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तो भी मैं ग़लत

मैं अगर ख़ुद अपना सच बतलाऊँ तो भी मैं ग़लत और अगर हर झूठ को सह जाऊँ तो भी मैं ग़लत ग़र तुम्हारे वार से मर जाऊँ तो भी मैं ग़लत और अगर ख़ुद को बचाना चाहूँ तो भी मैं ग़लत बेअबद हूँ मैं अगर बेहतर करूँ कुछ आपसे और गर बेहतर नहीं कर पाऊँ तो भी मैं ग़लत बेवजह अपशब्द कहने की मुझे आदत...

रिसाला

याद है मुझको अभी भी मैंने तुमको एक जीती-जागती कविता कहा था। सुन के तुम शरमा गई थी खिलखिलाकर हँस पड़ी थी और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए मेरी आँखों में उतर आई थी तुम। याद है मुझको कि उस लम्हा बिना सोचे ही तुमने टप्प से उत्तर दिया...

ओ माधो जी!

ओ माधो जी! कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी काफ़ी सजी-धजी लगती थी यूँ लगता है तुमने उसको नहलाने में अपनी आँखों का सब पानी ख़र्च कर दिया! वो जो गै़रत वाला जोड़ा तुम हरदम पहने रहते थे कल मैंने उस ही जोड़े में रूह तुम्हारी लिपटी देखी आँखें झुकी हुई थी उसकी गर्दन नीचे गड़ी...

पुल बनाओ तो सही

पुल बनाओ तो सही इस फ़ासले के सामने मुश्क़िलें ख़ुद हल बनेंगीं मसअले के सामने आंधियाँ राहों में बिछ जाएंगीं सजदे के लिए आसमां छोटा पड़ेगा हौसले के सामने जब जवानी चल पड़ेगी बांधकर सर पर क़फ़न कौन फिर आएगा उसके फ़ैसले के सामने हिम्मतों ने ताक पर रखे ज़माने के उसूल ताश के घर कब...

गुमान के असर से बचा

चलो किसी तरह मैं मुश्क़िले-सफ़र से बचा ख़ुदा मुझे तू अब गुमान के असर से बचा इन आइनों के सामने से ज़रा बच के निकल तू अपने आप को ख़ुद अपनी भी नज़र से बचा अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा ये दुनिया हर किसी पे उंगलियाँ उठाती है तू अपनी सोच को...
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