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ज़ख़्म कौन धोएगा

भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा बम्बई ने जो धमाकों के ज़ख़्म खाए हैं भूखे बच्चे जो गोधरा में बिलबिलाए हैं मंदिरों में भी धमाकों की गूंज उठती हैं आज हिन्दोस्तां में अरथियाँ भी लुटती हैं किसी मासूम की जब आह सुनी जाती है तो ख़यालों में यही...

दुश्मनों के सर

काली अमावस का अंधेरा होम करने को, दीवाली के दीप सामधेनी बन जाएंगे पीड़ा वाली ज्वालाएँ जहाँ प्रचण्ड होंगी, वहाँ शांति-धार बरसाने प्रेम-घन जाएंगे बलिदान हुए यदि कहीं तेरे लाडले तो अरथी सजाने केसरी-सुमन जाएंगे पर यदि तलवार चली रणबाँकुरों की, शत्रुओं के शीश तेरी ही शरण...

चाहत

मैं मुहब्बत का सुगम-संगीत लिखना चाहता हूँ कंदरा संग पर्वतों की प्रीत लिखना चाहता हूँ उत्तरा का मूक-वैधव्य जकड़ लेता है मुझको जब कभी मैं पांडवों की जीत लिखना चाहता हूँ ✍️ चिराग़...
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