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प्रतिशोध का दंश

प्रतिशोध एक अंतहीन प्रक्रिया है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, खानदान, राजनीति, विचारधारा, देश, समाज… इन सबका सौंदर्य और सुख प्रतिशोध की इस महाज्वाला में भस्म हुआ जाता है। देवासुर संग्राम से लेकर रामायण, महाभारत और चाणक्य ही नहीं, वरन प्रत्येक संस्कृति और समाज के पास...

दूसरा आयाम

जो प्रतीक्षा आँख में शबरी बसाए जी रही है वह प्रतीक्षा राम के भी पाँव में निश्चित मिलेगी धूप जैसी जिस विकलता को सुदामा ने जिया है वह विकलता द्वारिका की छाँव में निश्चित मिलेगी जो महल तक आ गयी होगी युगों का न्याय लेने वह किसी वन में सिसकती इक शिला की आह होगी जो युगों...

समय का बारदाना

जब समय फंदा कसेगा भूमि में पहिया धँसेगा शाप सब पिछले डसेंगे पार्थ नैतिकता तजेंगे उस घड़ी तक जूझने का भ्रम निभाना है सब समय का बारदाना है नीतियों का ढोंग करतीं, सब सभाएँ मौन होंगी न्याय की बातें बनातीं मन्त्रणाएँ मौन होंगी जब प्रणय को भूलकर राघव निरे राजा बनेंगे तब सिया...

आशाओं पर आघात

पतझर का आना निश्चित था पत्ते झर जाना निश्चित था हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला...

वृंदावन की याद

दुनिया का सारा वैभव है राजमहल की सुविधाओं में फिर भी कान्हा को रह-रह कर वृंदावन की याद आती है सोने-चांदी में भरकर जब इत्र बरसता है राहों में मन को गोकुल के सीधे-सादे सावन की याद आती है जब राजा के सैनिक घर से सारा माखन ले जाते थे हम पानी के साथ चने खाकर तकते ही रह जाते...
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