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एलियन का यात्रा वृत्तांत

पृथ्वी पर बड़ी-बड़ी ज़मीनें हैं। जिन पर इंसानों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों को वे गाँव, क़स्बा, शहर, देश और दुनिया कहते हैं, जहाँ दो पैरों से चलनेवाले विचित्र प्राणियों के झुंड रहते हैं। झुंड का प्रत्येक सदस्य एक ऐसे झुंड में रहना चाहता है, जिसमें केवल उसकी बात मानी जाए और केवल उसकी सुविधाओं का ध्यान रखा जाए।
पृथ्वीवासी युगों-युगों से इन झुंडों में एक अदद इंसान तलाश रहे हैं। लेकिन आज तक किसी को कहीं कोई इंसान मिला ही नहीं, क्योंकि जब कोई पृथ्वीवासी ‘इंसान’ तलाशने निकलता है, तब केवल उतनी ही देर के लिए वह ख़ुद भी इंसान बन जाता है, और उस वक़्त के गुज़रते ही वह वापस अपने वर्चस्व वाला झुंड बनाने के लिए किसी झुंड में खो जाता है।
पृथ्वी के दो छोर हैं- उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। इन दोनों ध्रुवों पर प्रकृति ने जीवन जीने योग्य स्थितियाँ नहीं बनाईं, और बाक़ी पृथ्वी को इंसानों ने जीवन जीने लायक नहीं छोड़ा। प्रकृति ने नदियाँ बनाई थीं, लेकिन मनुष्य ने नदियों से जीवन लेते-लेते, नदियों का जीवन ले लिया। पर्यावरण की चिंता और ईश्वर का भय; ये दोनों ही प्रत्येक मनुष्य ने अपने अतिरिक्त सबके लिए आवश्यक बना रखे हैं। चूँकि मनुष्य की आँखें अपने गिरेबान में नहीं झाँक सकतीं, इसलिए एयरकंडीशन कमरे में बैठकर ग्लोबल वार्मिंग पर बात करने में कोई नैतिक संकट उत्पन्न नहीं होता।
हर झुंड के अपने कुछ नियम हैं, इन नियमों को बनाने का काम ‘सरकार’ का होता है। सरकार उन लोगों का समूह है जो अपनी बातों से ज़मीन पर रेंगते लोगों को आसमान के ख़्वाब दिखा सकें। सपने इतने सच्चे लगने चाहियें कि रेंगनेवालों को अपने कुचले जाने का पता न चल सके। सरकार बनाने के लिए हर झुंड में एक प्रतियोगिता होती है, जिसे ‘चुनाव’ कहते हैं। इस प्रतियोगिता में जो सबसे ज़्यादा झूठा, ढीठ, ढोंगी और बेशर्म साबित होता है उसे विजेता मान लिया जाता है। अपने कार्यकाल में जब ये विजेता लोग जनता को गिड़गिड़ाने और गाली देने तक विवश कर देते हैं तब अगली प्रतियोगिता में अन्य प्रतियोगियों के जीतने की संभावना बनती है। इससे प्रतियोगिता में रोचकता बनी रहती है। प्रतियोगिता के विजेता अन्य झुंडों के विजेताओं से मिलने-जुलने और लड़ने-भिड़ने में समय व्यतीत करते हैं। इन खर्चों को पूरा करने के लिए झुंड के बाक़ी लोग दिन-रात कठोर परिश्रम करके धन की व्यवस्था करते हैं। हर सरकार अपने झुंड के लोगों को बताती है कि उनके झुंड की दूसरे झुंडों के बीच इज़्ज़त बढ़ रही है। ऐसा सुनकर झुंड के लोग नाचने लगते हैं और सरकार के ख़र्चे उठाने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाते हैं।
पृथ्वी का मनुष्य भोजन-पानी के बिना जीवित रह सकता है, किन्तु दूसरों के जीवन में ताका-झाँकी किये बिना नहीं जी सकता। किसके जीवन में क्या चल रहा है, किसकी किससे दोस्ती है, किसकी किससे दुश्मनी है, कौन क्या खाकर सोया है, कौन भूखा सोया है… इस प्रकार के लाखों प्रश्न जीवनयापन का कच्चा माल हैं। मनुष्य बड़ी लगन से इन प्रश्नों को जन्म देता है, फिर दिन-रात श्रम करके इनके उत्तर या तो खोज लेता है, या फिर गढ़ लेता है। उत्तर मिलते ही उन्हें लेकर वह दूसरे मनुष्य को पहले मनुष्य की समस्या और अपनी ज्ञानवत्ता से अवगत कराता है। इस प्रक्रिया में जो चर्चा होती है, वही चर्चा मानव जीवन का परम सुख है। सुख के उन्माद में यह चर्चा धीरे-धीरे झूठ और चरित्र-हत्या के हथियारों का पुलिंदा बनकर उस मनुष्य तक पहुँच जाती है जिसके विषय में चर्चा की जा रही थी। अब वह मनुष्य सक्रिय होता है और चर्चा का पीछा करते हुए चर्चा के जनक को तलाशने लगता हैं। चर्चा आगे बढ़ती जाती है और उसका नायक उसके सूत्रों में उलझकर पीछे होने लगता है। अंततः एक दिन वह जनक को तलाश लेता है और फिर कहासुनी, तू-तू-मैं-मैं, गाली-गलौज, झगड़ा, हाथापाई, मारपीट, भिड़ंत, मुठभेड़ और युद्ध तक कुछ भी हो सकता है। इस घटना के अंत में भी विजेता को धर्मात्मा और पराजित को अधर्मी मान लिया जाता है। फिर इस घटना की चर्चा चलती है। फिर युद्ध, फिर चर्चा, फिर युद्ध…. बस इसी तरह यह संसार-चक्र चलता रहता है।

✍️ चिराग़ जैन

ऋतुराज आया है

बाग की सब क्यारियों के हाथ पीले हो गए हैं
फूल की हर पाँखुरी के ओंठ गीले हो गए हैं
श्वास में सरगम सजाता साज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

साँस में बहकी हवाओं का नशा सा घुल रहा है
प्रीति की बारिश हुई है, ज्ञान सारा धुल रहा है
पर्वतों को खुशबुओं ने प्यार से छू भर लिया है
वज्र सा अड़ियल हिमालय भी अभी हिल-डुल रहा है
ज्ञानियों के ज्ञान से मन बाज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

दल भ्रमर का बूटियों के पास मंडराने लगा है
कोयलों ने गीत गाए, आम बौराने लगा है
ठूठ से लिपटी हुई है एक दीवानी लता तो
बाग का वीरान कोना, बाग कहलाने लगा है
दम्भ होकर प्रेम का मोहताज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

गुनगुनी सी धूप के संग बेल-बूटों का प्रणय है
प्रेमियों को हर नियम के टूट जाने पर अभय है
ठंड से ठिठुरी धरा अंगड़ाइयां लेने लगी है
श्वेत छितरी बदलियों के बीच सूरज का उदय है
मोतियों के थाल में पुखराज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

✍️ चिराग़ जैन

स्वीकार

पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
अधखुली-सी इक कली धीरज गँवाकर
पुष्प से प्रतियोगिता पर अड़ गई है

पंखुरी दर पंखुरी खिलना उचित है
डाल ने दिन-रात समझाया कली को
गंध निश्चित ही बिखरनी है हवा में
कौन-सी जल्दी पड़ी है बावली को
होड़ तज कर गंध को सींचो हृदय में
जो बसी भीतर, वही बाहर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

जब तलक संघर्ष है, जीवन तभी तक
राह की कठिनाइयों का मान करना
घुल गया मकरंद जिसका भी हवा में
उस कुसुम के धैर्य का सम्मान करना
साधना पथ पर नहीं विचलित हुआ जो
ख्याति उस इंसान की घर-घर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

मंद बहकर ही नदी सरगम बनेगी
वेग तो तटबंध को ही तोड़ देगा
रूह को महकाएँगी मंथर हवाएँ
और अंधड़ देह को झकझोर देगा
जो नियति की चाल से आगे बढ़ी है
वह कली अल्पायु में ही झर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

ताप सहकर ही बनेगी वज्र, माटी
फिर भला दहती लपट से रूठना क्या
कर्म का अधिकार ही हमको मिला है
स्वप्न की फिर सर्जना क्या, टूटना क्या
हठ पकड़ बैठा कोई जब भी नियति से
भाग्य की त्यौरी उसी क्षण चढ़ गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

✍️ चिराग़ जैन

हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

हवा में
ज़हर घुलता जा रहा है।

वो सारी गंदगी
जो आग के ज़रिए
हवाओं में कहीं ग़ुम हो गई थी;
वही अब साँस के ज़रिए
हमारे फेफड़ों में जम रही है।
हमारी साँस की सरगम सुनाती धौंकनी से
अचानक आह की आवाज़ आने लग गई है।

कोई तो है
जो अपने साथ बीती ज़्यादती का
हमारी नस्ल से दिन-रात बदला ले रहा है।
कोई तो है
जो हमसे ही हमारी कौम को बर्बाद करने के लिए
बारूद-असला ले रहा है।

कोई तो है जिसे मालूम है
कमरे को ठंडा कर रहे
हर देवता का दूसरा चेहरा
बड़ा भभका उठाता है।
कोई तो है जिसे एहसास है
हर आँख में पलती
हर इक अय्याश हसरत की
कोई मजलूम ही क़ीमत चुकाता है।

हमारा ढोंग खुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

सुना है
पेड़ बादल को बुलाने के लिए
बाँहें उठाते थे।
सुना है प्यास से थक कर परिंदे
बारिशों की मिन्नतों के गीत गाते थे।
सुना है
सर्दियों में खेत कोहरे की रिजाई ओढ़ लेते थे।
सुना है
फूल गुलशन में टहलती तितलियों को
रोक लेने की सुबह से होड़ लेते थे।

सुना है
एक मुद्दत से किसी भी फूल से मिलने
कोई तितली नहीं आई।
सुना है
एक अरसे से
सिमटते जा रहे तालाब पर
बदली नहीं छाई।
सुना है
पूस की ठंडी ठिठुरती रात में भी
खेत नँगा सो रहा है।
सुना है कोयलें सब ग़ैर-हाज़िर हो चुकी हैं;
सुना है बांझ होते जा रहे फलदार पेड़ों की
पुराना बाग़ लाशें ढो रहा है।

सुना है
हर नदी नाराज़ हैं।
हवाएं रोज़ बेइज़्ज़त हुई हैं।
ज़मीं के ख़ूबसूरत जिस्म पर
तेज़ाब फेंका है हमारी हसरतों ने।
सुना है पेड़ अब इस बेअदब इंसान को
छाया नहीं देते।

जिन्हें हम पूजते थे देवता कहकर
बहुत बेफ़िक्र थे हम लोग जिस आगोश में रहकर
सुकूँ देता था जिनका साथ, जिनका संग
बहुत गहरा था जो इक दोस्ती का रंग

वो गहरा रंग धुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है

✍️ चिराग़ जैन

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