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आदमी मायूस होता है

हवस की राह चलकर आदमी मायूस होता है सदा आपे से बाहर आदमी मायूस होता है कभी मायूस होकर आदमी खोता है उम्मीदें कभी उम्मीद खोकर आदमी मायूस होता है न हो उम्मीद तो मायूसियाँ छू भी नहीं सकतीं हमेशा आरज़ू कर आदमी मायूस होता है हज़ारों ख्वाब बेशक़ बन्द ऑंखों में पलें लेकिन पलक...

उम्मीद

उम्मीद टूट जाये तो पीड़ा …संत्रास! और बंधी रहे तो टूट जाने की आशंका। ✍️ चिराग़...

अपना-अपना शऊर था

सरे-बज़्म मैं रुसवा हुआ, यही दौर का दस्तूर था मैं ये बाज़ियाँ न समझ सका, मिरी सादगी का क़ुसूर था तूने ग़म में ख़ुशियाँ तबाह कीं, मैंने हँस के दर्द भुला दिये ये तो अपना-अपना रिवाज़ था, ये तो अपना-अपना शऊर था तुझे जिस्म से ही गरज़ रही, मिरा जिस्म तेरी हदों में था मिरी रूह...

जीत की चाहत

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश...

आस अभी बाक़ी है

हूक सीने के आस-पास अभी बाक़ी है उनके आने की कोई आस अभी बाक़ी है शामो-शब सहरो-सुबह देख चुका हूँ लेकिन और कुछ देखने की प्यास अभी बाक़ी है ✍️ चिराग़...
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