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काँच

मैंने काँच से सीखा है कि दुनिया को सच दिखाने के लिए छोड़ना ही पड़ता है पारदर्शी स्वभाव ✍️ चिराग़...

बोनसाई

आदेशों का दास नहीं है शाखा का आकार कभी ले तक सीमित मत करना पौधे का संसार कभी जड़ के पाँव नहीं पसरे तो, छाँव कहाँ से पाओगे जिस पर पंछी घर कर लें वो ठाँव कहाँ से लाओगे बालकनी में बंध पाया क्या, बरगद का विस्तार कभी कोंपल, बूटे, कलियाँ, डाली; ये सब कुछ आबाद रहे तब ही आती...

बुनियादों की मज़बूती

धूप, कंगूरों की रंगत को चाट गई जब धीरे-धीरे तब बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई होठों पर ताले लटके थे, संवादों पर बर्फ़ जमी थी आखर-आखर आतंकित था, हर आहट सहमी-सहमी थी सबके अपने-अपने सुख थे, सबके अपने-अपने कमरे तब छोटी-सी एक मुसीबत, परिवारों के काम आ गई फिर...

दशरथ

ना तो किसी रोग से टूटा ना ही समरांगण में हारा जिस राजा का शौर्य अमर था उसको कोपभवन ने मारा उसकी देह धराशायी थी, जिसका नाम स्वयं दशरथ था तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था वाणी से विषबाण चलाकर, जीवन का अमरित ले बैठी जिसने हर रण जीता उसको इक रानी की जिद ले...

कट्टरता

कट्टरता और परिपक्वता में केवल ‘भी’ और ‘ही’ का अन्तर है। ✍️ चिराग़ जैन
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