सामान्यीकरण
एक दवाई अलग-अलग शरीर पर अलग-अलग प्रभाव डालती है। एक ही परिस्थिति में दो अलग-अलग मनुष्य अलग-अलग व्यवहार कर सकते हैं। एक ही मनुष्य किसी एक बिन्दु पर नैतिक और दूसरे बिंदु पर अनैतिक हो सकता है।
इतनी सामान्य सी बात हम समझना क्यों नहीं चाहते? इतनी साधारण सी बात को समझने में हमें कठिनाई क्यों होती है?
एक लड़की ने हनीमून पर अपने पति की हत्या कर दी। यह एक घटना है। इसके झरोखे से प्रत्येक नवविवाहिता का आकलन करना उचित नहीं है। ठीक इसी प्रकार एक परिवार ने दहेज के लोभ में अपनी वधू की हत्या कर दी; इस घटना को साक्ष्य मानकर सभी ससुरालवालों को खलनायक मान लेने का अपराध हम कर चुके हैं।
दहेज हत्या सामाजिक बुराई अवश्य थी, किंतु यह समाज की प्रवृत्ति नहीं थी। ऐसी दुर्घटनाओं की बेतहाशा चर्चा और इन चर्चाओं से समाज में उत्पन्न घृणा ने संबंधों की चूल हिला डाली। सिनेमा ने लगातार ‘बेचारी बहुओं’ का ऐसा चित्रण किया कि सास, ननद और जेठानी जैसे रिश्ते अपमानित होकर रह गए।
जिस वधू को विश्वास और आश्वस्ति के साथ ससुराल आना था, वह संशय और भय के साथ बाबुल का घर छोड़ने की अभ्यस्त हो गई। इस संशय का परिणाम यह हुआ कि ससुराल की राई जैसी खटपट को भी बहू ने पर्वत जैसा संकट समझ लिया। नकारात्मकता की छोटी सी चिंगारी भी ज्वालामुखी दिखने लगी।
इस स्थिति में जो कलह घटित हुईं, उनके परिणामस्वरूप दहेज विरोधी कानून बना दिए गए। घरेलू हिंसा अधिनियम बन गया। अब बहू के हाथ मजबूत हो गए और ससुरालवालों के मन में संशय बैठ गया। इन कानूनों ने बीमारी का इलाज नहीं किया, बल्कि संशय को स्थानांतरित कर दिया।
तब हमने सभी बहुओं को ‘बेचारी’ मानकर वैवाहिक संस्था को ध्वस्त किया था और अब हम मेरठ से मेघालय तक कि घटनाओं का हवाला देकर सभी बहुओं को ‘क्रूर’ मानकर उसी भूल की पुनरावृत्ति कर रहे हैं।
जिसने पति की हत्या कर दी, वह एक महिला अपराधी है। इससे सभी महिलाओं को अपराधी नहीं माना जा सकता। जिसने पति को धोखा दिया, वह एक लड़की चरित्रहीन है। उसका उदाहरण देकर सभी ल़डकियों को चरित्रहीन नहीं माना जा सकता।
सामान्यीकरण की इस बीमारी ने समाज के सौहार्द को आघात पहुँचाया है। सोशल मीडिया के दौर में यह बीमारी अधिक व्यापक हो चली है।
एक भाजपा नेता का वीडियो वायरल हुआ और हम सभी भाजपाइयों को अश्लील मानने लगे। एक कांग्रेसी के चरित्र से पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं परखा जा सकता। एक भारतीय पूरे भारतवर्ष का उदाहरण नहीं हो सकता। एक स्त्री पूरी स्त्री जाति नहीं है।
डॉक्टरों को भगवान बनाकर हमने इसी सामान्यीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। फिर मानव अंगों के व्यापार में शामिल डॉक्टरों को उदाहरण मानकर, सभी डाक्टर्स को दैत्य मानना भी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।
एक आध्यात्मिक व्यक्ति के कदाचार से सभी संतों के चरित्र को घिनौना मानना अपराध है। एक साधु के रावण निकलने पर राम ने सभी साधुओं को रावण नहीं मान लिया था।
सामान्यीकरण समाज के विवेक का हत्यारा है। इससे अपने समाज को, अपनी विधायिका को, अपनी न्यायपालिका को और अपने परिवारों को बचाना हम सबका कर्त्तव्य है।
✍️ चिराग़ जैन
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी
संपन्नता से वे ऑफ लिविंग बदल सकता है, लेकिन वे ऑफ थिंकिंग पर संपन्नता का कोई असर नहीं होता। झुग्गी बस्ती में पानी का टैंकर आने पर जिस तरह की झड़प होती है ठीक वैसी ही तू-तू-मैं-मैं एयरपोर्ट पर सिक्युरिटी चेक करते समय भी ख़ूब होती है। अन्तर बस इतना है कि फेंकने की सिचुएशन आने पर पानी की बाल्टी, सेमसोनाइट की अटैची से रिप्लेस हो जाती है और माँ-बहन की भद्दी गालियां अपने अंग्रेजी अनुवाद का अवतार ले लेती हैं।
पढ़ी-लिखी महिलाएं झुग्गी वाली महिलाओं की तरह एक-दूसरे के बाल पकड़कर खींचने की बजाय बात को इतना लंबा खींच देती हैं कि सामने वाला ख़ुद अपने बाल नोच लेता है।
कस्बाई शामें देसी दारू की महक से प्रारम्भ होकर मारपीट और गाली-गलौज पर संपन्न होती हैं, जबकि होटलों की शामें दिखावटी आलिंगनों से प्रारंभ होकर गाली-गलौज पर संपन्न हो जाती हैं। हाई-क्लास लोग मारपीट और हाथापाई नहीं करते, क्योंकि इस काम को करने के लिए अपना निजी शरीर प्रयोग करना पड़ता है।
पीवीआर सिनेमा की लाइन में भी लोग उसी सोच से बीच में घुसने का प्रयास करते हैं जिस चतुराई से वे मिट्टी के तेल की लाइन में चुपचाप घुसने की कोशिश करते थे। लाइन तोड़कर बीच में घुसने की जो दक्षता हम भारतीयों में है, उसका विश्व में कोई सानी नहीं है। लेकिन इसका यह बिल्कुल अर्थ नहीं है कि हर कोई ऐरा-गैरा हमारे रहते बीच में घुस जाएगा। इसका सीधा फार्मूला है, जो हमसे ज़्यादा ढीठ होगा, वही हमसे जीत पाएगा। इसीलिए सिविक सेंस, रोड सेंस और यहाँ तक कि कॉमन सेंस को भी कभी अपने बीच में जगह नहीं बनाने दी।
एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चैक की लाइन हो तो भी हम चेहरे पर फ्लाइट छूटने की चिंता का ऐसा शानदार अभिनय पोत लेते हैं कि क्रूर से क्रूर आदमी को भी पीछे हटना पड़ेगा। ये और बात है कि अंदर वही बेचारा जब विंडो शॉपिंग पर टाइम पास करता दिखता है तो उसकी आँखों में बेशर्मी तैर रही होती है।
वाहनों का इंश्योरेंस होने के बाद भी दो गाड़ीवाले सड़क पर उसी तरह से नुक़सान की भरपाई के नाम पर पैसे वसूलने की भरसक कोशिश करते हैं, जैसे किसी ऑटोरिक्शा से टच हो जाने पर साइकिलवाला अपने पैर की हड्डी टूटने की घोषणा करके लँगड़ाने लगता है।
हम दरअस्ल दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि हम बदतमीजी करते वक़्त ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब, शहरी-ग्रामीण जैसे भेदभाव नहीं करते। हम अपने मूल संस्कारों को भूलकर कोई वैभव नहीं भोग सकते। इसीलिए हमारे भूखे-नंगे से लेकर करोड़पतियों तक बकी जानेवाली गालियों में रत्तीभर फर्क़ नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
स्वावलंबी प्रकृति
हम तब तक किसी काम को टालने का प्रयास करते हैं, जब तक उस कार्य को करना अपरिहार्य न हो जाए। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। काम को टालने के हमारे पास अनगिनत उपाय हैं। और उचित अवसर की प्रतीक्षा, कार्य को टालने का सर्वाधिक प्रयुक्त बहाना है।
उर्दू और भारत
अगर भाषाओं से धर्म की पहचान होती तो हिन्दी के पास रसखान और रहीम नहीं होते तथा उर्दू के पास फ़िराक़ और गुलज़ार नहीं होते।
राजनीति को मुर्गे लड़ाने का चस्का हो, तो वह कहीं और जाए, भाषाएँ तो आश्रमों की संतति होती हैं।
रामप्रसाद बिस्मिल और भगतसिंह की भाषा को पराया मानने की प्रवृत्ति हमें संस्कृति ही नहीं, अपितु शहीदों के अपमान की भी आदत डाल देगी।
जिनकी लेखनी पर हिन्दी का साहित्य अभिमान कर सकता है उन मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं के ‘गबन’, ‘क़फ़न’ तथा ‘ईदगाह’ जैसे शीर्षक आपकी घृणा से मिटाए नहीं जा सकेंगे।
संस्कृति और लोगों के दिलों से उर्दू को ग़ायब करने का सपना देखने वालों को पहले न्यायपालिका से उर्दू की शब्दावली हटाने का प्रयास करना होगा। और न्यायपालिका भी छोड़िए साहिब, अपनी ख़ुद की बोलचाल से जिस दिन उर्दू को ग़ायब कर दो, उस दिन उर्दू के मुँह पर कालिख पोतने का दुस्साहस करना।
आप घृणा उलीचकर एकाध क्यारी ध्वस्त कर सकते हो लेकिन भाषाई सौहार्द के बगीचे को ध्वंस नहीं कर सकते। क्योंकि उर्दू ‘हिन्दी’ के नाम में सुरक्षित है। आपकी कड़वाहट उर्दू की मिठास पर कभी हावी नहीं हो सकेगी, क्योंकि उर्दू हमारे थानों में संरक्षित है, उर्दू हमारी अदालतों में सुरक्षित है। आप उर्दू का नाम नहीं मिटा पाएंगे, क्योंकि उर्दू वीर शिरोमणि सिख गुरुओं के नाम में है। आप कभी भी उर्दू को हमारे देश से दूर नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उर्दू के बाबा ‘शेख फ़रीद’ की कविताओं को हमने ‘सबद’ कहकर गाया है।
उर्दू को पराया कहना ठीक ऐसा ही है ज्यों कोई अपने घर में जन्मी बिटिया को ‘पराया’ कहकर तिरस्कृत करे। उर्दू को मिटाना है तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस से ‘जय हिंद’ का उद्घोष छीनकर दिखाओ। उर्दू से घृणा करनी है तो ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ जैसे तरानों से घृणा करो। उर्दू को उखाड़ना है तो क्रांतिकारियों के दिलों में बसे ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ के नारे को उखाड़ने की कोशिश करो। उर्दू को मिटाना है तो चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से ‘आज़ाद’ उपनाम को मिटाने का जतन करो।
छोड़िए साहिब, राजनीति चंद वोटों के लिए घृणा का तेज़ाब छिड़कने से नहीं रुकेगी और ये देश हमें सिखाता रहेगा कि राम ने रावण की लंका में रहनेवाले विभीषण से भी परहेज नहीं किया। लंका के वैद्य से अपने भाई का इलाज करवाने में भी संदेह नहीं किया। लंका की ओर से लड़नेवाले इन्द्रजीत तक के शव का अपमान नहीं होने दिया। यह राम का देश है साहिब, यहाँ जूठे बेर भी सानन्द ग्रहण किये जाते हैं, यहाँ घृणा का कारवां बहुत दूर तक नहीं चल सकता।
✍️ चिराग़ जैन
भीड़ हैं हम
हमने ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसने हमें ‘भीड़’ से ‘जनता’ बनाना चाहा। हमें भीड़ बने रहना पसंद है। हम भीड़ बनकर जीते हैं और भीड़ बनकर मर भी जाते हैं। इसीलिए हमारे अख़बारों की सुखिऱ्याँ हमारा नाम नहीं जानतीं। कभी यात्री, कभी श्रद्धालु, कभी किसान, कभी तीर्थयात्री, कभी विद्यार्थी, कभी मज़दूर, कभी आदिवासी और कभी पुलिसवाले बनकर हम मर जाते हैं; हमारा कोई नाम नहीं होता। हमें एक ‘भीड़’ के नाम से जाना जाता है।
अपराधियों के नाम होते हैं, लेकिन निरपराध का कोई नाम नहीं होता। अपराध तो छोड़िए साहब, हम शहर में गाड़ी लेकर निकलते हैं, कहीं किसी कारणवश गाड़ी सड़क के किनारे रोकते हैं तो पुलिसवाला हमें भीड़ की तरह यह कहकर खदेड़ देता है, ‘यहाँ गाड़ी खड़ी करना मना है’। हम पूछते हैं, ‘तो फिर कहाँ खड़ी करें?’
इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं होता। वह डाँट देता है, ‘यहाँ से आगे ले बे!’ हम आगे ले लेते हैं।
हमारे तंत्र ने जिन देशों की सड़कों के किनारे से ‘नो पार्किंग’ का डिज़ाइन टीपा है, उन देशों से हम व्यवस्थित पार्किंग सिस्टम की कॉपी करना भूल गए।
विश्व समुदाय भी हमें कोई विश्वगुरु नहीं मानता, उनके लिए भी हम केवल एक भीड़ हैं। एक भीड़, जिसे अपना माल बेचा जा सकता है। एक भीड़ जिसे सपने बेचे जा सकते हैं।
शुरुआत में राजनीति भी हमें ‘जनता’ कहकर ही संबोधित करती है लेकिन अंततः वह हमें ‘भीड़’ की तरह इस्तेमाल करती है। जिस मंच से वह हमें जनता कहकर हमसे वोट मांग रहे होते हैं, उसी मंच की रिपोर्टिंग में हमें भीड़ कहा जा रहा होता है और हम तालियाँ पीट रहे होते हैं।
अगर कहीं जनता के लिए राजनीति के हाथों कुछ हितकर्म हो भी जाए, तो हम भीड़ बनकर उस विकास की ऐसी धज्जियाँ उड़ाते हैं कि राजनीति को अपने किए पर क्रोध आने लगता है। फिर वह हमें साम्प्रदायिक भीड़ में बदल देती है, फिर वह हमें जातियों की भीड़ में बदल देती है। हम ख़ुशी-खुशी भीड़ बन जाते हैं और दूसरी भीड़ के विरुद्ध गालियाँ तलाशने लगते हैं।
हमें भीड़ बनकर लड़ने की आदत हो गई है। हमें जैसे ही कोई साइनबोर्ड मिलता है, हम तुरंत उसके नीचे भीड़ बनकर जुटने लगते हैं। ‘गांधी’; ‘लोहिया’; ‘अम्बेडकर’; ‘हेडगेवार’; ‘कांशीराम’; ‘जयप्रकाश’; ‘मोरारजी’; ‘वीपी सिंह’; ‘मुलायम’; ‘माया’; ‘जयललिता’; ‘करुणानिधि’; ‘ठाकरे’; ‘अन्ना’; ‘केजरीवाल’; ‘मोदी’; ‘राहुल’; ‘ओवैसी’… ये सब हमारे लिए साइनबोर्ड बन गए और हम इनके नीचे भीड़ बनकर जुटते रहे।
इन सबने हमें मनुष्य बनाना चाहा तो हमने इनको पूरी ताकत से यह एहसास कराया कि हमें इंसान समझने की ग़लती मत करना। हमें भीड़ समझो, वर्ना हम तुम्हारे खिलाफ़ खड़े होकर तुम्हें औंधे मुँह गिरा देंगे।
✍️ चिराग़ जैन