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दिल के अरमान हैं

लफ़्ज़ आँखों के किनारों पे ठहर जाते हैं अश्क़ होठों पे हँसी बन के बिखर जाते हैं ये ज़माना जिन्हें अशआर कहा करता है दिल के अरमान हैं काग़ज़ पे उतर जाते हैं ✍️ चिराग़...

याद

कभी जब नीम की डाली पे चिड़ियाँ चहचहाती हैं हज़ारों ख्वाहिशें दिल में तड़पकर कुलबुलाती हैं मेरे आगे से जब भी ख़ुशनुमा मंज़र गुज़रते हैं किसी की याद में भरकर ये आँखें छलछलाती हैं ✍️ चिराग़...

क़हक़हे

बिल्कुल ख़ाली कर दिया है मैंने दिल का भरा-पूरा मकान आँखों की बाल्टी में आँसुओं का पानी भरकर धो डाला है मकान का एक-एक कोना …काफ़ी दिन हुए। लेकिन अब भी गूंजते हैं यादों के क़हक़हे टकराकर ख़ाली मकान की ख़ामोश दीवारों से। और मैं फिर से धोने लगता हूँ दिल के मकान की उदास...

प्रेम-तीर्थ

मुम्बई में जुहू-चौपाटी पे शाम सात बजे बाद; परिवार संग नहीं जाना चाहिए आगरे में बालकों को ताज और प्रेमिका को पालिवाल गार्डन में घुमाना चाहिए बैंगलोर वाले लाल बाग़ जैसा कोई एक प्रेमियों को देश भर में ठिकाना चाहिए जहाँ पहले हैं, वहाँ और सुविधाएँ मिलें जहाँ पे नहीं हैं...

वो शालीन पल

हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल हर तरह की वासना से हीन पल अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल आपका आना, ठहरना, लौटना इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों हो गए हैं...
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