Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
प्रेम चलकर आएगा जब तक प्रतीक्षा की गली में
तब तलक संसार भर में प्रीति जीवित रह सकेगी
है समर्पण जब तलक तैयार सब कुछ हारने को
उस घड़ी तक भावना की जीत जीवित रह सकेगी
जब तलक बदली स्वयं बेचैन होकर झर न जाए
तब तलक चातक उसे तकता रहेगा प्यास लेकर
बदलियों की शुष्क लापरवाहियों को क्या पता है
कण्ठ में अटके हुए हैं प्राण इक विश्वास लेकर
मृत्यु से पहले बरस जाओ, पिघल जाओ अगर तुम
तो प्रणयगत साधना की रीति जीवित रह सकेगी
उम्र काटी है शिला ने भी यही विश्वास रखकर
एक दिन मझमें विधाता प्राण भर देंगे परस कर
बेर चख-चख कर कोई शबरी प्रतीक्षारत रही है
इस अभागे प्रेम को स्वीकार लेंगे राम हँसकर
चेतना में प्रीत के अमरत्व का उल्लास भर दो
देह भी हर नियति के विपरीत जीवित रह सकेगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
ताल की आँखें सजल हैं
गन्ध की पाँखें विकल हैं
पेड़ पत्थर से हुए हैं
ख़्वाब नश्तर ने छुए हैं
पर अभी भी आस का दामन नहीं छूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा
मुस्कुराहट पर बनावट का असर दिखने लगा है
हर क़दम पर अब कोई अनजान डर दिखने लगा है
नित नए अनुभव हमारी आस को खलने लगे हैं
रेत पर कुछ भ्रम हमारी प्यास को छलने लगे हैं
कष्ट बढ़ते जा रहे हैं
प्रश्न चढ़ते आ रहे हैं
आँख से आराम का सपना नहीं रूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा
आँख के आगे कोई घेरा घनेरा छा गया है
है निपट एकांत, साये पर अंधेरा छा गया है
हर उजाला लुट चुका है, हर सहारा लुट चुका है
जो दिशा का ज्ञान देता वो सितारा लुट चुका है
आह का स्वर घुँट गया है
चाह का घर लुट गया है
हौसले का वक़्त ने झोला नहीं लूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा
इस प्रतीक्षा के परे फिर से अहल्या श्वास लेगी
और शबरी के चखे हर बेर की क़िस्मत जगेगी
जानकी के पास सागर लांघ आएगी अंगूठी
भोर से पहले उठा ले आएंगे हनुमान बूटी
कष्ट जब हद से बढ़ेगा
देव को आना पड़ेगा
ये अटल विश्वास हो सकता नहीं झूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
पतझर का आना निश्चित था
पत्ते झर जाना निश्चित था
हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव
भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव
एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला षड्यंत्रों से
आस रही होगी उसको भी, माधव के अभिनव तंत्रों से
उसका घिर जाना निश्चित था
भू पर गिर जाना निश्चित था
पर उस दिन जो वीर मरा है, उम्मीदों के साथ मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
जिस रानी ने जर्जर रथ की कील बना दी अपनी उंगली
दशरथ के रथ के पहिये के बीच फँसा दी अपनी उंगली
अंतर कभी नहीं रखती हो जो सौतन की संतानों में
ऐसी रानी रूठ गई तो क्या मांगेगी वरदानों में
राघव को वनवास; असंभव
रघुकुल को संत्रास; असंभव
पहले यह विश्वास मरा है, दशरथ उसके बाद मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
जिसको तुम नाकामी कहकर थककर बैठ गए हो ना
उससे केवल चार क़दम पर मंज़िल का दरवाज़ा है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
हर सन्नाटा मुखरित होगा, जब मैं स्वर लेकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
थक कर टूट नहीं सकता हूँ, मुझको श्रम का अर्थ पता है
बढ़ने की इच्छा कर देगी, हर मुश्क़िल को व्यर्थ पता है
मेरे हाथों की रेखाओं में इतनी कठिनाई क्यों है
निश्चित मानो, भाग्य विधाता को मेरा सामर्थ पता है
पीड़ा को उत्सव कर लूँगा, आँसू को गाकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
मेरे मग में संघर्षों के ठौर न आएँ; नामुम्किन है
अपना बनकर ठगने वाले और न आएँ; नामुम्किन है
फिर भी हर पतझर को पानी देता हूँ, विश्वास मुझे है
फाग उड़े और अमराई पर बौर न आए; नामुम्किन है
हर आँधी से जूझ रहा हूँ, हर सावन जीकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
जो औरों पर लद जाता हो, मैं ऐसा क़िरदार नहीं हूँ
अपमानित होकर मुस्काऊँ, इतना भी लाचार नहीं हूँ
जितने डग नापूंगा, उतनी धरती मेरे नाम रहेगी
अपने पैरों पर चलता हूँ, बैसाखी पर भार नहीं हूँ
जितना पहुँचूँगा अपने ही पैरों पर चलकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
✍️ चिराग़ जैन