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भोर से ठीक पहले

रेत, अंतिम बून्द भी यदि सोख ले अपनी नदी की साफ़ मतलब है पहाड़ों की बरफ़ अब गल चुकी है रात का अंधियार जब अपने चरम पर आ गया हो तब समझना, सूर्य की पहली किरण अब चल चुकी है त्यौरियों के बोझ से भौंहें भले दुखने लगी हों होंठ की बस एक हरक़त से हवा हो जाएंगी ये ये निराशा, ये...

उलाहना

मैं अंधेरों के नगर में दीप धरने जा रहा हूँ तुम उजालों की प्रतीक्षा में समय व्यतीत करना मैं पसीने से नदी का पाट भरने जा रहा हूँ तुम किसी बरसात की मनुहार का संगीत गढ़ना कर्मरत अर्जुन हुआ तो कृष्ण उसके सारथी थे देवता जीवन बदल सकते नहीं केवल भजन से आ गई चलकर अकेली जो गहन...

हर सम्भव के साधन हैं

सपनों की आँखें पथराईं हिम्मत की पाँखें कुम्हलाईं संघर्षों की तेज पवन ने प्राणों की शाखें दहलाईं इन सारे झंझावातों से लोहा लिया ज़मीर ने अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने राजतिलक की शुभ वेला में राघव को वनवास मिला स्वर्ण जड़ित आभूषण उतरे, जंगल का संत्रास मिला...
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