Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
मेरे एक परिचित हैं, जो पिछले कुछ महीनों से ख़ुद को सेलिब्रिटी मान बैठे हैं। अब वे दिन भर भीतर ही भीतर सेलिब्रिटी होने के भाव से भरकर अपने आसपास के सभी मनुष्यों को तुच्छ समझते हुए विचरते हैं और रात होने पर शेष विश्व को टुच्चा समझते हुए व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ सो जाते हैं।
उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है उनके परिवेश को इस बात की भनक तक नहीं है कि वे सेलिब्रिटी बन चुके हैं। उनके घरवाले, उनके दोस्त, उनके रिश्तेदार तथा उनके पड़ोसी अभी भी उन्हें मनुष्य समझकर उनसे सामान्य व्यवहार करते हैं।
स्वयं को सामान्य समझा जाना उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वे इस बदतमीज़ी का बदला लेने के लिए वे तुरंत अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक शायराना स्टेटस पोस्ट करते हैं, जिसका भावार्थ लगभग यह होता है कि, ‘ज़ालिम ज़मानेवालो, आज तुम मेरी कद्र मत करो लेकिन एक दिन तुम मुझसे मिलने को तरस जाओगे।’
चूँकि शेष विश्व को वे ख़ुद से बात करने लायक नहीं समझते इसलिए समय बिताने के लिए वे सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी लोगों की प्रोफाइल, रील तथा स्टेटस देखते रहते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि सचमुच का सेलिब्रिटी बनने के लिए ऐसे स्टेटस डालना ज़रूरी होता है। वे यह बात मानने को तैयार नहीं हैं कि ऐसे स्टेटस डालने से पहले सचमुच का सेलिब्रिटी बनना आवश्यक होता है।
सेलिब्रिटीपना सीखने के चक्कर में वे टीपने में पारंगत हो गए हैं। पिछले दिनों उन्होंने देखा कि एक फिल्मस्टार ने अपनी किचन में मटर छीली। मटर छीलने की उसकी रील पर मिलियन व्यू देखकर हमारे स्वयंभू सेलिब्रिटी ने नहा-धोकर चकाचक पैंट-शर्ट पहनी, बालों को सूतकर बहाया, चेहरे पर थोड़ी लीपा-पोती की और रील बनाने निकल पड़े। शूटिंग की लोकेशन भी सेम थी, बस ज़रा-सा अन्तर ये था कि फिल्मस्टार की रसोई थोड़ी आलीशान किस्म की थी, और हमारे लोकल सेलिब्रिटी की रसोई की दीवार पर चिकनाई के स्वाभाविक निशान थे। फिल्मस्टार की रील किसी ने चुपके से बनाई थी और हमारे सेलिब्रिटी ने बाकायदा कॉलर माईक लगाकर शूटिंग करवाई थी। हमारे सेलिब्रिटी इतने स्वार्थी नहीं हैं कि मटर छीलने की गोपनीय रेसिपी से अपने विराट फैन क्लब को वंचित रखें इसलिए उन्होंने मटर छीलने जैसे वीरोचित कर्म की पूरी रेसिपी भी अपने फैन्स को बताई।
सेलिब्रिटी को अपने फैंस का ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए हमारे लोकल ब्रांड सेलिब्रिटी हर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय विषय पर किसी विद्वान की वीडियो सुनते हैं और फिर उसे अपने मुखारविंद से दोबारा रिकार्ड करके अपने फैंस क्लब के सामने विद्वान बनने का अभिनय करते हैं।
जब कोई उनके स्टेटस पर आकर समर्थन या विरोध नहीं करता, तो वे विनम्रतापूर्वक स्वयं दूसरों के स्टेटस पर अबूझ टाइप के कमेंट्स करके ध्यानाकर्षण का प्रयास करते फिरते हैं।
कई महीनों के अथक प्रयासों के बाबजूद जब उनके फैंस क्लब की संख्या में वृद्धि नहीं हो पाई तो वे सपत्नीक सेलिब्रिटी बनने निकल पड़े। खाना खाने से लेकर आने-जाने तक वे अपनी हर गतिविधि की रील बनाते हैं और हर रील में अपनी पत्नी को गले लगाकर अपने फैंस को अपने खुशनुमा दाम्पत्य की झलक दिखाते रहते हैं।
पिछले दिनों उनके कुनबे में कोई बुजुर्ग दिवंगत हो गए। हमारे सेलिब्रिटी ने इस दुःख की घड़ी में भी अपने फैंस को नहीं भुलाया। अपने बाबाजी की मृत्यु का दुःख मनाने से पहले उन्होंने लाश का चेहरा खोलकर उसकी फोटो खिंची। फिर उसे तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। ताकि उनका कोई भी फैन अंतिम दर्शन से वंचित न रह जाए। इस पोस्ट के बाद वे दिन भर रील डालकर अपने विराट फैन क्लब को यह बताते रहे कि सेलिब्रिटी रो रहा है।
सबको गाइज, दोस्तों और भाइयों कहकर संबोधित करते हुए वे अथक साधना कर रहे हैं। इतने महीनों में वे अपने परिवार को यह समझाने में सफल हो गए हैं कि एक दिन वे सोशल मीडिया के ज़रिये पूरे संसार में फेमस हो जाएंगे। शायद इसी कारण कल जब वे टूथपेस्ट करते हुए रील बना रहे थे तब उनकी पत्नी कैमरा लेकर वॉशबेसिन के सामने दम साधे खड़ी थी, और बाकी पूरा परिवार मुँह पर टेप लगाए चुपचाप बैठा था, कि कहीं कोई शोर हुआ तो इतनी महत्वपूर्ण रील की ऑडियो क्वालिटी ख़राब न हो जाए।
✍️ चिराग़ जैन
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भारत एक ऐसा देश है, जहाँ सड़कें बनाई नहीं जातीं। ऐसा लगता है मानो हर सड़क भारतीयों को संघर्षों से जूझने का प्रशिक्षण देने के लिए राहों में बिछ गई हो। देश की राजधानी से प्रारंभ करते हैं। इस शहर की सड़कों के दोनों ओर फुटपाथ बनाए गए हैं। फुटपाथ, अर्थात् रेहड़ी, पटरी लगाने का स्थान। कहीं-कहीं मूत्रालय बनाकर वातावरण में इत्र छिड़कने की भी व्यवस्था की गई है।
नागरिकों की सुविधा के लिए फुटपाथ से मिलकर जो पहली लेन है वह पार्किंग के काम आती है। बीच की लेन पर मातृत्व की याद दिलाने के लिए साक्षात् गौ माता सपरिवार उपस्थित रहती हैं। दाहिनी लेन, जो डिवाइडर से चिपककर लेटी है, उस पर कभी डिवाइडर की रेलिंग उंगली करती दिखाई देती है, तो कभी पुलिसवाले अंकल बैरिकेड्स रखकर इधर-उधर चले जाते हैं।
इससे भी कोई फर्क़ न पड़े तो फास्ट लेन पर गाड़ी ख़राब हो जाएगी। और भी कुछ नहीं तो गड्ढों की व्यवस्था तो कहीं भी हो ही जाती है।
इन सबकी उपस्थिति के बावजूद जो वाहन सड़कों पर चलने की हिम्मत करते हैं, उन्हें हर चौराहे पर भिखारियों और हिजड़ों का वेश बनाकर सर-ए-आम लूटने के लिए सरकारी संरक्षण प्राप्त समाजसेवकों की व्यवस्था की गई है।
सड़क का सौंदर्य बढ़ाने के लिए सरकार ने जगह-जगह ‘नो पार्किंग’ और ‘टो अवे’ के बोर्ड लगाए हैं। इन बोर्ड्स के ठीक नीचे ई-रिक्शा चालकों ने अपना डिपो बना रखा होता है।
सड़क एवं परिवहन मंत्री ने ई-रिक्शा का आविष्कार करके महानगरों के वाहन चालकों को यह बताने का प्रयास किया है कि महाभारत के युद्ध में करोड़ों सैनिकों की भीड़ के बीच से रथ निकालकर ले जाने की कला जाननेवाला शख़्स महारथी क्यों कहलाता था।
इन सड़कों को देखकर कई बार ऐसा लगता है, मानो सड़क कह रही हो… ‘क्यों व्यर्थ घर से निकलता है? आख़िर कहाँ पहुँचना चाहता है? अब तक सड़कों की धूल फाँककर भी तू कहाँ पहुँच पाया है। तेरा घर ही तेरा असली ठिकाना है। तू कितनी भी दूर निकल जा, अंततः लौटकर इसी घर में आना है। तो जब यहीं लौटना तय है तो सड़कों पर निकलना ही क्यों… घर रहेगा, ईंधन बचेगा, टेलीविजन चला, व्हाट्सएप खोल, मेसेज फॉरवर्ड कर… जहाँ तू नहीं पहुँच पाया, वहाँ अपना व्हाट्सएप भेज दे। वैसे भी तू कोई सड़कों पर भटकने वाला सड़क छाप थोड़े ही है। यह भटकाव छोड़कर थोड़ा ठहर जा पगले! घर बैठ पगले!’
✍️ चिराग़ जैन
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लोकतन्त्र नामक राज्य के आसपास घना ‘लोभारण्य’ था; जिसमें भयानक धनपशु और लाभासुर रहा करते थे। ये लाभासुर जब-तब नागरिकों का रक्त चूसते थे और और धनपशु बर्बरतापूर्वक उनका जीवन नारकीय बना देते थे। ‘नागरिकों’ ने अपनी सुरक्षा के लिए कठिन तपस्या की और व्यवस्था का निर्माण किया। नागरिकों की रक्षा के लिए यह व्यवस्था शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी। अब धनपशु और लाभासुर नागरिकों को प्रताड़ित करने आते थे, तो व्यवस्था उनके प्रयासों को विफल कर देती थी। इस स्थिति का सामना करने के लिए लाभासुरों ने व्यवस्था की घेराबंदी में भ्रष्टकीट छोड़ दिए और धनपशुओं ने जगह-जगह रिश्वत का गोबर करके व्यवस्था की धरती में दीमक प्रविष्ट करवा दी। भ्रष्टकीटों ने व्यवस्था के अस्त्र-शस्त्रों को नपुंसक बना दिया और दीमकों ने व्यवस्था को भीतर से खोखला कर दिया। इस दुर्बलता का लाभ उठाते हुए लाभासुरों और धनपशुओं ने व्यवस्था के भीतर अपने प्रतिनिधियों को घुसा दिया। करत-करत अभ्यास के… ये प्रतिनिधि नियामक बन गए और इन्होंने पूरी व्यवस्था को धनपशुओं और लाभासुरों के पक्ष में नागरिकों के विरुद्ध खड़ा कर दिया। अब जो नागरिक, धनपशुओं और लाभासुरों को अपना रक्त पीने से रोकता था, उसे विकास-विरोधी कहा जाने लगा। जिसने दया की गुहार की, उसे व्यवस्थाद्रोही कहा जाने लगा।
व्यवस्था ने अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करके नागरिकों के हाथ-पैर बांधकर लोभारण्य में फेंक दिया और नागरिकों को यह आदेश दे दिया कि जब कोई तुम्हारा रक्त पीने आए तो प्रतिकार करके उसका अपमान न करना। बल्कि हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहना – ‘हमारा लोकतन्त्र महान!’
✍️ चिराग़ जैन
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सिस्टम की आपसे केवल इतनी अपेक्षा है कि आप सिस्टम से कोई अपेक्षा न करें। जब कोविड से जूझना हो तो डॉक्टर को सिस्टम का सहयोग करना चाहिए। उस समय, न उसे अपने ड्यूटी ऑवर्स की चिंता करनी चाहिए, न अपनी जान की! ऐसा करते हुए उनकी जान चली जाये तो उनका जीवन सार्थक होगा। सिस्टम की मदद करनेवालों पर फूल बरसाये जाएंगे। उनके लिए सब अपनी बालकनी में खड़े होकर ताली बजाते दिखेंगे! सभी के चेहरे पर डॉक्टर के लिए आदर का भाव उभर आएगा। लेकिन डॉक्टर को जब सिस्टम की सहायता चाहिए, तब सिस्टम अपनी शक्ल पर बड़ा-सा शून्य लटका लेगा। अपनी मांग लेकर डॉक्टर सड़कों पर उतरना चाहेंगे तो उन पर ड्यूटी से लापरवाही का आरोप लगेगा। उन्हें ग़ैर-ज़िम्मेदार बताया जाएगा। उनकी मांगों को अनसुना करते हुए उन्हें कर्त्तव्यों का पाठ पढ़ाया जाएगा। उन्होंने सत्ता के विरुद्ध कोई मोर्चा खोला तो उन्हें राष्ट्रद्रोही और ग़द्दार कहने में भी राजनीति नहीं हिचकिचाएगी।
किसी की जान जाती है तो जाए, पर सरकार की साख नहीं जानी चाहिए।
खिलाड़ी देश के लिए मैडल लायें, यह उनका कर्त्तव्य है। उन्हें अपने जीवन की तमाम सम्भावनाओं को ताक पर रखकर देश के लिए खेलना चाहिए। यही राष्ट्र के प्रति उनका कर्त्तव्य है। लेकिन वही खिलाड़ी अपने खानपान, अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए; अपने संस्थान में चल रहे किसी कदाचार के लिए या अपने साथ हुए किसी दुर्व्यवहार के लिए सिस्टम और सत्ता की ओर देखे तो सत्ता पहले उस व्यक्ति का भारोत्तोलन करती है, जिस पर आरोप लगाया गया है। यदि उस पर एक्शन लेने से सरकार को कोई फर्क़ नहीं पड़ता तो सरकार उस भ्रष्टाचारी को उठाकर सिस्टम से बाहर फेंक देती है; लेकिन उस पर कार्रवाई होने से सरकार की सेहत पर फर्क़ पड़ता हो तो सरकार खिलाड़ियों को उठाकर जंतर-मंतर से बाहर फेंक देती है।
किसान देश के लिए अधिक अन्न उपजाने में दिन-रात एक कर दे तो सरकार जगह-जगह ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा पुतवा देती है, लेकिन वही किसान, सरकार की किसी नीति का विरोध करना चाहे तो सरकार उसी किसान पर उन्हीं जवानों से लाठीचार्ज करवा देती है। जिन किसानों को अन्नदाता कहकर गीत गाए जाते थे, उन्हीं को ग़द्दार, खालिस्तानी और आतंकवादी कहा जाने लगता है। जिन किसानों के रास्ते में फूल बिछाये गए थे, उन्हीं के रास्ते में काँटे बिछा दिए जाते हैं।
सैनिक देश के लिए सीमा पर मरे तो उसे शहीद कहा जाता है। उसे तिरंगा ओढ़ाकर विदा किया जाता है। लेकिन वही सैनिक अपने को मिलनेवाले खाने की शिकायत कर दे तो उसे अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है।
सरकार आपको एक नागरिक मानना ही नहीं चाहती। आप सरकार के काम आ रहे हैं तो आपको ‘महान’ माना जाएगा। आपको वॉरियर, देवदूत, भगवान, मनुष्यता का पर्याय और न जाने क्या-क्या कहा जाएगा।
अगर आप सरकार के विरुद्ध हुए तो आपको राष्ट्रद्रोही, ग़द्दार, आतंकवादी, संवेदनहीन, लालची, भ्रष्टाचारी, रैकेटियर जैसे तमगे मिलेंगे। और अगर आपका सरकार से कोई सरोकार नहीं है तब तो आप कीड़े-मकोड़े हैं ही।
यदि नागरिक मान लिया जाए तो न तो किसी को देवता सिद्ध करना पड़ेगा, न हो दानव।
डॉक्टर मरीज़ का इलाज कर रहा है, किसान फसल उगा रहा है, खिलाड़ी खेल का अभ्यास कर रहा है, लेखक लिख रहा है, लिपिक फाइल प्रबंधन कर रहा है -यह सब सामान्य है ना।
लेकिन सरकार तारीफ़ करके हमें हमारे रोज़मर्रा के काम के लिए महान सिद्ध करती है। हम प्रसन्न हो जाते हैं। सरकार हमें बताती है कि तुम विशेष हो। हम स्वयं को विशेष मानकर बाकी सबको समान्य मान लेते हैं। इसी समय बाकी सब भी हमें सामान्य मानते हुए ख़ुद को विशेष मान रहे होते हैं।
हम ख़ुद को विशेष समझकर सरकार की ओर अपेक्षा भरी नज़र उठाते हैं। सरकार अपेक्षा से चिढ़ती है। वह सिस्टम को इशारा करती है कि इस विशेष को इसकी हैसियत बताई जाए।
सिस्टम हमें हमारी औक़ात बताने लगता है। पत्थर हो चुके सत्ताधीशों की ओर अपेक्षा से देखते देखते हमारी आँखें पथरा जाती हैं। सिस्टम हमारी आँख में उंगली डालकर वह पत्थर की आँख निकालता है और हमारे सिर पर दे मारता है।
✍️ चिराग़ जैन
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हमारे समाज की सबसे प्रभावी पाठशाला है सिनेमा। सिनेमा ने भारतीय समाज का निर्माण किया है। और समाज ही नहीं; सामाजिक चलन, प्रवृत्ति और यहाँ तक कि मानसिकता का भी निर्माण सिनेमा ने ही किया है।
हमने सिनेमा से सीखा है कि आम जनता कीड़े-मकौड़े की तरह है, जिसकी न कोई इज़्ज़त है, न क़ीमत। इसको कोई भी, कभी भी कैसे भी लूट सकता है। फिल्मी पर्दे ने बहुत चालाकी से आम जनता को मूकदर्शक बने रहना सिखाया है।
आध्यात्मिक फ़िल्मों में आम जनता भीड़ बनकर आरती करती रही। उसकी कोई पहचान कभी नहीं रही। उसके लिए सम्वाद के नाम पर जयकारे से ज़्यादा कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई। उस भीड़ से निकल कर यदि कोई सम्वाद करने लगा, तो वह आम नहीं रहा। वह या तो नायक बनकर विशेष भक्त बन गया या फिर उस भक्त से ईर्ष्या रखनेवाला नास्तिक खलनायक बन गया।
सम्वाद आपको भीड़ से अलग कर देता है। सम्वाद आपको विशेष बना देता है। इसीलिए आम जनता के लिए कभी सम्वाद लिखे ही नहीं गए।
इसके बाद दौर आया ऐतिहासिक सिनेमा का। इसमें भी आम जनता की स्थिति वही रही। बस ईश्वर का किरदार राजा के किरदार से बदल दिया गया। जनता कभी फ्रेम में आई तो या तो विदेशी आततायी की प्रताड़ना सहती दिखी या फिर अपने राजा के महल के आगे हाथ जोड़े बिलखती दिखी और अंत के एक शॉट में राजा के जयकारे लगाती दिखी।
निर्देशक जानता है कि अत्याचार के समय यदि जनता कुछ प्रतिक्रिया कर देगी तो कहानी बदल जाएगी। फिर राजा की महत्ता क्षीण हो जाएगी। इसलिए जनता को अत्याचार के समय अधिक से अधिक रोने-चीखने की अनुमति मिलती थी। क्योंकि हाथ चलानेवाला तो फुटेज खा जाएगा। फिर राजा को हीरो साबित करना असंभव होगा।
फिर देशभक्ति की फ़िल्मों का युग आया। यहाँ से जनता की भूमिका में कुछ परिवर्तन हुआ। वह सक्रिय हुई। क्रांति और शांति के आंदोलनों की ताक़त बन गई। लेकिन इस दौर में भी उसके भाग्य में संवाद नहीं लिखे गए। वह कभी गांधी, कभी नेहरू तो कभी किसी अन्य लीडर के पीछे दौड़ती दिखी। अंग्रेजों के अत्याचारों पर बिलखती जनता ने अपने लिए ईश्वर या राजा नहीं, लीडर चुन लिया।
अब लीडर नायक बन गए। जनता या तो संवादहीन होकर लॉन्गशॉट में नेता की लोकप्रियता का प्रमाण बन गई, या फिर किसी अंग्रेज सार्जेंट के हंटर की मार से रोती-बिलखती हुई खलनायक की क्रूरता का झरोखा बन गई।
फिर दौर आया रोमांटिक फीचर फ़िल्मों का। एक खूबसूरत लड़की, एक बेरोजगार लड़का, एक अमीर बाप, एक बीमार माँ, एक विधवा बहन, एक क्रूर खलनायक… इत्यादि! इस दौर में जनता के नाम पर कुछ लड़कियाँ और कुछ लड़के कभी कभी डांस नंबर में हीरो और हीरोइन के पीछे नाचते हुए उग जाते थे और गाने का बैकग्राउंड म्यूज़िक समाप्त होते ही झट से नदारद हो जाते थे। क्रूर खलनायक के गुंडे हीरो को सर-ए-आम पीटते थे, और ‘आम’ जन अपना सिर झुकाए देखते रहते थे। खलनायक भरे बाज़ार में हीरोइन के कपड़े फाड़ा करता था और जनता अपने चरित्र पर नपुंसकता लपेटे चुपचाप देखती रहती थी।
फिर क्रांतिकारी फ़िल्मों का दौर आया। एक लालची पूंजीपति के अत्याचारों से त्रस्त मजदूर अपनी झुग्गी बस्ती के उजाड़े जाने का तमाशा देखती हुई बिलखती रहती है। फिर उन्हीं मजदूरों की भीड़ में से एक टफ लुक का नौजवान प्रकट होता है। उसकी एंट्री पर पार्श्व में अलग ढिंचक टाइप का संगीत बजता है। उसका आकार शेष मजदूरों से थोड़ा ऊँचा होता है। कभी उसके हाथ पर किसी विशेष नंबर का बिल्ला होता है तो कभी उसके गले में गमछा या रूमाल बांधकर उसे भीड़ से अलग दिखाया जाता है। उसके आते ही फाइट सीन शुरू होता है। वह अकेला झुग्गी उजाड़ने वाले दस्ते की छुट्टी कर देता है और चारों ओर गोला बनाकर खड़ी भीड़ तालियां बजाकर अपनी नपुंसकता का जश्न मनाते हुए उसे हीरो स्वीकार कर लेती है।
इसके बाद जब भी खलनायक कोई चाल चलता है तो यह जनता प्रतिकार करने की बजाय उस हीरो का इंतज़ार करने लगती है और वह हीरो आते ही गुंडों के चंगुल से उस मूकदर्शक भीड़ को बचा लेता है।
इन सब फ़िल्मों ने हमारे समाज के मन में यह बात ठीक से बैठा दी है कि किसी भी स्थिति में हमें अपना विवेक प्रयोग नहीं करना है। हमें केवल अपने लिए एक मसीहा ढूंढना है, जिसके पीछे हमें आँख मूंद कर चलना होगा।
चूँकि हम सिनेमा के आदर्श विद्यार्थी हैं, इसलिए हमने रियल लाइफ में भी विवेकहीन आचरण करना ठीक से सीख लिया है। जिसने ख़ुद को हमारा मसीहा कहा, हम उसके पीछे चलने लगे। हमने उसे अपना भगवान कहना शुरू कर दिया।
सोशल मीडिया का दौर आया तो हम जनता नहीं रहे बल्कि अलग-अलग किस्म के स्वयंभू मसीहाओं के ट्रोलर बन गए। गाली-गलौज और गीदड़ भभकी जैसे परमाणु अस्त्रों से हम चरित्र हत्या करनेवाले रोबोट बन गए हैं या फिर किसी आईटी सेल के मेसेज को कॉपी-पेस्ट करके हवा बनाने वाले टूलबॉक्स।
हमारा ‘यूज़’ करके मसीहा अपनी राजनीति चला रहे हैं। मसीहा जानते हैं कि ये जनता किताबें पलटने की कोशिश नहीं करेगी, इसीलिए मसीहा अपने-अपने स्टाइल में धड़ल्ले से झूठ की बरसात कर रहे हैं। मसीहा अपने अपने डायरेक्टरों के हिसाब से आइटम सॉन्ग पर नाच रहे हैं। और जनता उनके पीछे भीड़ बनकर ठुमक रही है। मसीहा अपने अपने स्क्रिप्ट राइटर के लिखे डायलॉग अपने स्टाइल में बोल रहे हैं और हम डायलॉग की मिमिक्री करके ख़ुश हैं।
जिस दिन इस जनता ने विवेक का इस्तेमाल कर लिया उस दिन डायरेक्टरों के लिए बताना मुश्किल हो जाएगा कि जंगल में नायक-नायिका के लिए म्यूज़िक कैसे बजने लगता है; धुंआधार गोलियाँ चलाकर सैंकड़ों गुंडों को मार देनेवाले नायक को पुलिस क्यों नहीं पकड़ती; अदालतों में चीख-चीख कर दलील कहाँ दी जाती है; बिना वीजा के पाकिस्तान जानेवाले का इन्डिया में वापस एंट्री करते वक़्त इमिग्रेशन चैक क्यों नहीं होता… वगैरह… वगैरह!
बहरहाल, हम सिनेमा के दिखाए पथ पर चल रहे हैं। हर मसीहा अपने लिए हीरो की स्क्रिप्ट लिखवाकर पर्दे पर उतर रहा है। हीरोइज्म की लत से त्रस्त हमारा लोकतन्त्र बार-बार कान लगाकर अपनी दर्शक दीर्घा की साँसों में विवेक का सुर पकड़ने का प्रयास करता है लेकिन नपुंसकता का खटराग उस प्रयास से एक हताश उच्छ्वास से अधिक कुछ नहीं पनपने देता!
✍️ चिराग़ जैन
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विश्वास कीजिए, राजनीति ने हमें वहाँ तक पहुँचा दिया है, जहाँ उम्मीद की हर लौ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
विश्वास कीजिए, हमें अपनी संतानों को इस दौर के उस पार सुरक्षित पहुँचाना है तो हमें स्वार्थी होना पड़ेगा। पूरा देश डकार जानेवाली राजनीति हमें दशकों से यह नसीहत देती रही है कि हमें निजी स्वार्थों की चिंता छोड़कर समाज की चिंता करनी चाहिए। हमने भी यह वाक्य सूक्ति की तरह रट लिया। अब जब भी कभी हम व्यवहारिक धरातल पर खड़े होकर अपनी मूलभूत ज़रूरत का सवाल उठाते थे तो हमें स्वार्थी कहकर लानत भेजी जाने लगी।
हम समाज और राष्ट्र के समग्र विकास की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए बैठे रहे और राजनेता ‘राष्ट्रहित’ की ओट में अपने हित साधते रहे। हम पाई-पाई जोड़कर भरपाई करते रहे और राजनीति के नुमाइंदे हज़ारों करोड़ के घोटाले करके विदेश निकल लिए।
शर्मनाक है ये कि जिस देश की जनता में भुखमरी और कुपोषण जैसे अभिशाप ज़िंदा हैं, उस देश के धन का बड़ा सारा हिस्सा विदेशी बैंकों में जमा है। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह है कि स्वयं राजनेताओं ने यह स्वीकार किया है कि उन्हें इस काले ख़ज़ाने के विषय में जानकारी है। लेकिन इस धन को वापस लाने के लिए कोई सरकारी प्रयास दिखाई नहीं देता। उल्टे भारत के क़ानून द्वारा अपराधी सिद्ध हो चुके भ्रष्टाचारी, राजनीति के शीर्ष की कानूनी नुमाइंदगी करनेवालों की शादी में दारू पीकर नाचते ज़रूर दिखाई दे गए।
विश्वास कीजिए, राजनीति के इस दरिया में सत्ता और विपक्ष की कुल लड़ाई मगरमच्छों और घडियालों का आपसी संघर्ष है। इनमें से किसी की भी जीत-हार से जनता को कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा। ये ऐसे ही है ज्यों खूँटे पर बंधी बकरियां दो शेरों की लड़ाई में किसी एक की जीत की दुआ मना रही हों। जबकि प्रतियोगिता की शर्त ही यह है कि ज़्यादा बकरियां जिसका साथ देंगी, अगली प्रतियोगिता तक वह जैसे चाहे, वैसे, बकरियों से पेट भरेगा।
विश्वास कीजिए, अब समय आ गया है कि जब भी कोई हमें परमार्थ और राष्ट्रहित की पट्टी पढ़ाकर हमारी खाल उतारने आए तो उसकी आंख में आंख डालकर पूछा जाए कि उसको अपनी खाल देने से हमारा पेट कैसे भरेगा?
विश्वास कीजिए, सब अपनी-अपनी ज़रूरतों के सवाल पूछने लगे तो हमसे पाई-पाई लूटकर कोई अपनी चारपाई पर सोने की मँढ़ाई नहीं करवा सकेगा।
विश्वास कीजिए, यदि हमने अपनी खाल उतारकर देनी बंद कर दी, तो पूरे देश के जिस्म पर तन ढंकने के लिए कपड़े उगने लगेंगे।
विश्वास कीजिए, यदि हमने अपनी थाली की दो रोटियों को वरीयता देनी शुरू कर दी तो काली तिजोरियों में बंद रोटियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद भूखे पेटों तक पहुँच जाएंगी।
विश्वास कीजिए, अपनी बेहतरी के लिए दूसरों से उम्मीद लगाकर बैठने का वक़्त बीत चुका है। विश्वास कीजिए, अब अपने-आप पर विश्वास करने की ज़रूरत है।
✍️ चिराग़ जैन