Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
कई रोज़ से देख रहा था
कि बादल के आगोश से निकल कर
और ख़ूबसूरत लगता था चाँद
और बढ़ जाती थी उसकी चमक
जैसे किसी ने फेशियल कर दिया हो
प्यार का!
लेकिन कल रात
तमतमाया हुआ था चाँद का चेहरा
शोले टपक रहे थे उसकी आँखों से
क्योंकि कल रात
जिस साये ने जकड़ लिया था चाँद को
उसकी छुअन में प्यार नहीं
सिर्फ़ ज़िद्द थी
किसी नफ़रत
किसी चिढ़
या किसी जलन से भरी
…..एक वहशी ज़िद्द!
और ज़िद्द
मुँह तो काला कर सकती है
पर मन हरा नहीं कर सकती
मौसम ग़ुलाबी नहीं कर सकती!
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मैं अपनी हर जीत भुला दूँ, तुम बिसरा दो हार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को
जब धरती ने हरियाली का रूप सजाना छोड़ दिया
तब अम्बर ने बादल लेकर आना-जाना छोड़ दिया
कोई तो आकर्षण मिलता सावन की बौछार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को
दिन की हर तारीफ़ भुलाकर महक लुटाई रातों पर
ध्यान नहीं अटका ख़ुशबू का दुनिया भर की बातों पर
रातों ने होंठों से चूमा खिलते हरसिंगार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को
सबके जीवन में दुनिया की थोड़ी तो मजबूरी है
फिर भी हर इक रिश्ते में थोड़ा सम्मान ज़रूरी है
कब तक मथुरा ठुकराएगा गोकुल की मनुहार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
सरगम गाने वाली वीणा
किसको अपनी पीर सुनाएँ
ऊपर अनगिन फूल खिले हैं
जिनकी देह सुगंध बिखेरे
भीतर जड़ में गंधियाते हैं
पत्तों की लाशों के डेरे
जितनी बढ़ती उमस जड़ों की
उतने फूल महकते जाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
कलकल करती जिस धारा की
घाटों पर पूजा होती है
वो निश्छल नदिया बेचारी
उद्गम पर रिस-रिस रोती है
अंत, गरजता खारापन है
आदि, गलन से ग्रसित शिलाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
असुरों के संहारक राजा
कोपभवन से हार गए हैं
दुनिया का मन जीत लिया पर
अंतर्मन से हार गए हैं
घर की चैखट पर टूटी हैं
कितनी अपराजेय ध्वजाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
अकेला छोड़ दे जब ये मुकद्दर, कौन आता है
किसी के आँसुओं से आँख भरकर कौन आता है
अंधेरा खुद पिघलकर आ गया रौशन चिरागों में
हमारी बाँह में वरना सिमटकर कौन आता है
हमें तो उम्र भर बस तीरगी से जंग लड़नी है
चिरागों की खबर लेने पलटकर कौन आता है
कमसकम झूठ तो हरगिज नहीं किस्से फरिश्तों के
मुसीबत में हवा का रुख बदलकर कौन आता है
हम अपना दर्द लेकर राह पर नजरें बिछाए हैं
जरा देखें फरिश्ता या सितमगर, कौन आता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
आपस का ये झगड़ा कुछ तो उसको भी खलता होगा
बस मैं ही तन्हा थोड़ी हूँ, वो भी तो तन्हा होगा
मैं तो हर मिलने वाले से मिलने से कतराता हूँ
वो भी सबसे मन की बातें करने से बचता होगा
शाम ढले मजबूरी में मैं बेमन से घर जाता हूँ
क्या वो भी घर के रस्ते पर रुक-रुक कर चलता होगा
अपने गम में रो लेने की फुरसत किस कमबख्त को है
मैं यूँ रोता हूँ वो मेरी यादों में रोता होगा
✍️ चिराग़ जैन