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आत्मबल का अवलम्बन

जो कुछ इस समय घट रहा है, उसकी भरपाई कभी न हो सकेगी। मृत्यु ने समूची मानवजाति को दहला दिया है। मानव बस्तियों में अजीब-सा अमंगल छा गया है। सब मन ही मन अपने-अपने अपनों की गिनती करके इस संख्या के यथावत बने रहने की दुआ मांग रहे हैं।
सब ऊपर ही ऊपर यह जता रहे हैं कि हमें कुछ नहीं होगा, लेकिन सब भीतर ही भीतर यह जान रहे हैं कि किसी को भी कुछ भी हो सकता है। काल इतना क्रूर हो गया है कि किसी के लिए भी जीवन बचाने से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं रह गया है।
हमने ऐसी-ऐसी दुर्भिक्ष के विषय में पढ़ा है कि गाँव के गाँव ख़ाली हो गये थे। मसान छोटे पड़ गये थे। लोगों ने खेत-खलिहान और यहाँ तक कि आंगन में ही चिताएँ जलानी शुरू कर दी थीं। इन स्थितियों के विषय में जब पढ़ते थे तो लगता था कि अब ऐसा नहीं होगा। अब समाज बहुत विकसित हो गया है। अब हम साधन-सम्पन्न हैं। किन्तु कोरोना के इस प्रकोप ने यह सिद्ध कर दिया कि स्थिति जस की तस है।
मनुष्यता का ऐसा ह्रास शायद ही कभी हुआ हो कि लोगों की अन्तिम यात्रा तक में चार कंधे पूरे नहीं हो पा रहे। पूरे माहौल पर मसान का सन्नाटा छा रहा है। इस सूनामी से स्वयं को बचाए रखने के लिये मनोबल बनाए रखना बेहद ज़रूरी हो गया है।
मैं स्वयं को यह कह-कहकर ऊर्जा और सकारात्मकता से सींच रहा हूँ कि ‘समाज पर इतना बड़ा संकट आया है, ऐसे में बीमार पड़ने की फ़ुरसत ही कहाँ है!’ यह टोटका काम कर रहा है। यह विचार डूबते हुए मन को सम्बल प्रदान करता है। जिस किसी के विषय में थोड़ा भी पता चलता है, उसकी कुशल-क्षेम जानने की क़वायद, और जहाँ तक सम्भव हो उस तक सहायता पहुँचाने की इच्छाशक्ति मेरे तन में व्याप्त रोग को सिर उठाने की मोहलत नहीं दे रही है।
समय का यह टुकड़ा एक तूफ़ान जैसा है। इसके गुज़रने से होनेवाली तबाही को रोकना लगभग असंभव है, किंतु इसकी दिशा देखकर, इसकी चपेट में आनेवालों को अपनत्व का मानसिक अवलम्बन थमाकर नुक़सान और पीड़ा को कम तो किया ही जा सकता है।

✍️ चिराग़ जैन

एक ज़रा-सा झोंका

एक ज़रा-सा झोंका आया
नैया ने खाये हिचकोले
जिन लहरों पर तैर रही थी
उन लहरों पर डगमग डोले
बस इतने भर से इस पल में हम पूरे मुस्तैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये

बदले-वदले भूल चुके हैं, सपने-वपने याद न आए
जैसे भी हो इन लहरों से नैया पार लगा ली जाए
जिनको हल करना है इस पल
कब वो प्रश्न बहुत गहरे हैं
इक नदिया है, इक नैया है
इक हम हैं और कुछ लहरें हैं
इस क्षण कहीं और देखा तो समझो हम नापैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये

जितनी जटिल समस्या होगी, उतना बड़ा सबक लाएगी
सुख में तो कुछ तिनके डाली पर कोयल भी रख आएगी
लेकिन जब आंधी आएगी
जब डाली से बौर झड़ेगा
तब अपने जीवन की रक्षा
पेड़ आम का स्वयं करेगा
वो क्या सोचे सावन-भादो, जिसके दूभर चैत हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये
✍️ चिराग़ जैन

होली

बेतरतीबी से लगाया जाये
तो गुलाबी रंग से भी आदमी पागल हो जाता है
और सलीके से लगाया जाये
तो काला रंग भी काजल हो जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

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