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गीत लिखते वक़्त

इक दफ़ा पलकों को अश्क़ों में भिगो लेते हैं हम और फिर अधरों पे इक मुस्कान बो लेते हैं हम गीत गाते वक्त रुंध ना जाए स्वर इसके लिए गीत लिखते वक्त ही जी भर के रो लेते हैं हम ✍️ चिराग़...

क़हक़हे

बिल्कुल ख़ाली कर दिया है मैंने दिल का भरा-पूरा मकान आँखों की बाल्टी में आँसुओं का पानी भरकर धो डाला है मकान का एक-एक कोना …काफ़ी दिन हुए। लेकिन अब भी गूंजते हैं यादों के क़हक़हे टकराकर ख़ाली मकान की ख़ामोश दीवारों से। और मैं फिर से धोने लगता हूँ दिल के मकान की उदास...

माँ

माँ मैं तुझको क्या लिखूँ, सब तुझसे साकार जब-जब तू आशीष दे, तब-तब हो त्योहार ✍️ चिराग़ जैन

लफ्ज़ों के शोर में

हालात ने जब-जब भी माजरा बढ़ा दिया जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ फिर माँ की उंगलियों...

कोई कैसे सच बोले

जब तक हमसे भाग्य हमारे खोटे होकर मिलते हैं बस तब ही तक हम लोगों से छोटे होकर मिलते हैं कोई कैसे सच बोले सबकी है अपनी लाचारी अब तो दर्पण से भी लोग मुखोटे होकर मिलते हैं जिनसे मतलब हो बस उनकी हाँ को हाँ कहते हैं जो उनका क्या है; बिन पेंदी की लोटे होकर मिलते हैं जब से...
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