Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
सत्ता चाहे जिसकी भी हो, अहम् नहीं स्वीकार प्रजा को
कर्मकांड से कर्मयोग ने पल में लिया उबार प्रजा को
गोकुलवालो छोड़ो छलिया इंद्रदेव का पूजन करना
पर्वत ढोकर ही मिलता है, जीने का अधिकार प्रजा को
सत्ता की मनमानी का करना होगा प्रतिकार प्रजा को
चुप रहने से निर्भरता का होता व्याधि-विकार प्रजा को
श्रमजीवी भी दान-दया का पात्र बने तो युग कोसेगा
कर्म छोड़ कर कृपा निहारे तो सौ-सौ धिक्कार प्रजा को
✍️ चिराग़ जैन
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ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
जिस दीये के भाग्य में घी और बाती आ गई है
उस दीये को आज सारी रात भी जलना पड़ेगा
सत्य के तप की परीक्षा जब कभी प्रारब्ध लेगा
तब महाश्मशान तक प्रारब्ध ख़ुद भी जाएगा ही
सत्य तो हर इक चुनौती झेल ही लेगा नियति की
भाग्य लेकिन नित नया दुःख ढूंढ़कर तो लाएगा ही
जब किसी के वक्ष पर तू मूंग दलने जाएगा तो
ख़ुद तुझे ही मूंग अपने हाथ से दलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
प्रश्नचिह्नों ने स्वयं ही वक्रता का दंश झेला
उत्तरों ने पूर्णता पाई सरल रेखा बनाकर
जिस किसी की कीर्ति को विषपात्र सौंपा था समय ने
ग्लानि धोता फिर रहा उनकी अमर गाथा सुनाकर
जानकी तो अग्निपथ को पार कर लेगी सहज ही
किन्तु युग को उस अगन के ताप में जलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
राम का वनवास, सीता का विरह, उर्मिल के आँसू
तू अवध की देहरी पर और पीड़ा क्या रखेगा
सुत, पितामह, तात, अग्रज खो चुका कौन्तेय रण में
पाण्डवों के द्वार पर यम और क्रीड़ा क्या रचेगा
दूसरों को राह में काँटे बिछाने के लिए तो
ख़ुद तुझे भी कंटकों के रूप में ढलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सागर खारा, नदिया सूखी
ताल-तलैया में कीचड़ था
लेकिन प्यास नहीं बुझने का,
हर आरोप ओक ने झेला
पेट अन्न को तरस रहा था
और शिरा में रक्त नहीं था
प्रेम व्यस्त था, प्रीत त्रस्त थी
आलिंगन का वक़्त नहीं था
चिंताओं की धूप धरा की उर्वरता को सोख चुकी थी
पर फिर भी बंध्या जीवन का, सारा दंश कोख़ ने झेला
मुस्कानों में आडम्बर थे
उत्सव थे कोरी मजबूरी
हवन बिना मन के होते थे
और अर्चना रही अधूरी
श्रम ने भाग्य भरोसे रहकर, कोशिश का अपमान किया था
लेकिन फिर भी अपशकुनों का, सारा दोष शोक ने झेला
इन्द्रासन, त्रैलोक्य, अमरता
शस्त्रों का संधान दे दिया
मंशा की अनदेखी करके
सबको ही वरदान दे दिया
निशदिन कठिन साधना करके, असुरों ने वरदान जुटाए
फिर इन सारे वरदानों का, हर अभिशाप लोक ने झेला
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
इससे वो ही बच पाया, जो औरों को मरवाए
न्याय भवन में जनहित का इक ढोंग चलाया जाता है
ऊँची-ऊँची बातें करके पास बुलाया जाता है
फिर धोखे से इस चौसर के पासे बदले जाते हैं
इस दलदल में धर्मराज तक अपराधी बन जाते हैं
सिंहासन तन-मन से अंधा, वीर पड़े मुँह बाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
न्याय, मूर्ति बनकर बैठा है, षड्यंत्रों का मेला है
नियमों का इक चक्रव्यूह है, जिसमें सत्य अकेला है
आरोपी पर धाराओं के शस्त्र चलाए जाते हैं
नियमों का खिलवाड़ बनाकर वीर गिराए जाते हैं
सच के साथी प्रथम द्वार तक, पार नहीं कर पाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
वो जिसने आरोप लगाया, उससे प्रश्न करेगा कौन
ढोंग किसी का, क्षोभ किसी का, लेकिन मोल भरेगा कौन
राजभवन के जयकारों की क़ीमत कौन चुकाता है
सत्ता का अन्याय जगत् में मर्यादा कहलाता है
सच ख़ुद को साबित करता है, झूठ खड़ा इतराए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
युग बदला, हालात वही हैं
निर्बल पर आघात वही हैं
चेहरा बदला है चौसर ने
लेकिन शह और मात वही हैं
लगता है फिर महासमर से, बस थोड़ी ही दूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
फिर कुंती मजबूर हुई हैं, फिर कचरे में कर्ण मिले हैं
फिर पांचाली चीररहित है, फिर कुनबे के होंठ सिले हैं
महलों की फिर गोद भरे जो, क्षमता सिर्फ़ नियोगी की है
सत्ता या तो अंधे की है या नाकारा रोगी की है
हर शासन पाखण्डी निकला
न्यायालय भी मंडी निकला
अम्बा को वरदान मिला तो
उसका रूप शिखण्डी निकला
सब प्रतिशोधों से प्रेरित हैं, सबकी साध अधूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
गुरुकुल शिक्षा की रेवड़ियां, जाति देख कर बाँट रहे हैं
प्रतिभा का अपमान हुआ है, द्रोण अंगूठे काट रहे हैं
गुरुता स्वार्थ टटोल रही है, करुणा का पथ छोड़ चुकी है
रंगभूमि सारे नियमों को अपने हित में मोड़ चुकी है
आश्रम सभी अशुद्ध हुए हैं
विद्या पथ अवरुद्ध हुए हैं
परशुराम इक सूतपुत्र की
क्षमता लखकर क्रुद्ध हुए हैं
चिड़िया की हत्या कर देना, अर्जुन की मजबूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
कुंती पर भी प्रश्न उठाओ, बिन ब्याहे आह्वान किया क्यों
भीष्म पितामह से भी पूछो, अनुचित का सम्मान किया क्यों
क्यों दुःशासन ही दोषी हों, क्यों दुर्योधन ही दंडित हों
जो प्रतिकार नहीं कर पाए, वो क्योंकर महिमामंडित हों
हर इक सभा-समिति बदल दो
प्रतिशोधों की नीति बदल दो
अम्बा, भीष्म सुरक्षित होंगे
स्वयंवरों की रीति बदल दो
यह परिवर्तन कर देने को, हर मन की मंज़ूरी है अब
सच मानो, सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
✍️ चिराग़ जैन