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नृत्य : हर्ष का उत्कर्ष

सृष्टि के समस्त नाद की अनूदित कृति है नृत्य। सुर के अनुरूप गति, ताल के अनुरूप थाप, अर्थ के अनुरूप मुद्रा और भाव के अनुरूप भंगिमा; इन सबको एक साथ साधने का कौशल है नृत्य। नर्तक नटराज की प्रतिकृति है। शब्द से भंगिमा तक की यात्रा का सारथी नर्तक है।
देह के एक-एक अंग को अलग-अलग करके एक ही लय ताल में थिरकाना नर्तक का कौशल है। भृकुटि, नेत्र और दृष्टि… तीनों अलग-अलग होकर एक साथ नाचने लगती हैं। अधर, कपोल, ग्रीवा, कंधे, वक्ष, भुजाएँ, कलाई, हथेली, अंगुलियाँ, कटि, नितम्ब, चरण… सब नाचते हैं… विलग किन्तु एकाकार। मन बावरा होकर नाचता है। धरती एड़ी से टकराकर नूपुर में स्वर भरने लगती है।
शेष साज दूर खड़े नर्तक के स्पर्श को तरसते रहते हैं और नूपुर कलाकार के पैर पकड़कर नृत्य का अंग बन जाता है। नूपुर यह संदेश देता है कि आनन्द से एकाकार होना है, तो पैर ही पकड़ने होंगे। यदि पैर न पकड़े जाएँ तो आनन्द के दर्शन सम्भव हैं, स्पर्श नहीं। कृष्ण की बाँसुरी आनन्द उत्पन्न कर सकती है किंतु कृष्ण के नृत्य का अंग नहीं बन सकती। किन्तु मीरा के घुंघरू मीरा के साथ-साथ नाच सकते हैं। क्योंकि बाँसुरी ने अधर चुने और घुंघरुओं ने पग।
नृत्य स्वयं में एक दर्शन है। देह के विदेह होने की झाँकी है। वातावरण में घुल जाने का अनुभव है। मन के भीतर जुट आए उत्स का मूर्त रूप है। झिझक और संकोच से विरक्ति है नृत्य। सहजता का महापर्व है नृत्य। निश्छल हो जाने का उद्घोष है नृत्य। निस्पृह हो जाने की सूचना है नृत्य। आत्मा के अलंकृत और मन के झंकृत हो उठने का पल है नृत्य। हर्ष के उत्कर्ष का अनुवाद है नृत्य। यही कारण है कि जिसने उसे पा लिया, वह नाचने लगा। नाचने के लिए कुछ पा लेने की ख़ुशी; न्यूनतम अर्हता है। मीरा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। राधा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। सूर, कबीर, रैदास, तुलसी… सब नाचते हुए लोग हैं। यहाँ तक कि लंगड़ा मनसुखा भी नाच उठता है। नाचने के लिए देह चाहिए ही नहीं। नृत्य तो मन में घटित होता है, देह तक तो केवल कम्पन पहुँचता है। जैसे धरती के गर्भ में हुई हलचल का कम्पन भर भूकम्प बन जाता है, किन्तु भूकम्प हलचल का कारण नहीं है। कारण तो अदृश्य है। बहुत गहरे, मन की भीतरी परतों में।
यही कारण है कि जब कोई प्रेम में होता है तो मन की इस हलचल का असर चेहरे पर दिखाई देने लगता है। फिर स्वयं प्रेमी भी किसी तरह इस असर को रोक नहीं सकता। हलचल हुई है तो भूकम्प का आना तय है। मन नाच उठा है तो देह का थिरकना अवश्यम्भावी है। इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है।
बरसात होती है तो वृक्ष नाचने लगते हैं। बादल घिरते हैं तो पवन की थिरकन दिखाई देती है। समुद्र लहर-लहर नाचता है, झीलें, नदियाँ… सब नृत्यमय हैं। मरुस्थल भी नाचता है। पर्वत जड़ होकर भी वादियों में नृत्य करता प्रतीत होता है। झरने गाते हुए नाचते हैं। इन सबका नाचना ही प्रकृति के स्वास्थ्य का द्योतक है। रुग्ण व्यक्ति नाच नहीं सकता।
नाचने के लिए स्वस्थ होना ही पड़ेगा और स्वस्थ बने रहने के लिए नाचना ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

शंकर

जो जीवन को तीर्थ बना ले तीर्थंकर हो जाता है
क्रोध चढ़े सिर पर तो मानव प्रलयंकर हो जाता है
जग की पीर पचाकर जग का हित कर पाना मुश्किल है
जो विष पीकर भी जीवित हो, वो शंकर हो जाता है

✍️ चिराग़ जैन

क्षमा : एक पर्व

क्षमावाणी मनुष्य इतिहास का सर्वाधिक वैज्ञानिक पर्व है। यह मनुष्यता के लिए सबसे आवश्यक त्योहार है। ‘क्षमा’ मानव के चरित्र निर्माण का सर्वाधिक प्रबल यंत्र है।
क्षमादान कठिन है किन्तु क्षमायाचना उससे भी अधिक कठिन है। क्षमा करनेवाले के पास कहीं न कहीं बड़प्पन का कोई अहंकार हो सकता है, किंतु क्षमा याचना करनेवाला तो हर अहम् से मुक्त होता है। क्षमा मांगने के लिए अहम् को तिरोहित कर देना अपरिहार्य है। जिसने यह कर लिया वह उत्सव का अनुभव कर सकता है।
‘क्षमा’ – लिखना कठिन है, बोलना और भी कठिन है, अनुभूत करना इससे भी अधिक कठिन है और क्षमा कर पाना सबसे कठिन है। व्यवहारिक धरातल पर जब हम जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं, उस समय स्थितप्रज्ञ रहकर विपरीत परिस्थितियों में अपनी सहजता को अक्षुण्ण रखना बेहद दूभर होता है। कई बार आपकी क्षमाशीलता को आपकी दुर्बलता समझ कर विपरीत पक्ष आपको प्रतिक्रिया हेतु विवश करता है। ज्ञानी कहते हैं कि सामनेवाला कुछ भी करे, आपको क्षमाशील बने रहना है। किन्तु मेरा मत है कि मनुष्य ने जितने भी संबंध निर्मित किये हैं, उनमें ‘क्षमा’ का संबंध एक ऐसा संबंध है जिसका द्विपक्षीय होना अपरिहार्य है।
यदि दूसरा पक्ष क्षमा के सूत्र में बंधने को तैयार न हो, और हम इकतरफ़ा क्षमा करते रहें तो धीरे-धीरे क्षमा करने वाले व्यक्ति में स्वयं के महान होने का सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगता है। इसके जन्मते ही वह दूसरे को पहले मूर्ख और फिर तुच्छ समझने लगता है। और आगे बढ़ने पर घृणा जन्म लेती है, और अंततः स्थिति पुनः कटुता की ओर बढ़ जाती है। इसलिए क्षमा के संबंध को साधना है तो इकतरफ़ा निबाह से काम नहीं चल सकता।
साँप के काटने पर अहिंसक रहनेवाले तथागत का उदाहरण हमें याद रखना चाहिए किन्तु सौ गालियाँ देने वाले शिशुपाल का उदाहरण भी हमें नहीं बिसारना चाहिए। यह केवल अपने लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु ‘क्षमाभाव’ के वैभव हेतु भी अपरिहार्य है। यदि थोड़ा-सा ध्यान करेंगे तो हमें ऐसी परिस्थितियों के अनेक उदाहरण अपनी ही ज़िन्दगी के आसपास मिल जाएंगे।
जिस शस्त्र से शत्रु को परास्त करना हो, उसकी साधना और उसकी पड़ताल बेहद आवश्यक हैं। हमने ‘मुआफ़ी‘; ‘सॉरी’; ‘क्षमा’ जैसे शब्दों को इतना बेमआनी बनाकर रख दिया है कि न तो बोलनेवाले को इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है, न ही सुननेवाले को।
जैनियों के पर्युषण पर्व इस शब्द को प्राणवान करने की साधना है। दस दिन के ये पर्व अवचेतन तक क्षमा के पहुँचने का मार्ग हैं। पहले दिन क्षमा का अर्थ समझना होता है, उसके बाद मार्दव, आर्जव आदि के माध्यम से चित्त को क्षमा मांगने योग्य बनाया जाता है, तब कहीं जाकर क्षमा ‘वाणी’ में साकार होती है।
एक बार मुख पर क्षमा विराजित हुई कि त्योहार हो गया, एक बार जिव्हा ने क्षमा चख ली तो फिर मन इतना हल्का हो गया कि वह नाच उठा। फिर अलग से ढोल-नगाड़े नहीं बुलाने पड़ते। फिर तो भीतर का संगीत झूम उठता है। जिन ग्रंथियों ने मन को जकड़ रखा था, वे इस एक शब्द की गूँज से विलीन हो गईं।
यह प्रयोग बेहद सार्थक है। यह आपने भी यकीनन कभी न कभी आज़माया ही होगा। यदि न आज़माया होता तो आप आज जीवित न होते। क्षमा के अभाव में जीवित रहना असंभव है। क्षमा के बिना जीवन ऐसे ही है जैसे किसी झल्लीवाले की पीठ पर लगातार बोझा बढ़ता रहे और उसे उतारने का कोई उपाय ही न किया जाए। फिर अधिक देर तक पीठ बोझा उठा न सकेगी। यह तो कमर टूट जाएगी या लकवा मार जाएगा। बोझा उतारा न गया तो झल्लीवाला यकीनन मर जाएगा।
हमारा मानस संसार में खड़ा यही झल्लीवाला है। दिन-प्रतिदिन के व्यावहार में इस पर बोझा बढ़ता जाता है। क्षमा मन का बोझा उतार देने का उपाय है। भीतर सड़ांध मारती ग्रंथियों से मुक्त होकर जीवन की सुवास भोगने का ज़रिया है। यही कारण है क्षमादान उतना आवश्यक नहीं जान पड़ता, जितना आवश्यक क्षमा याचना है।
अपने भीतर जो कचरा भर गया है, उसे कचरा मानने के लिए तैयार होना कठिन है। उसकी पहचान करके यह स्वीकार कर पाना कि हमने अपने भीतर कचरा रख लिया था- यह आसान काम नहीं है। इस मूर्खता के लिए सबसे पहले स्वयं से क्षमा मांगनी पड़ती है। इस विद्रूपता के लिए अपने आप पर हँसना पड़ता है। यह आसान नहीं होता। दूसरे पर हँसना बहुत आसान है, किंतु अपने आप पर हँसना बड़ा श्रमसाध्य काम है। लेकिन इस सोपान के बिना क्षमा का सुख भोगना नामुमकिन होगा।
‘क्षमावाणी’ पर्व के अवसर पर एकांत में बैठकर अपनी ग़लतियों को याद करना। अपने भीतर भरे द्वेष और घृणा के कचरे की पहचान करने का प्रयास करना। जिसके प्रति क्षोभ या अपराध बोध हो, उसके साथ घटित हुई सर्वाधिक कड़वी घटना को याद करना और फिर जिससे मांगनी हो, उसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क करके पूरे चैतन्य मन से क्षमा याचना करना। अगर आज भी रेडीमेड क्षमा मांग ली तो यह पर्व निरर्थक रह जाएगा। अगर आज भी प्राणहीन क्षमा कर के रह गए तो पीठ का बोझा न उतर सकेगा। अगर आज भी खोखली औपचारिकता में फँसे रह गए तो मन को निर्ग्रंथ करने का स्वर्णिम अवसर हाथ से जाता रहेगा।

✍️ चिराग़ जैन

आख़िर फूल बिखर जाने हैं

चाहे कितनी देह सँवारें
चाहे जैसे रूप निखारें
चाहे कितनी गन्ध उड़ाएं
चाहे गुलशन को महकाएं
लेकिन इतना तय है इक दिन, इस डाली से झर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं

सारा नूर हवा होता है, तन भी कुम्हलाने लगता है
जिस सूरज ने प्राण भरे थे, वो ही झुलसाने लगता है
जिन झोंकों के छूने पर हम, ख़ुद पर इतराते फिरते थे
उन झोंकों के छूने से भी, ये मन घबराने लगता है
कुछ पल के मेहमान सभी हैं, फिर सब अपने घर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं

इस क्यारी ने जाने कितने फूलों का खिलना देखा है
रस की चाहत में भँवरों के पंखों का छिलना देखा है
इस बगिया को इन फूलों का रूप लुभा पाएगा कैसे
इस बगिया ने सुंदरता का मिट्टी में मिलना देखा है
इसको है मालूम सभी के इक दिन रंग उतर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं

इसका नूर दिनों ने देखा, उसके हिस्से रातें आईं
कुछ वनफूलों के हिस्से बस, आँसू की बरसातें आईं
हम सब लोगों का ही जीवन, केवल क़िस्मत का खेला है
कुछ को माली ने दुलराया, कुछ के हिस्से घातें आईं
हम सारे ही लोग यहाँ बस कुछ दिन जीकर मर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं

✍️ चिराग़ जैन

नियति

रोज़ नया अनुभव जुड़ता है
रोज़ उमर घटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

जब यह तय है कुछ दिन पीछे हम सबको निश्चित मरना है
फिर इतने सारे अनुभव का आख़िर हमको क्या करना है
बिन मतलब के अनुभव से ही
निश्छलता छँटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

सागर युग-युग तक गरजेगा, लहरें आएंगी-जाएंगी
कुछ सागर तट को चूमेंगी, कुछ पहले ही मिट जाएंगी
लहर नियत सीमा तक बढ़कर
ख़ुद पीछे हटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

श्रम में जीवन बीत गया तो, कब तन को विश्राम मिलेगा
काया केवल कष्ट सहेगी, और चेतन को राम मिलेगा
जो पाया उसको बिसराकर
दुनिया क्या रटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

✍️ चिराग़ जैन

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