्टर मरीज़ का इलाज कर रहा है, किसान फसल उगा रहा है, खिलाड़ी खेल का अभ्यास कर रहा है, लेखक लिख रहा है, लिपिक फाइल प्रबंधन कर रहा है -यह सब सामान्य है ना।
लेकिन सरकार तारीफ़ करके हमें हमारे रोज़मर्रा के काम के लिए महान सिद्ध करती है। हम प्रसन्न हो जाते हैं। सरकार हमें बताती है कि तुम विशेष हो। हम स्वयं को विशेष मानकर बाकी सबको समान्य मान लेते हैं। इसी समय बाकी सब भी हमें सामान्य मानते हुए ख़ुद को विशेष मान रहे होते हैं।
हम ख़ुद को विशेष समझकर सरकार की ओर अपेक्षा भरी नज़र उठाते हैं। सरकार अपेक्षा से चिढ़ती है। वह सिस्टम को इशारा करती है कि इस विशेष को इसकी हैसियत बताई जाए।
सिस्टम हमें हमारी औक़ात बताने लगता है। पत्थर हो चुके सत्ताधीशों की ओर अपेक्षा से देखते देखते हमारी आँखें पथरा जाती हैं। सिस्टम हमारी आँख में उंगली डालकर वह पत्थर की आँख निकालता है और हमारे सिर पर दे मारता है।

✍️ चिराग़ जैन

जनता की भूमिका

हमारे समाज की सबसे प्रभावी पाठशाला है सिनेमा। सिनेमा ने भारतीय समाज का निर्माण किया है। और समाज ही नहीं; सामाजिक चलन, प्रवृत्ति और यहाँ तक कि मानसिकता का भी निर्माण सिनेमा ने ही किया है।
हमने सिनेमा से सीखा है कि आम जनता कीड़े-मकौड़े की तरह है, जिसकी न कोई इज़्ज़त है, न क़ीमत। इसको कोई भी, कभी भी कैसे भी लूट सकता है। फिल्मी पर्दे ने बहुत चालाकी से आम जनता को मूकदर्शक बने रहना सिखाया है।
आध्यात्मिक फ़िल्मों में आम जनता भीड़ बनकर आरती करती रही। उसकी कोई पहचान कभी नहीं रही। उसके लिए सम्वाद के नाम पर जयकारे से ज़्यादा कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई। उस भीड़ से निकल कर यदि कोई सम्वाद करने लगा, तो वह आम नहीं रहा। वह या तो नायक बनकर विशेष भक्त बन गया या फिर उस भक्त से ईर्ष्या रखनेवाला नास्तिक खलनायक बन गया।
सम्वाद आपको भीड़ से अलग कर देता है। सम्वाद आपको विशेष बना देता है। इसीलिए आम जनता के लिए कभी सम्वाद लिखे ही नहीं गए।
इसके बाद दौर आया ऐतिहासिक सिनेमा का। इसमें भी आम जनता की स्थिति वही रही। बस ईश्वर का किरदार राजा के किरदार से बदल दिया गया। जनता कभी फ्रेम में आई तो या तो विदेशी आततायी की प्रताड़ना सहती दिखी या फिर अपने राजा के महल के आगे हाथ जोड़े बिलखती दिखी और अंत के एक शॉट में राजा के जयकारे लगाती दिखी।
निर्देशक जानता है कि अत्याचार के समय यदि जनता कुछ प्रतिक्रिया कर देगी तो कहानी बदल जाएगी। फिर राजा की महत्ता क्षीण हो जाएगी। इसलिए जनता को अत्याचार के समय अधिक से अधिक रोने-चीखने की अनुमति मिलती थी। क्योंकि हाथ चलानेवाला तो फुटेज खा जाएगा। फिर राजा को हीरो साबित करना असंभव होगा।
फिर देशभक्ति की फ़िल्मों का युग आया। यहाँ से जनता की भूमिका में कुछ परिवर्तन हुआ। वह सक्रिय हुई। क्रांति और शांति के आंदोलनों की ताक़त बन गई। लेकिन इस दौर में भी उसके भाग्य में संवाद नहीं लिखे गए। वह कभी गांधी, कभी नेहरू तो कभी किसी अन्य लीडर के पीछे दौड़ती दिखी। अंग्रेजों के अत्याचारों पर बिलखती जनता ने अपने लिए ईश्वर या राजा नहीं, लीडर चुन लिया।
अब लीडर नायक बन गए। जनता या तो संवादहीन होकर लॉन्गशॉट में नेता की लोकप्रियता का प्रमाण बन गई, या फिर किसी अंग्रेज सार्जेंट के हंटर की मार से रोती-बिलखती हुई खलनायक की क्रूरता का झरोखा बन गई।
फिर दौर आया रोमांटिक फीचर फ़िल्मों का। एक खूबसूरत लड़की, एक बेरोजगार लड़का, एक अमीर बाप, एक बीमार माँ, एक विधवा बहन, एक क्रूर खलनायक… इत्यादि! इस दौर में जनता के नाम पर कुछ लड़कियाँ और कुछ लड़के कभी कभी डांस नंबर में हीरो और हीरोइन के पीछे नाचते हुए उग जाते थे और गाने का बैकग्राउंड म्यूज़िक समाप्त होते ही झट से नदारद हो जाते थे। क्रूर खलनायक के गुंडे हीरो को सर-ए-आम पीटते थे, और ‘आम’ जन अपना सिर झुकाए देखते रहते थे। खलनायक भरे बाज़ार में हीरोइन के कपड़े फाड़ा करता था और जनता अपने चरित्र पर नपुंसकता लपेटे चुपचाप देखती रहती थी।
फिर क्रांतिकारी फ़िल्मों का दौर आया। एक लालची पूंजीपति के अत्याचारों से त्रस्त मजदूर अपनी झुग्गी बस्ती के उजाड़े जाने का तमाशा देखती हुई बिलखती रहती है। फिर उन्हीं मजदूरों की भीड़ में से एक टफ लुक का नौजवान प्रकट होता है। उसकी एंट्री पर पार्श्व में अलग ढिंचक टाइप का संगीत बजता है। उसका आकार शेष मजदूरों से थोड़ा ऊँचा होता है। कभी उसके हाथ पर किसी विशेष नंबर का बिल्ला होता है तो कभी उसके गले में गमछा या रूमाल बांधकर उसे भीड़ से अलग दिखाया जाता है। उसके आते ही फाइट सीन शुरू होता है। वह अकेला झुग्गी उजाड़ने वाले दस्ते की छुट्टी कर देता है और चारों ओर गोला बनाकर खड़ी भीड़ तालियां बजाकर अपनी नपुंसकता का जश्न मनाते हुए उसे हीरो स्वीकार कर लेती है।
इसके बाद जब भी खलनायक कोई चाल चलता है तो यह जनता प्रतिकार करने की बजाय उस हीरो का इंतज़ार करने लगती है और वह हीरो आते ही गुंडों के चंगुल से उस मूकदर्शक भीड़ को बचा लेता है।
इन सब फ़िल्मों ने हमारे समाज के मन में यह बात ठीक से बैठा दी है कि किसी भी स्थिति में हमें अपना विवेक प्रयोग नहीं करना है। हमें केवल अपने लिए एक मसीहा ढूंढना है, जिसके पीछे हमें आँख मूंद कर चलना होगा।
चूँकि हम सिनेमा के आदर्श विद्यार्थी हैं, इसलिए हमने रियल लाइफ में भी विवेकहीन आचरण करना ठीक से सीख लिया है। जिसने ख़ुद को हमारा मसीहा कहा, हम उसके पीछे चलने लगे। हमने उसे अपना भगवान कहना शुरू कर दिया।
सोशल मीडिया का दौर आया तो हम जनता नहीं रहे बल्कि अलग-अलग किस्म के स्वयंभू मसीहाओं के ट्रोलर बन गए। गाली-गलौज और गीदड़ भभकी जैसे परमाणु अस्त्रों से हम चरित्र हत्या करनेवाले रोबोट बन गए हैं या फिर किसी आईटी सेल के मेसेज को कॉपी-पेस्ट करके हवा बनाने वाले टूलबॉक्स।
हमारा ‘यूज़’ करके मसीहा अपनी राजनीति चला रहे हैं। मसीहा जानते हैं कि ये जनता किताबें पलटने की कोशिश नहीं करेगी, इसीलिए मसीहा अपने-अपने स्टाइल में धड़ल्ले से झूठ की बरसात कर रहे हैं। मसीहा अपने अपने डायरेक्टरों के हिसाब से आइटम सॉन्ग पर नाच रहे हैं। और जनता उनके पीछे भीड़ बनकर ठुमक रही है। मसीहा अपने अपने स्क्रिप्ट राइटर के लिखे डायलॉग अपने स्टाइल में बोल रहे हैं और हम डायलॉग की मिमिक्री करके ख़ुश हैं।
जिस दिन इस जनता ने विवेक का इस्तेमाल कर लिया उस दिन डायरेक्टरों के लिए बताना मुश्किल हो जाएगा कि जंगल में नायक-नायिका के लिए म्यूज़िक कैसे बजने लगता है; धुंआधार गोलियाँ चलाकर सैंकड़ों गुंडों को मार देनेवाले नायक को पुलिस क्यों नहीं पकड़ती; अदालतों में चीख-चीख कर दलील कहाँ दी जाती है; बिना वीजा के पाकिस्तान जानेवाले का इन्डिया में वापस एंट्री करते वक़्त इमिग्रेशन चैक क्यों नहीं होता… वगैरह… वगैरह!
बहरहाल, हम सिनेमा के दिखाए पथ पर चल रहे हैं। हर मसीहा अपने लिए हीरो की स्क्रिप्ट लिखवाकर पर्दे पर उतर रहा है। हीरोइज्म की लत से त्रस्त हमारा लोकतन्त्र बार-बार कान लगाकर अपनी दर्शक दीर्घा की साँसों में विवेक का सुर पकड़ने का प्रयास करता है लेकिन नपुंसकता का खटराग उस प्रयास से एक हताश उच्छ्वास से अधिक कुछ नहीं पनपने देता!

✍️ चिराग़ जैन

विश्वास कीजिए

विश्वास कीजिए, राजनीति ने हमें वहाँ तक पहुँचा दिया है, जहाँ उम्मीद की हर लौ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
विश्वास कीजिए, हमें अपनी संतानों को इस दौर के उस पार सुरक्षित पहुँचाना है तो हमें स्वार्थी होना पड़ेगा। पूरा देश डकार जानेवाली राजनीति हमें दशकों से यह नसीहत देती रही है कि हमें निजी स्वार्थों की चिंता छोड़कर समाज की चिंता करनी चाहिए। हमने भी यह वाक्य सूक्ति की तरह रट लिया। अब जब भी कभी हम व्यवहारिक धरातल पर खड़े होकर अपनी मूलभूत ज़रूरत का सवाल उठाते थे तो हमें स्वार्थी कहकर लानत भेजी जाने लगी।
हम समाज और राष्ट्र के समग्र विकास की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए बैठे रहे और राजनेता ‘राष्ट्रहित’ की ओट में अपने हित साधते रहे। हम पाई-पाई जोड़कर भरपाई करते रहे और राजनीति के नुमाइंदे हज़ारों करोड़ के घोटाले करके विदेश निकल लिए।
शर्मनाक है ये कि जिस देश की जनता में भुखमरी और कुपोषण जैसे अभिशाप ज़िंदा हैं, उस देश के धन का बड़ा सारा हिस्सा विदेशी बैंकों में जमा है। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह है कि स्वयं राजनेताओं ने यह स्वीकार किया है कि उन्हें इस काले ख़ज़ाने के विषय में जानकारी है। लेकिन इस धन को वापस लाने के लिए कोई सरकारी प्रयास दिखाई नहीं देता। उल्टे भारत के क़ानून द्वारा अपराधी सिद्ध हो चुके भ्रष्टाचारी, राजनीति के शीर्ष की कानूनी नुमाइंदगी करनेवालों की शादी में दारू पीकर नाचते ज़रूर दिखाई दे गए।
विश्वास कीजिए, राजनीति के इस दरिया में सत्ता और विपक्ष की कुल लड़ाई मगरमच्छों और घडियालों का आपसी संघर्ष है। इनमें से किसी की भी जीत-हार से जनता को कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा। ये ऐसे ही है ज्यों खूँटे पर बंधी बकरियां दो शेरों की लड़ाई में किसी एक की जीत की दुआ मना रही हों। जबकि प्रतियोगिता की शर्त ही यह है कि ज़्यादा बकरियां जिसका साथ देंगी, अगली प्रतियोगिता तक वह जैसे चाहे, वैसे, बकरियों से पेट भरेगा।
विश्वास कीजिए, अब समय आ गया है कि जब भी कोई हमें परमार्थ और राष्ट्रहित की पट्टी पढ़ाकर हमारी खाल उतारने आए तो उसकी आंख में आंख डालकर पूछा जाए कि उसको अपनी खाल देने से हमारा पेट कैसे भरेगा?
विश्वास कीजिए, सब अपनी-अपनी ज़रूरतों के सवाल पूछने लगे तो हमसे पाई-पाई लूटकर कोई अपनी चारपाई पर सोने की मँढ़ाई नहीं करवा सकेगा।
विश्वास कीजिए, यदि हमने अपनी खाल उतारकर देनी बंद कर दी, तो पूरे देश के जिस्म पर तन ढंकने के लिए कपड़े उगने लगेंगे।
विश्वास कीजिए, यदि हमने अपनी थाली की दो रोटियों को वरीयता देनी शुरू कर दी तो काली तिजोरियों में बंद रोटियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद भूखे पेटों तक पहुँच जाएंगी।
विश्वास कीजिए, अपनी बेहतरी के लिए दूसरों से उम्मीद लगाकर बैठने का वक़्त बीत चुका है। विश्वास कीजिए, अब अपने-आप पर विश्वास करने की ज़रूरत है।
✍️ चिराग़ जैन

प्रैक्टिकल करने के समय

हमने लड़ाकों के इतने गुण गाए हैं, कि हम सौहार्द और शांति को ‘हीन’ मान बैठे हैं। हम अहिंसा का संदेश देनेवाले महावीर की संज्ञा को समझने में चूक गए हैं। अध्यात्म की पाठशाला में हमने ‘धैर्य’; ‘क्षमा’; ‘दया’; ‘करुणा’; ‘विश्वास’; ‘आत्मबल’; ‘त्याग’ और ‘परोपकार’ की थ्योरी अवश्य पढ़ी, किंतु प्रैक्टिकल करने के समय हमने धैर्य को उद्वेग से रिप्लेस कर दिया। क्षमा को हम प्रतिशोध की ज्वाला में भस्म कर बैठे। दया और करुणा को हमने अनावश्यक घोषित कर दिया। विश्वास करनेवाले को हम मूर्ख कहने लगे। आत्मबल की धार को हमने कृत्रिम अस्त्र की ओट में ओझल कर दिया। त्याग को हमने कायरता और पलायन कहना शुरू कर दिया तथा परोपकार को हमने स्वार्थ की नृशंसता से विक्षिप्त कर डाला।
अब हमारे पास समाज को बाँटने के लिए घृणा की दुधारी तलवार है, जिससे हम अपने विवेक का कचूमर निकाल चुके हैं। पिछली कई सदियों से हम लगातार इस तलवार से वार करते जा रहे हैं और हर वार आख़िरकार हमें और अधिक विवेकहीन बनाए जा रहा है।
और मज़ेदार बात यह है कि इस तलवार को हम अपनी मर्ज़ी से नहीं अपितु किसी न किसी सत्ता के कहने से चला रहे हैं। अंग्रेजों ने हमें हिन्दू मुस्लिम में बाँटकर दोनों वर्गों के हाथ में ऐसी तलवारें थमा दीं और हम लगे अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने। ऊँची जाति-नीची जाति, सिया-सुन्नी, दिगंबर-श्वेतांबर, सरयूपारीण-कान्यकुब्ज; भूमिहार-वेदपाठी, दक्षिण भारतीय-उत्तर भारतीय; सैयद-खान और न जाने कितने सारे वर्गों में बँटकर हम एक-दूसरे से घृणा करते रहे हैं। हमें यह कहा जाता रहा है कि तुमने तलवार नहीं चलाई तो सामने वाले तुम्हें मार देंगे। जबकि सामनेवाले हमारी तलवार की पहुँच में थे ही नहीं। हमारी घृणा की तलवार हमें ही लहुलुहान करती रही है और सामनेवाले अपनी घृणा की तलवार से खूनम-खून होने के लिए आत्मनिर्भर हैं। लेकिन हम हर रक्तपात का गुणगान करते हुए नाचते रहे हैं।
हम यह बात मान चुके हैं कि लड़नेवाले ही जिवित रहते हैं। जबकि लड़ाई की राह छोड़कर मौन हो गए अवतारों ने हमें बताया कि बाहर चल रही इस भीषण मारकाट से अधिक कठिन है अपने आपको जीतना।
लेकिन हम कमाल के लोग हैं। हमने हर युग में समाज को विवेकशील बनानेवाले को मौत के घाट उतार दिया। हमने मूर्खता की पोल खोलनेवाले हर शख़्स को ‘धर्मविरोधी’ घोषित करके मार डाला। हमने सुकरात की हत्या की क्योंकि उसने हमें विवेकशील बनाने की भूल की। हमने मीरा को मार डाला क्योंकि उसने हमें प्रेम के विदेह होने की सूचना दी। हमने जीसस को मार डाला क्योंकि उसने हमें करुणा का पाठ पढ़ाया। हमने गांधी को मार डाला क्योंकि उसने हमारे आत्मबल को जागृत करने का दुस्साहस किया।
बिल्कुल सही हुआ इन सबके साथ। ये सब लोग अपने-अपने समय की सियासत के लिए ख़तरा बन गए थे। इसलिए इनका मरना आवश्यक हो गया था। इन सभी के हाथ आडंबर के बदबूदार पर्दे को खींचकर फेंक देना चाहते थे। ऐसे में अगर इन्हें जिवित छोड़ दिया जाता तो ये समाज को सत्य के सम्मुख ला खड़ा करते। इससे तो समाज विवेकी बन जाता। फिर घृणा की तलवार का चलना असंभव था। फिर आडंबर का धंधा चलना नामुमकिन था।
फिर रक्तपात पर जयकारे नहीं, करुणा उपजती। फिर युद्ध को किसी जीवन का लक्ष्य नहीं, बल्कि किसी समस्या का अंतिम उपाय समझा जाता।
ऐसी स्थिति में भय की सत्ता ध्वस्त हो जाती। ऐसे में घृणा का कारोबार चौपट हो जाता। लोग ख़ुद को लहुलुहान करना छोड़ देते तो मरहम के व्यापारी देवदूत का रूप धरकर उन्हें ग्राहक कैसे बनाते।
इसलिए विवेक जगानेवाले को मौत के घाट उतार देना सत्ता के लिए परम आवश्यक है। इसलिए आडंबर का कोलाहल ‘शोर’ बन जाने की हद्द तक बना रहना चाहिए क्योंकि अगर इस शोर से मनुष्य के कानों को थका नहीं दिया गया तो ये कान अपने राम, अपने कृष्ण, अपने महावीर, अपने बुद्ध, अपने वाल्मीकि, अपने रैदास, अपने जीसस और अपने पैगंबर का मौन सुन लेंगे और यह स्थिति हथियारों के व्यापारियों के लिए घातक सिद्ध होगी। विवेक जाग गया तो अर्थ की सत्ता निस्तेज हो जाएगी। विवेक जाग गया तो अनर्थ हो जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

राजू श्रीवास्तव की अंत्येष्टि

आर्टिस्ट ग्रीन रूम में तैयार था मगर
इस ज़िन्दगी ने मंच का परदा गिरा दिया

जिजीविषा की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद ठहाके का हिचकी में तब्दील होना यकायक पलकें नम कर गया। ऐसा लगा ज्यों किसी ने अचानक हमारे बिल्कुल आसपास की रौनक को वीराने में बदल दिया हो। मृत्यु को बहुत नज़दीक से देखा है, इसलिए भयभीत तो नहीं हुआ लेकिन विरक्ति का एक आश्चर्यबोध मन में अवश्य भर गया।
इस ख़बर को सुनने के बाद स्वयं से देर तक वाद-विवाद हुआ। क्या हम कलाकारों का संघर्ष कभी यह विश्व समझ पाएगा? क्या सफलता-विफलता के मध्य खड़े एक कोरे मनुष्य के ललाट का लेखा पढ़ने की फ़ुरसत कभी इस जगत् को मिल सकेगी? ट्रेड मिल पर दौड़कर स्वयं को सुदर्शन बनाए रखने की क़वायद हमें क्यों करनी पड़ती है, क्या इस प्रश्न का उत्तर यह दुनिया कभी ख़ुद से मांगेगी?
दिल्ली के निगम बोध घाट पहुँचा तो राजू भाई की अंत्येष्टि में भारी भीड़ थी। इस हुज़ूम में दस प्रतिशत मीडियाकर्मी थे, जो दुनिया को अलविदा कहकर जा रहे कलाकार की अंतिम यात्रा की कुछ फुटेज जुटाने के उद्देश्य से वहाँ उपस्थित थे। दस प्रतिशत कुटुम्बीगण थे, जिनके भीतर का रीतापन माप पाना उस दिन किसी पैमाने के वश में नहीं था। पन्द्रह-बीस प्रतिशत मित्र, सहकर्मी तथा प्रशंसक रहे होंगे, जो किसी साथी के छूट जाने की अंतिम छुअन को अनुभूत करने वहाँ पहुँचे थे।
इसके अतिरिक्त शेष सभी वहाँ एक साथ कई सारे सेलिब्रिटीज़ के साथ सेल्फ़ी खिंचाने का अवसर भुनाने पहुँचे थे। मसान के भयावह सत्य में एक ओर फूलों से सजी गाड़ी में से दिवंगत राजू श्रीवास्तव का पार्थिव शरीर उतारा जा रहा था और दूसरी ओर ‘अबे देख सुरेन्दर शर्मा’; ‘ओए वो देख अशोक चक्रधर’ की उत्सुक प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए लोग अपने स्मार्टफोन में तस्वीरें उतारने में व्यस्त थे।
एक बार तो मुझे लगा कि डिजिटाइज़ेशन ने मृत्यु की भयावहता को घिनौना भी बना दिया है। लेकिन फिर समझ आया कि एक आमजन के जीवन में कलाकार का कुल अस्तित्व मनोरंजन की एक रात या सेल्फी के एक अवसर से अधिक कुछ नहीं है। मैं भीड़ से दूर एक बेंच पर बैठा सब कुछ देख रहा था, कोई मेरे साथ फोटो खिंचाने आया भी तो मैंने अपने विरक्तिसिक्त मन से उसकी इच्छा पूरी कर दी।
एक ओर मंत्र पढ़े जा रहे थे, दूसरी ओर कुछ जोशीले युवा ‘राजू भाई अमर रहें’ के नारे लगा रहे थे। एक तरफ़ कुछ आँखें भीग रही थीं, दूसरी ओर कुछ चेहरों पर इस बात की ख़ुशी थी कि कितने सारे सितारे इतनी आसानी से मिल गए।
इस आसानी की क़ीमत चुकाकर राजू भाई चिता पर लेट चुके थे। शो-बिज़ का भौंडा दिखावा ज़ारी था। छोटे-मोटे कलाकार भरे मन से इस दिखावटी दुनिया में होने का मूल्य अदा कर रहे थे और असली फनकार चिता की लपटों में लिपटा हवा हुए जा रहा था। चिता के धुएं से हवा में कुछ आकृतियाँ उभर रही थीं, मानो ठहाकों का शहंशाह हवा की मिमिक्री करता हुए दूसरे लोक में जा रहा हो…!

✍️ चिराग़ जैन

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