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मूल प्रवृत्ति

सामान्यतया राम की मूर्ति धनुष से पहचानी जाती है, और राम का चरित्र मृदुता से! इसके ठीक विपरीत कृष्ण की मूर्ति बाँसुरी से पहचानी जाती है किन्तु कृष्ण का चरित्र एक योद्धा का चरित्र है। राम कंधे पर धनुष रखकर विनम्र जीवन जीते हैं और कृष्ण अधरों पर बाँसुरी रखकर राजनैतिक जीवन जीते हैं। दोनों के चित्र देखकर उनके चरित्र का आकलन नहीं किया जा सकता। दोनों को जानने के लिए उनके आचरण का अनुसरण करना होगा।
राम के व्यवहार में बाँसुरी की मोहिनी है और कृष्ण के आचरण में धनुष का सा निस्पृह कर्म। शिशुपाल वध की घटना में कृष्ण ठीक धनुष का आचरण करते प्रतीत होते हैं। वे प्रत्यंचा के टूटने की सीमा तक अपने क्रोध के बाण को पीछे खींचते हैं और फिर एक क्षण में वही बाण शिशुपाल की जीवन रेखा को दो टूक करता हुआ निकल जाता है। उधर कैकेयी और मंथरा के प्रति राम का व्यवहार बाँसुरी की मिठास से परिपूर्ण है। वे अपनी दसों उंगलियों से परिस्थिति को साधने का यत्न करते हैं और अंततः सम्बन्ध को सुरम्य बना लेते हैं।
राम और कृष्ण के मध्य का यह विलोम अन्य भी अनेक विषयों में उजागर होता है। रामकथा आस्था के पोषण पर केंद्रित है। रामकथा में प्रतीक्षा के समापन स्वरूप रामकृपा प्राप्त होती है। अहल्या की प्रतीक्षा का समापन राम के स्पर्श से हुआ। शबरी की प्रतीक्षा का समापन राम के दर्श से हुआ। सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर मूक होकर प्रतीक्षा करते रहे और राम ने बाली का वध करके सुग्रीव की प्रतीक्षा का सुखद अंत कर दिया। रामकथा की सीता भी अशोक वाटिका में राम के प्रति आस्था के बल पर प्रतीक्षारत रही। और रामकथा के भरत भी चौदह वर्ष तक राम के लौटने की प्रतीक्षा करते रहे। प्रतीक्षा के लिए आस्था आवश्यक है। और आस्था भी पूरी तरह निशंक होनी चाहिए। जहाँ आस्था को संशय ने छुआ वहीं धैर्य डोल जाएगा। फिर एक क्षण भी प्रतीक्षा करना सम्भव नहीं होगा। संशय की एक बूंद आस्था के महासागर को सुखा देती है। इसलिए रामकथा की प्रत्येक प्रतीक्षा अद्वितीय है।
लेकिन कृष्ण की कथा कर्म की महत्ता बताती है। इसलिए कृष्ण की कथा के जिस भी पात्र ने कृष्ण को पाया, उसे आस्था रखते हुए कर्मशील भी होना पड़ा। कृष्ण गोपियों तक चलकर नहीं जाते, वे तो वृंदावन में चैन की बंसी बजाते बैठते हैं; उनकी बंसी की तान पर गोपियों को वृंदावन तक जाना पड़ता है, तब रास घटित होता है। सुदामा की प्रतीक्षा, किसी साधना से कम नहीं थी। किन्तु कृष्ण को पाने के लिए उन्हें द्वारका के राजमहल तक जाने का उद्यम करना पड़ा।
कृष्ण चाहते तो अर्जुन की ओर से लड़ सकते थे किंतु वे युद्धक्षेत्र में होते हुए भी शस्त्र नहीं, लगाम थामते हैं। उनका सखा अर्जुन, कृष्ण के साथ होते हुए भी अपनी लड़ाई स्वयं लड़ता है। अपना कर्म स्वयं करता है। यह घटना इस बात की ओर इंगित है कि आस्था को कर्म का संबल मिले तो कृष्ण को पाया जा सकता है।
ये दोनों सनातन चरित्र पहले हमें आस्थावान बनना सिखाते हैं। और जब आस्था पुष्ट हो जाए तब कर्मशील होने का प्रावधान है। आस्था के अभाव में किया गया कर्म ईश्वर का साहचर्य नहीं दिला सकता।
रामकथा और कृष्णकथा में ऐसे बहुत विलोम दिखाई देते हैं। राम मित्रता के निर्वहन हेतु वनवासी सुग्रीव को उसकी किष्किंधा जीतकर देते हैं। राम लंका जीतकर शरणागत विभीषण को सौंप देते हैं। किंतु कृष्ण, पाण्डवों को वनवासी होने से रोकने का कोई यत्न नहीं करते। वे उनके इंद्रप्रस्थ के लिए कोई कूटनीति नहीं रचते। अपितु एक ऐसे युद्ध की सर्जना करते हैं कि इंद्रप्रस्थ पर दृष्टि गड़ानेवाले दुर्योधन से उसका हस्तिनापुर भी छीन लिया जाए। और यह कार्य कृष्ण करते नहीं, करवाते हैं।
इतनी विविधता के बाद भी एक बात दोनों ही चरित्रों से सीखने को मिलती है, और वो बात यह है कि यदि केवल चित्र देखकर किसी का आकलन किया जाए तो आप उसकी मूल प्रवृत्ति को नहीं समझ पाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

भूल

क्यों भला भाती नहीं शीतल नदी की धार
यूँ समझ लो आप अपनी प्यास को भूले हुए हो
ख़ुश हुए तो भूल बैठे दर्द का उपकार
रो पड़े तो प्राण के उल्लास को भूले हुए हो

आज से पीछा छुड़ाकर भागते हो
एक कोरे ख़्वाब के संग जागते हो
क्यों हज़ारों ख़्वाहिशों का ढो रहे हो भार
आप शायद वक़्त के इतिहास को भूले हुए हो

कब समय किसकी बना दे कौन सूरत
आँसुओं में भीग जाएँ, शुभ मुहूरत
कुंडली में दिख रहा आंगन खड़ा त्योहार
आप शायद राम के वनवास को भूले हुए हो

पाल भी बांधो, हवा भी है ज़रूरी
भीगकर ही नापती है नाव दूरी~
पार कर पाती नहीं नौका, कोई पतवार
तो यक़ीनन आप इक अरदास को भूले हुए हैं

✍️ चिराग़ जैन

राम: भारतीय संस्कृति की आत्मा का एक नाम

राम… एक ऐसा नाम, जिसका उच्चारण जितने गहरे स्वर में किया जाए, मन उतना ही आराम पाने लगता है। राम… एक ऐसा नाम, जिसको पुकारने के लिए किसी विशेष मनोदशा की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो हर परिस्थिति के अनुरूप लय धारण करने में सक्षम है। जिसका उच्चारण यकायक किसी साकार की छवि निर्मित न भी करे, तो भी किसी निराकार शक्ति से अनायास ही एकाकार कर देता है।
सम्बोधन से लेकर अभिवादन तक; चिंता से लेकर चिंतन तक; भेंट से लेकर विदा तक; जन्म से लेकर मृत्यु तक… हर गाम पर राम का नाम अपने पूरे अस्तित्व के साथ उपस्थित रहता है।
राम… एक शब्द के मन्त्र हो जाने का उदाहरण हैं। राम… एक मनुष्य के ईश्वर हो जाने की कथा है। राम… एक पुरुष के पुरुषोत्तम हो जाने का प्रमाण हैं। राम का चरित्र मर्यादा का एक ऐसा कथानक है, जिसकी किसी भी परिस्थिति में कल्पना करके उस परिस्थिति का सर्वाधिक मर्यादित समाधान खोजा जा सकता है। राम का चरित्र जय और पराजय से पूर्व मर्यादा की तुला से निर्मित होता है। यही कारण है कि मंथरा द्वारा बुने गए छल को राम अपनी मर्यादा के बल से ध्वस्त कर देते हैं।
लोभ और लोक की सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो राम का आचरण अनापेक्षित है। संबंधों में संशय की सर्जना करनेवाली मंथरा यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि कैकेयी द्वारा वरदान मांगे जाने पर राम इतनी सहजता से वनवासी हो जाएंगे। किन्तु वरबंधक दशरथ के सम्मुख खड़े राम ने उस समय जो आचरण किया, उससे एक ही क्षण में कैकेयी की जय, पराजित हो गई। यह मर्यादित आचरण का ही परिणाम था कि जिस पुत्र के मोह में माता कैकेयी ने साकेत का सुख भस्म कर दिया था; वही पुत्र, राम के मोह में माता कैकेयी और उनके उपलब्ध वरदानों को ठुकराकर राम को लौटा लाने चल दिये।
यह राम के आचरण की विजय थी। यह राम की मर्यादा की विजय थी। यदि राम दशरथ से अपने अधिकार के लिए लड़े होते, तो कदाचित ननिहाल से लौटे भरत का व्यवहार बदल सकता था। वे मंथरा के सुझावों तथा माता कैकेयी की हठधर्मिता को तर्कसंगत मान सकते थे। किंतु राम की मर्यादा ने इसकी संभावना ही समाप्त कर दी।
संशय की जड़ें काटने का कौशल हैं, राम। मर्यादा की सीमा में रहकर कल्पनातीत आचरण से राम हर अंसभव को संभव बना देते हैं। वे कहीं भी रूढ़ियों के दास नहीं बनते। उनकी नैतिकता, उनके आत्मविवेक द्वारा सर्जित नैतिकता है। वे कहीं भी रटी-रटाई नैतिकता का अनुसरण करते ¬प्रतीत नहीं होते। वे अपनी राह स्वयं बनाते हैं। वे अपनी नैतिकता स्वयं गढ़ते हैं। और उनकी रची नैतिकता इतनी सहज है कि वह हर काल में, हर युग में, हर वर्ग में स्वीकार्य हो जाती है। राम की नैतिकता युगातीत है।
यदि लोकप्रचलित परंपराओं के द्वार पर राम का विवेक घुटने टेक देता तो लोक के अनुसार पत्थर हो चुकी अहल्या, जीवित न हुई होती। यदि लोकप्रचलित परंपराओं के हाथों राम का आत्मविश्वास बिंध गया होता तो मिथिला के स्वयंवर-सदन में देवाधिदेव महादेव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का साहस राम कैसे जुटा पाते? वह भी तब जबकि तमाम महाबली इस प्रयास में विफल होकर लज्जा की टोकरी में मुँह छिपाए पड़े थे।
शिवधनुष की साधना, राम के निःशंक आत्मबल की धमक से संभव हो सकी। वे शिव के धनुष को तुच्छ समझकर उसे साधने का उपक्रम नहीं करते, अपितु पूर्ण विनय के साथ, शिवधनुष को प्रणाम करके उसे स्पर्श करते हैं। ऐसी विनम्रता के आगे भला कौन-सा शस्त्र नत न हो जाएगा!
यदि आवेश में उठाने गए होते, तो ऊर्जा का समस्त कोष तो आवेश प्रकट करने में ही नष्ट हो गया होता। फिर केवल बाहुबल से शिवचाप को हिलाना संभव न हुआ होता। राम आवेशातीत हैं। राम उद्वेग से अछूते हैं।
वे माँ जानकी का हरण करनेवाले रावण पर भी आवेश में आक्रमण नहीं कर देते। उन्माद जैसा तत्व तो राम के चरित्र के साथ मेल ही नहीं खाता। इसीलिए एकांत में किसी स्त्री का हरण करनेवाले पापी से भी राम यकायक युद्ध नहीं करते, अपितु बिना युद्ध के उसे यह अवसर प्रदान करते हैं कि अपने ‘पाप’ को ‘अपराध’ मात्र मानते हुए वह प्रायश्चित कर सके। रावण, जिसने राम की अर्द्धांगिनी का छल-बल से हरण कर लिया, उसके लिए भी मृत्यु के अतिरिक्त एक विकल्प उपस्थित करने वाले उदात्त नायक हैं राम।
राम इसलिए आदर्श नहीं हैं कि वे अवध छोड़कर वनवास जाते समय व्याकुल नहीं हुए। राम इसलिए भी आदर्श नहीं हैं कि सीताहरण के बाद उनमें रावण के ¬प्रति क्रोध नहीं, बल्कि जानकी के प्रति करुणा पनपी। राम इसलिए भी आदर्श नहीं हैं कि लक्ष्मण के मूर्च्छित हो जाने पर वे प्रतिशोध की अग्नि में जलने के स्थान पर धीरतापूर्वक लक्ष्मण के उपचार का उपाय खोजते हैं। वे तो इसलिए आदर्श हैं कि इन्द्रजीत की मृत्यु के उपरांत वे उसके अंतिम संस्कार तक युद्धविराम की घोषणा करते हैं। राम इसलिए आदर्श हैं कि रावण विजय के पश्चात भी वे माल्यवान और मंदोदरी का अपमान नहीं होने देते। राम इसलिए आदर्श हैं कि युद्ध में विजित होकर भी वे झपटकर माँ सीता से मिलने नहीं चल पड़ते।
राम इसलिए महान नहीं हैं कि उन्हें अपनी पराजय के समय धैर्य धरना आता है, अपितु वे इसलिए महान हैं कि वे अपनी विजय के समय भी धीरज धरना जानते हैं। वे युद्ध करते अवश्य हैं, किन्तु युद्ध से एकाकार नहीं होते। वे रावण सरीखे वीर योद्धा का वध करने के उपरांत भी उतने ही शांत रहते हैं, जितने अवध से प्रस्थान के समय थे। वे युद्धोन्मत्त उद्वेगी के समान रावण के शव के चारों ओर पाशविक नृत्य नहीं करते, बल्कि वे तो उस पराजित की विद्वत्ता का सम्मान करके उसका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार कराने की व्यवस्था करते हैं।
राम और रावण में इसी उदात्तता का अंतर है। विपरीत परिस्थितियों में संयत रहनेवाला राम हो गया और अपेक्षा की उपेक्षा होने पर आपा खो देने वाला रावण बन गया। यही कारण है कि राम की हमारे अंतःकरण में जो छवि है, वह उदात्त नायक की छवि है। क्रोध कभी घटित भी हुआ तो इतना प्रक्षालित होकर घटित हुआ कि जिस पर राम क्रुद्ध हुए, वह स्वयं विनत हो गया। सागर का अहंकार राम की विनम्रता के आगे पानी-पानी हो गया। राम इतने विनम्र हैं कि जिस रावण से युद्ध करने जा रहे हैं, उसके दरबार में बैठे दरबारी ही राम की भलमनसाहत के हवाले से रावण को आत्मसमर्पण की सलाह देते हैं।
यह चमत्कार नैतिकता के आत्मबल के सिवाय अन्य किसी माध्यम से संभव नहीं है। राम की कीर्तिध्वजा उनकी नैतिकता के ध्वजदण्ड पर फहराती है। इसीलिए राम का भक्त भी विवेक और विनम्रता की इस मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर पाता। पूँछ जलाने जैसे अपमान के बावजूद हनुमान इतने सविवेकी थे, कि उनके द्वारा भड़काई गई लपटों ने अशोक वाटिका की ओर प्रस्थान नहीं किया। आसन न दिये जाने के बावजूद अंगद ने रावण के दरबार में अपने दूतकार्य की सिद्धि के उपरांत कोई पराक्रम दिखाना आवश्यक न समझा।
इसीलिए रामभक्ति की प्रथम वरीयता है, विनम्रता। राम साधना का प्रथम सोपान है शांति। राम सिद्धि का प्रथम प्रमाण है उदात्तता। इसीलिए राम युद्ध का घोष नहीं, बल्कि अध्यात्म की लय बन जाते हैं। इसीलिए राम बोलने के बाद अधर बंद हो जाते हैं, मानो कह रहे हों कि अब कुछ और बोलना आवश्यक नहीं है।
‘पुनि-पुनि कहहिं-सुनहिं सब सन्ता’ -यह अर्द्धाली रामकथा के अजस्र सौन्दर्य का वर्णन करती है। रामकथा का यही वह गुण है, जिस पर कवि रीझते रहे हैं। कई बार लिखी जा चुकने के बावजूद इस कथा में हर बार कोई न कोई ऐसा नया आयाम मिल ही जाता है, जिसे लिखकर कवियों को सृजन-संतोष प्राप्त होता है।
यही कारण है कि रामायण की प्रवाहमयी कथा के बीच भी कवियों ने अनेक बिन्दु ऐसे ढूंढ ही लिये जिन पर मूलकथा को अक्षुण्ण रखते हुए नये सिरे से लिखा जा सकता था। ऐसे ही सार्थक प्रयासों ने विश्व को ‘राम की शक्तिपूजा’ तथा ‘साकेत’ जैसी अद्वितीय रचनाएँ प्रदान कीं। रामकथा की एक-एक घटना पर अलग-अलग दृष्टिकोण से गीत, मुक्तक, दोहे तथा छन्दमुक्त कविताएँ अनवरत लिखी जाती रही हैं।
हाँ, पिछले कुछ दशकों में राजनैतिक लहर के कारण राम के चरित्र तथा राम की कथा से विलग होकर राम को एक नारे के रूप में प्रयोग करके भी कुछ साहित्य रचा गया है। यह भी सत्य है कि राम की कविता के नाम पर जब उन नारों को परोसा जाता है तो वे एक बार रामकथाधारित काव्य होने का भ्रम भी उत्पन्न कर देते हैं, किन्तु न तो उन रचनाओं की आयु रामकथा की भाँति अनन्त होती है, न ही उनकी उपादेयता सार्वभौमिक होती है। वे किसी राजनैतिक आन्दोलन की भाँति उगती हैं और राजनैतिक परिवेश बदलते ही विस्मृत हो जाती हैं।
इसी स्थिति के स्पष्टीकरणार्थ कविग्राम ने यह अंक उन रचनाओं को समर्पित किया है, जिनमें रामकथा के किसी पात्र, किसी बिम्ब अथवा किसी घटनाक्रम को आधार बनाया गया है।
राम के अप्रतिम व्यक्तित्व पर लिखी गयी कविताएँ बाबा तुलसी की साधना का ही विस्तार मात्र है। राम भारतीय संस्कृति के वह केन्द्र है, जिस पर प्रकार की नोक टिकाकर जो भी वृत्त बनाया जाएगा, वह भारतीयता के परिधिमण्डल से कदापि बाहर नहीं जा सकेगा। इस वृत्त का क्षेत्रफल ज्यों-ज्यों बढ़ता जाएगा, त्यों-त्यों कथा के क्षुद्र पात्रों का आकार भी बढ़ता जाएगा।
मंथरा, सुलोचना, शबरी और केवट ही क्या सुषेण और आर्यसुमंत सरीखे पात्र भी विस्तार के साथ-साथ अधिक महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। जिन शत्रुघ्न को रामकथा में अधिक संवाद नहीं मिल सके हैं, उन शत्रुघ्न को भी यदि नये सिरे से किसी खण्डकाव्य, महाकाव्य अथवा गीत का नायक बनाकर सोचा जाए तो यह मौन पात्र भी अनवरत बोल सकता है। और जब कोई पात्र बोलता है तो वह कुछ भी बोल सकता है। वह मूलकथा के महानायक की भक्ति भी कर सकता है और उससे प्रश्न भी कर सकता है। नायक बनने के लिए किसी भी पात्र को दोनों ही तरफ़ अपना विस्तार करना होगा। यदि वह केवल भक्ति में संलग्न हो जाएगा तो भी उसका नायकत्व अधूरा रहेगा और यदि वह केवल आलोचना में रत हो जाएगा तो भी उसका व्यक्तित्व नायक बनने से चूक जाएगा।
साकेत की उर्मिला केवल करुणा की पात्र भर न होकर, स्त्री के धैर्य तथा सहिष्णुता की जीवन्त मूर्ति भी है। और उर्मिला की सहिष्णुता को शब्दों में अवतरित करने के लिए आवश्यक है कि मूलकथा के उन अंशों को रेखांकित किया जाए, जिसमें कुछ ‘सहन करने जैसा’ स्पष्ट हो सके। और जिसे सहन करना पड़े वह स्थिति कम से कम सुखद तो नहीं कही जा सकती। अब यदि कोई यह आरोप लेकर बैठ जावे कि साकेत में रघुकुल में घटित घटनाक्रम की आलोचना की गयी है… तो यह कवि के साथ बेईमानी होगी। यह सृजन की संभावनाओं पर कुठाराघात होगा।
जिसने रामकथा को अपनी लेखनी का आधार बनाया है, उसकी राम में आस्था कम से कम उनसे तो अधिक होगी, जो राम का उपयोग केवल किसी लौकिक प्रयोजन हेतु करने में रत हैं।
✍️ चिराग़ जैन

चिराग़ों के घर नहीं होते

सदा तो सँग तलक दर-ब-दर नहीं होते
कहा ये किसने चिराग़ों के घर नहीं होते

अभी असर न दिखा हो तो इंतज़ार करो
हैं ऐसे दांव भी जो बेअसर नहीं होते

ग़मों की धूप में नाज़ुक बदन मुफ़ीद नहीं
गुलों के जिस्म नरम, सूखकर नहीं होते

खुद अपना बोझ उठाने में कोई हर्ज़ नहीं
पराये पाँव बहुत मोतबर नहीं होते

✍️ चिराग़ जैन

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