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मुहल्ला स्तरीय अमरीका-ईरान युद्ध

हमारे मुहल्ले के पश्चिमी छोर पर श्याम का घर है और लगभग पूर्वी छोर पर छैनू रहता है। श्याम और छैनू के बीच लम्बे समय से तनातनी का माहौल बना हुआ है। दोनों के बीच जब-तब कहासुनी होती रहती है, जिसे मुहल्ले की चौपाल पर हाथापाई सिद्ध करनेवालों की कमी नहीं है।
बालकनी में सूखते कपड़ों पर मिट्टी फेंकने से लेकर, साइकिल के टायर की हवा निकालने तक के भयंकर आक्रमण दोनों एक-दूसरे पर करते रहते हैं।
चूंकि दोनों के घर मुहल्ले के दो अलग-अलग छोर पर हैं, इसलिए दोनों ने एक-दूसरे के पड़ोसियों के साथ दोस्ती गांठ रखी है। ताकि युद्ध के समय हमला करने के लिए दुश्मन के निकट ही वॉरबेस तैयार किया जा सके।
कुछ साल पहले परचून की दुकान पर मसूर की दाल खरीदते हुए दोनों का आमना-सामना हो गया। भयंकर युद्ध हुआ। जिसमें परचूनिये का तराजू घायल हो गया और आधा किलो मसूर की दाल तबाह हुई। मुहल्ले की भाभियों ने नल से पानी भरने की लाइन में इस विषय पर गंभीर चर्चा का आयोजन किया। जोरदार बहस हुई और बहस का परिणाम यह निकला कि दोनों में से कोई भी कम नहीं है जीजी।
तब से इन दोनों को लेकर बच्चों से लेकर बूढ़े तक वीरता के किस्से सुनाते फिरते हैं। मुहल्ले का लोकल कवि श्याम और छैनू की मुठभेड़ों की कल्पना करने में इतनी पोथियां भर चुका है कि उसका श्याम-छैनू महाकाव्य पढ़नेवाले लोग हमारे मुहल्ले को हल्दीघाटी और कुरुक्षेत्र से कम नहीं समझते।
छैनू को अगर पता चल जाए कि श्याम की घरवाली सब्जी खरीदने के लिए फेरीवाले का इंतज़ार कर रही है, तो वह अपनी ओर से मुहल्ले में घुसनेवाले हर सब्जीवाले को डांटकर भगा देता है। श्याम ने भी इस अपमान का बदला लेने के लिए जाने कितनी ही बार फेरीवालों को छैनू के घर तक पहुंचने से रोका है।
दोनों की दुश्मनी इतनी लोकप्रिय है कि मुहल्ले में कहीं कोई कुत्ता भी मर जाए तो उसे श्याम-छैनू युद्ध का शहीद घोषित कर दिया जाता है। बरसात में बिजली कड़क जाए तो ऐसा मान लिया जाता है कि श्याम-छैनू संग्राम का माहौल तैयार हो गया है।
पिछले महीने मुहल्ले के लोगों ने एक झन्नाटेदार तमाचे की गूंज सुनी। बस, फिर क्या था। कहानियों का सिलसिला निकल पड़ा। छोकरों ने एआई से वीडियो बना-बनाकर छैनू और श्याम के तमाचा युद्ध को लोकप्रिय कर दिया। लोकल कवि ने तमाचा, सपाटा, चाटा, रहपटा, थप्पड़ और लप्पड़ जैसे शब्दों के प्रयोग से युद्ध का वर्णन किया। भाभियों ने नल की लाइन में तमाचा-वॉर का आंखों देखा हाल सुनाया। चौपाल पर बुजुर्गों ने श्याम और छैनू के बहाने अपनी जवानी के वो किस्से सुनाए, जिनमें उनके गाल पर किसी ने तमाचा जड़ा था। ये और बात है कि किस्से सुनाते समय उन्होंने तमाचा मारनेवाले और तमाचा खानेवाले किरदारों को बदल दिया था।
पिछले सप्ताह किसी ने श्याम के घर की बाहरी दीवार पर गाली लिख दी। श्याम ने अपने अनुभव से बिना पढ़े ही बता दिया कि यह गाली छैनू ने लिखी है। श्याम ने गाली इसलिए नहीं पढ़ी क्योंकि श्याम को पढ़ना नहीं आता। हालांकि छैनू को भी लिखना नहीं आता, लेकिन मुहल्लेवालों ने मान लिया है कि श्याम से दुश्मनी की शिद्दत में छैनू ने लिखना सीख लिया है।
गाली कांड के अगले ही दिन छैनू की बाहरी दीवार गिर गई। श्याम सबको बता रहा है कि मैंने ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। लेकिन छैनू सबको बताता फिर रहा है कि श्याम मेरी दीवार पर गाली लिखकर गंदा न कर पाए, इसलिए मैंने दीवार खुद गिराई है। दीवार के मलबे से मुहल्ले का एक तरफ का रास्ता रुक गया है। गाली लिखी दीवार के सामने से गुज़रते हुए मुहल्ले की महिलाओं को शर्म आती है। लेकिन मुहल्ले के बच्चे अपना कष्ट भूलकर दो महान योद्धाओं की शौर्यगाथा सुना रहे हैं। भाभियां नल की लाइन में गालीवाली दीवार पर चर्चा करते हुए खीसें निपोर रही हैं। चौपाल पर बुज़ुर्ग अपनी जवानी की गालियों का सौंदर्यशास्त्र बखान रहे हैं और लोकल कवि ने कल रात ही गाली की दुनाली से युद्धक्षेत्र में हज़ारों सैनिकों को घायल किया है।

✍️ चिराग़ जैन

अवसर

राज्य में नियम बना कि जो भी नागरिक राजा की आलोचना करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा।
भयभीत प्रजा मौन हो गई।
एक दिन एक मंत्री ने राजा का मूड देखकर सलाह देने की हिम्मत की- “महाराज, यदि प्रजा के बोलने पर रोक लगी रही तो लोगों के भीतर-भीतर गुस्सा भर जाएगा। और इससे क्रांति की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
राजा ने अगले ही दिन ‘भड़ास उत्सव’ का आयोजन किया। राज्य के मेला ग्राउंड में माइक लगाया गया। और आलोचना के लिए दो घंटे की अवधि सुनिश्चित कर दी गई।
आश्वस्त किया गया कि इन दो घंटों में राजा, राज्य, योजना, नीति, प्रक्रिया या तंत्र की आलोचना करनेवाले पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।
नगर में आयोजन प्रारंभ हुआ और राजा अपने कानों में कपास उगाकर अपने महल में सो गया।
सभी नागरिक शिकायतों के पोथे लेकर आयोजन स्थल पर पहुँचे, लेकिन एक भी नागरिक राजा के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं बोल पाया। क्योंकि दो घंटे तक तो मंत्रियों ने ही माइक नहीं छोड़ा।
✍️ चिराग़ जैन

भारतीय राजनीति : एक निबंध

भारतीय राजनीति में दो पक्ष होते हैं। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे की दृष्टि में विपक्ष होते हैं। भारत की राजनीति एक सधे हुए नाटक की तरह है जिसकी बाकायदा एक पटकथा है। इस पटकथा में हर पक्ष के अलग-अलग संवाद हैं।
पाँच साल में एक बार मतदान की पर्चियों से यह तय किया जाता है कि कौन-सा पक्ष कौन से संवाद बोलकर नाटक में शामिल होगा।
जिस पक्ष को अधिक सीटें मिलती हैं उसे जनता सरकार कहने लगती है। जिस पक्ष के पास सीटों की संख्या कुछ कम रह जाती है वह किसी भी तरह सरकार में आने की कोशिश करने लगता है।
दुनिया दिखावे के लिए इस व्यवस्था को लोकतंत्र कह दिया जाता है। हालाँकि इस तंत्र में लोक जमूरे की तरह नाचता है और तंत्र दर्शकदीर्घा में बैठा हुआ आनंद लेता है।
जिस पक्ष को सरकार कहलाने का सौभाग्य नहीं मिल पाता उसे जनता के वे दुःख-दर्द भी दिखाई देते हैं, जो ख़ुद जनता को भी नहीं दिखते। इसलिए वह लगातार सरकार को निर्मम, भ्रष्टाचारी और अलोकतांत्रिक सिद्ध करने में लगा रहता है।
जिस पक्ष को जमूरों ने सरकार सिद्ध किया होता है, उसे जमूरों के आचरण की सारी खामियां दिखने लगती हैं। हर सरकार जनता की दुर्दशा के लिए पिछली सरकारों को दोषी ठहराने में व्यस्त रहती है।
जनता इस नाटक से कभी बोर नहीं होती। लेकिन दर्शक दीर्घा में बैठे सरकारी पक्ष को कभी-कभी गुस्सा आ जाता है।
वह उठकर घोषणा कर देता है कि अब जिसे भी नाचना है वो केवल हमारी डुगडुगी पर नाचेगा। विपक्ष की डुगडुगी पर नाचने वालों के हाथ-पैर बांध दिए जाएंगे।
सम्वेदनशीलता का अभिनय करता हुआ विपक्ष डुगडुगी छोड़कर दर्द की शहनाई बजाने लगता है। वह दबी हुई आवाज़ में चीखता है कि यह लोकतन्त्र की हत्या है। लेकिन जिसकी डुगडुगी नहीं सुनी गई उसकी शहनाई कौन सुनेगा?
शहनाई बजाते-बजाते विपक्ष की साँस फूलने लगती है।
सरकार को थका-हारा विपक्ष देखकर अच्छा लगता है। हाथ-पैर बंधे हुए बन्दरों की बेचैनी सरकार के लुत्फ़ को बढ़ा देती है। बंधे हुए बंदर शहनाई पर नाचने की कोशिश करते हैं, लेकिन ज़रा-सा हिलने की कोशिश से भारी-भरकम बेड़ियाँ उन्हें धराशायी कर देती हैं। बेचारे बंधक आँखों की पुतलियाँ हिलाने से भी घबराने लगते हैं।
सरकार को जंजीर-डांस देखने की लत लग जाती है। धीरे-धीरे वह अपनी डुगडुगी पर नाचनेवालों के भी हाथ-पैर बांध देती है।
जनता बेचारी परेशान होकर सरकार अलट-पलट कर देती है तो दोनों पक्ष आपस में संवाद बदल लेते हैं। पटकथा ज्यों की त्यों रहती है। सम्वाद जस के तस रहते हैं। बस, बोलनेवाले बदल जाते हैं।
नाटक चलता रहता है और जमूरे आपस में लड़ने लगते हैं। ताज़ा समाचार मिलने तक इस व्यवस्था को लोकतन्त्र ही कहा जाता है।
✍️ चिराग़ जैन

फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

संपन्नता से वे ऑफ लिविंग बदल सकता है, लेकिन वे ऑफ थिंकिंग पर संपन्नता का कोई असर नहीं होता। झुग्गी बस्ती में पानी का टैंकर आने पर जिस तरह की झड़प होती है ठीक वैसी ही तू-तू-मैं-मैं एयरपोर्ट पर सिक्युरिटी चेक करते समय भी ख़ूब होती है। अन्तर बस इतना है कि फेंकने की सिचुएशन आने पर पानी की बाल्टी, सेमसोनाइट की अटैची से रिप्लेस हो जाती है और माँ-बहन की भद्दी गालियां अपने अंग्रेजी अनुवाद का अवतार ले लेती हैं।
पढ़ी-लिखी महिलाएं झुग्गी वाली महिलाओं की तरह एक-दूसरे के बाल पकड़कर खींचने की बजाय बात को इतना लंबा खींच देती हैं कि सामने वाला ख़ुद अपने बाल नोच लेता है।
कस्बाई शामें देसी दारू की महक से प्रारम्भ होकर मारपीट और गाली-गलौज पर संपन्न होती हैं, जबकि होटलों की शामें दिखावटी आलिंगनों से प्रारंभ होकर गाली-गलौज पर संपन्न हो जाती हैं। हाई-क्लास लोग मारपीट और हाथापाई नहीं करते, क्योंकि इस काम को करने के लिए अपना निजी शरीर प्रयोग करना पड़ता है।
पीवीआर सिनेमा की लाइन में भी लोग उसी सोच से बीच में घुसने का प्रयास करते हैं जिस चतुराई से वे मिट्टी के तेल की लाइन में चुपचाप घुसने की कोशिश करते थे। लाइन तोड़कर बीच में घुसने की जो दक्षता हम भारतीयों में है, उसका विश्व में कोई सानी नहीं है। लेकिन इसका यह बिल्कुल अर्थ नहीं है कि हर कोई ऐरा-गैरा हमारे रहते बीच में घुस जाएगा। इसका सीधा फार्मूला है, जो हमसे ज़्यादा ढीठ होगा, वही हमसे जीत पाएगा। इसीलिए सिविक सेंस, रोड सेंस और यहाँ तक कि कॉमन सेंस को भी कभी अपने बीच में जगह नहीं बनाने दी।
एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चैक की लाइन हो तो भी हम चेहरे पर फ्लाइट छूटने की चिंता का ऐसा शानदार अभिनय पोत लेते हैं कि क्रूर से क्रूर आदमी को भी पीछे हटना पड़ेगा। ये और बात है कि अंदर वही बेचारा जब विंडो शॉपिंग पर टाइम पास करता दिखता है तो उसकी आँखों में बेशर्मी तैर रही होती है।
वाहनों का इंश्योरेंस होने के बाद भी दो गाड़ीवाले सड़क पर उसी तरह से नुक़सान की भरपाई के नाम पर पैसे वसूलने की भरसक कोशिश करते हैं, जैसे किसी ऑटोरिक्शा से टच हो जाने पर साइकिलवाला अपने पैर की हड्डी टूटने की घोषणा करके लँगड़ाने लगता है।
हम दरअस्ल दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि हम बदतमीजी करते वक़्त ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब, शहरी-ग्रामीण जैसे भेदभाव नहीं करते। हम अपने मूल संस्कारों को भूलकर कोई वैभव नहीं भोग सकते। इसीलिए हमारे भूखे-नंगे से लेकर करोड़पतियों तक बकी जानेवाली गालियों में रत्तीभर फर्क़ नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

बेताल पचीसी

पत्रकारिता, सम्राट विक्रम की तरह राजनीति के बेताल को अपनी पीठ पर लादकर, जनमत की यज्ञशाला तक ले आने में समर्थ थी।
जब भी पत्रकारिता, राजनीति को वश में करके यज्ञशाला की ओर चलती, तो बेताल किसी अनावश्यक कहानी में उसे उलझा देता था। भ्रमित विक्रम, यज्ञशाला का लक्ष्य भूलकर कहानी के समाधान में भटक जाता। ज़रा-सी चूक होते ही बेताल हाथ से निकल जाता था और विक्रम देखता रह जाता था।
एक दिन विक्रम ने साधु के हाथ-पैर बांधकर उसे ही पीठ पर लाद लिया। थोड़ी दूर चलते ही बेताल ने दूर बैठकर एक कहानी शुरू की और फिर कहानी बीच में छोड़कर भाग गया।
विक्रम ने साधु को रास्ते में पटका और कहानी पूरी करने निकल गया। इससे पहले कि कहानी पूरी हो, बेताल फिर से कोई नई कहानी उसके हाथ में थमाकर भाग निकला।
अब, साधु बीच रास्ते में बंधा हुआ कराह रहा है। यज्ञशाला पर बेताल ने कब्ज़ा कर लिया है। और विक्रम बेचारा, रोज़ एक कहानी को अधूरा छोड़कर, नई कहानी को पूरा करने में व्यस्त है।

✍️ चिराग़ जैन

भीड़ हैं हम

हमने ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसने हमें ‘भीड़’ से ‘जनता’ बनाना चाहा। हमें भीड़ बने रहना पसंद है। हम भीड़ बनकर जीते हैं और भीड़ बनकर मर भी जाते हैं। इसीलिए हमारे अख़बारों की सुखिऱ्याँ हमारा नाम नहीं जानतीं। कभी यात्री, कभी श्रद्धालु, कभी किसान, कभी तीर्थयात्री, कभी विद्यार्थी, कभी मज़दूर, कभी आदिवासी और कभी पुलिसवाले बनकर हम मर जाते हैं; हमारा कोई नाम नहीं होता। हमें एक ‘भीड़’ के नाम से जाना जाता है।
अपराधियों के नाम होते हैं, लेकिन निरपराध का कोई नाम नहीं होता। अपराध तो छोड़िए साहब, हम शहर में गाड़ी लेकर निकलते हैं, कहीं किसी कारणवश गाड़ी सड़क के किनारे रोकते हैं तो पुलिसवाला हमें भीड़ की तरह यह कहकर खदेड़ देता है, ‘यहाँ गाड़ी खड़ी करना मना है’। हम पूछते हैं, ‘तो फिर कहाँ खड़ी करें?’
इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं होता। वह डाँट देता है, ‘यहाँ से आगे ले बे!’ हम आगे ले लेते हैं।
हमारे तंत्र ने जिन देशों की सड़कों के किनारे से ‘नो पार्किंग’ का डिज़ाइन टीपा है, उन देशों से हम व्यवस्थित पार्किंग सिस्टम की कॉपी करना भूल गए।
विश्व समुदाय भी हमें कोई विश्वगुरु नहीं मानता, उनके लिए भी हम केवल एक भीड़ हैं। एक भीड़, जिसे अपना माल बेचा जा सकता है। एक भीड़ जिसे सपने बेचे जा सकते हैं।
शुरुआत में राजनीति भी हमें ‘जनता’ कहकर ही संबोधित करती है लेकिन अंततः वह हमें ‘भीड़’ की तरह इस्तेमाल करती है। जिस मंच से वह हमें जनता कहकर हमसे वोट मांग रहे होते हैं, उसी मंच की रिपोर्टिंग में हमें भीड़ कहा जा रहा होता है और हम तालियाँ पीट रहे होते हैं।
अगर कहीं जनता के लिए राजनीति के हाथों कुछ हितकर्म हो भी जाए, तो हम भीड़ बनकर उस विकास की ऐसी धज्जियाँ उड़ाते हैं कि राजनीति को अपने किए पर क्रोध आने लगता है। फिर वह हमें साम्प्रदायिक भीड़ में बदल देती है, फिर वह हमें जातियों की भीड़ में बदल देती है। हम ख़ुशी-खुशी भीड़ बन जाते हैं और दूसरी भीड़ के विरुद्ध गालियाँ तलाशने लगते हैं।
हमें भीड़ बनकर लड़ने की आदत हो गई है। हमें जैसे ही कोई साइनबोर्ड मिलता है, हम तुरंत उसके नीचे भीड़ बनकर जुटने लगते हैं। ‘गांधी’; ‘लोहिया’; ‘अम्बेडकर’; ‘हेडगेवार’; ‘कांशीराम’; ‘जयप्रकाश’; ‘मोरारजी’; ‘वीपी सिंह’; ‘मुलायम’; ‘माया’; ‘जयललिता’; ‘करुणानिधि’; ‘ठाकरे’; ‘अन्ना’; ‘केजरीवाल’; ‘मोदी’; ‘राहुल’; ‘ओवैसी’… ये सब हमारे लिए साइनबोर्ड बन गए और हम इनके नीचे भीड़ बनकर जुटते रहे।
इन सबने हमें मनुष्य बनाना चाहा तो हमने इनको पूरी ताकत से यह एहसास कराया कि हमें इंसान समझने की ग़लती मत करना। हमें भीड़ समझो, वर्ना हम तुम्हारे खिलाफ़ खड़े होकर तुम्हें औंधे मुँह गिरा देंगे।

✍️ चिराग़ जैन

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