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मानव की तस्वीर

पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है ✍️ चिराग़...

दीपावली

अमावस के आकाश में रौशनी का खेल माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई और आग में जलती देश की कमाई मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश? क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन...

स्वार्थ

तीर कोरे स्वार्थ के जब तरकशों से जुड़ गए बाम पर बैठे कबूतर फड़फड़ाकर उड़ गए स्वार्थ शामिल हो गया जब से हमारी सोच में पग हमारे ख़ुद-ब-ख़ुद राहे-गुनाह पर मुड़ गए ✍️ चिराग़...

आदमीयत का अंदाज़ा

हम मुहब्बत का अंदाज़ा करेंगे वो हिमाक़त का अंदाज़ा करेंगे जब तलक दूरियाँ न हों शामिल कैसे चाहत का अंदाज़ा करेंगे आदमी को समझ न पाए जो क्या वो क़ुदरत का अंदाज़ा करेंगे दौरे-ग़म में कहे कोई कुछ भी सब नसीहत का अंदाज़ा करेंगे आदमी ज़िब्ह करने वाले ही आदमीयत का अंदाज़ा करेंगे ख़ुद ही...

चाहत

मैं मुहब्बत का सुगम-संगीत लिखना चाहता हूँ कंदरा संग पर्वतों की प्रीत लिखना चाहता हूँ उत्तरा का मूक-वैधव्य जकड़ लेता है मुझको जब कभी मैं पांडवों की जीत लिखना चाहता हूँ ✍️ चिराग़...
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