Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
हर रात
मैं बुनता था इक ख़्वाब
और फिर
उसको अधूरा छोड़
चुपचाप सो जाता था
कि कभी तुम्हारे साथ
साकार करूंगा
ख़्वाब में उभरा
ये ख़ूबसूरत लम्हा…
एक-एक करके
जाने कितने ही सपने
इकट्ठे हो गए
मेरे तकिए के नीचे।
आज जब सोने लगा मैं
बिना संजोए कोई ख़्वाब
तो अचानक
मेरे सामने खड़े हो गए
सैंकड़ों अधूरे ख़्वाब
तकिए के नीचे से निकलकर।
सबकी भंगिमा में मौजूद था
एक ही प्रश्न-
“अब हमारा क्या होगा?”
मैंने कहा-
“काश ये निर्णय
मेरे वश में होता!”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बहुत उपजाऊ है
मेरे दिल की मिट्टी।
पनप जाता है
हर बीज
आसानी से।
बहुत आसानी से
फूट पड़ता है अंकुर,
बहुत आसानी से
द्विदल होता है बीज,
…लाल-लाल कोंपलें
……ताज़ा हरापन।
कभी ओस नहाई पत्तियाँ
तो कभी
गुपचुप बतियाती
डालियाँ।
कुछ पौधों पर
आ जाता है
बौर भी…
…लेकिन किसी डाल ने
कभी नहीं किया
फल का शृंगार…!
…शायद
कोई टोटका कर देता है
मेरी हरियाली पर!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
कोई इन्सान दिल के हाथ जब लाचार होता है
तो उसकी ज़िन्दगी का रास्ता दुश्वार होता है
मुहब्बत की कहानी में फ़क़त चेहरे बदलते हैं
वही किस्सा, वही इक वाक़या हर बार होता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
बस यूं कहिए ध्यान नहीं था
वरना, मैं नादान नहीं था
उससे पहले ख़ुद को गिनना
ये इतना आसान नहीं था
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बहुत समझदार हो तुम
जब कभी
उदासी का आँचल ओढ़कर
जवान होने लगता है
मेरा कोई दर्द
तो चुपचाप
बिना किसी शोर-शराबे के
‘कंधा देकर’
पहुँचा आते हो उसे वहाँ
…जहाँ से
लौट नहीं पाया कोई
आज तक।
✍️ चिराग़ जैन