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गुलशन

मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है इस शरारत से भी...

ग्लोबल वार्मिंग

मेघों का जल घट रहा, सूरज उगले आग धरती धू-धू जल रही, मानव अब तो जाग तप्त धरा, बादल विफल, गया संतुलन डोल रे मानव अब तो संभल, अब तो ऑंखें खोल मानव अब क्यों हो गया, आखिर बिल्कुल मौन तूने ही छलनी करी, दिव्य परत ओज़ोन तितली, धुरवा, बीजुरी, पाला, सावन, कूप धीरे-धीरे धर रहे,...
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