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फागुन की शाम

फागुन की शाम कैसी हवा चली हाय राम जोगियों का दिल धक-धक करने लगा सारी सोच बूझ घास-फूस सी बिखर गई मन को खुमार चकमक करने लगा पीपल का पेड़ सारे पंछियों के संग मिल झूम-झूम मार बक-बक करने लगा और चुपचाप मेरा मानस भी हौले-हौले प्रेम के मृदंग पे धमक करने लगा ✍️ चिराग़...

हम हाथ मल रहे हैं

हमको हमारे ऐसे हालात खल रहे हैं रग-रग में बेक़ली के सागर मचल रहे है उनकी झिझक ने इतना लाचार कर दिया है सब हाथ में है फिर भी, हम हाथ मल रहे हैं ✍️ चिराग़...

संबंधों की साँस उखड़ने लगती है

जब बेटी की उम्र ज़रा रफ़्तार पकड़ने लगती है तब माँ हर आते-जाते की नज़रें पढ़ने लगती है जब मन की कच्ची मिट्टी कुछ सपने गढ़ने लगती है तब ज़िम्मेदारी की भारी बारिश पड़ने लगती है यूँ तो वो अपनी हर ज़िद्द मनवा ही लेता है मुझसे लेकिन मेरे भीतर-भीतर नफ़रत बढ़ने लगती है प्यार अगर सच्चा...

बेचैनियाँ

वक्त क़े हाथों मिलीं मायूसियाँ हैं किस क़दर रुत बिछड़ने की है और नज़दीकियाँ हैं किस क़दर एक ही पल में ख़ुशी भी है, तड़प भी, दर्द भी क्या बताएँ इस घड़ी बेचैनियाँ हैं किस क़दर ✍️ चिराग़...

तुझको कुछ भी याद नहीं?

तेरी पलकों में सपनों की दुनिया अब आबाद नहीं मेरी यादें तेरे दिल तक पहुँचाती आवाज़ नहीं तुझको कुछ भी याद नहीं? तू मुझको रजनीबाला का मूर्तरूप सी लगती थी बातें तेरी, मुझे पौह की मधुर धूप सी लगती थी तेरा यौवन मुझे पंत की सोनजुही में दीखा था तूने मेरी यादों में रातों को...
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