Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
मध्यम वर्ग इस देश का सर्वाधिक दीन-हीन प्राणी है। उसका जन्म इसीलिए हुआ है कि वह शासन-प्रशासन से लेकर निजी कंपनियों तक के अर्थ-आखेट के काम आ सके।
जंगल में हिरन शिकार के ही काम आते हैं। शेर से बच गये तो लकड़बग्घों, तेंदुओं और सियारों तक की निगाह हिरनों पर रहती है। इन सबसे बच जाएँ तो किसी मनुष्य को अपने बंगले की दीवार पर हिरन का सिर लटकाने का शौक चर्रा जाता है।
हिरन अपने शिकार की कहीं शिकायत नहीं कर सकते। क्योंकि शिकायतनफ़ीस को भी हिरनों का शिकार करना अच्छा लगता है।
वर्तमान में दिल्ली के मध्यम वर्ग का आखेट करने का शौक लगा है निजी कैब कम्पनियों को। उच्च वर्ग को इन कम्पनियों की सेवा की ज़रूरत नहीं पड़ती और निम्न वर्ग इन सेवाओं को प्रयोग करने की ज़रूरत नहीं समझता। बच गया मध्यम वर्ग, वह इन कम्पनियों का टारगेट क्लाइंट है। प्रारम्भ में चूँकि इन कम्पनियों का युद्ध ऑटोचालकों और अन्य ट्रांसपोर्ट सेवाओं से था इसलिए इनकी विनम्रता तथा दरें आश्चर्यजनक रूप से आकर्षक थी। मध्यम वर्ग, जो मीटर से न चलने वाले ऑटोरिक्शा चालकों से प्रताड़ित था, वह इन सेवाओं का उपभोक्ता बन गया। लेकिन सियारों से बचाने जो लकड़बग्घे आए थे, उन्होंने सियारों को भगाकर ख़ुद ही हिरनों का शिकार करना शुरू कर दिया।
मध्यम वर्ग के शिकार के लिए कैब सर्विस के हथकण्डे:
1) सर्ज के नाम पर आधिकारिक रूप से तीन-चार गुना तक किराया वसूला जाता है। सरकारें इन कम्पनियों से यह पूछने की ज़ुर्रत नहीं कर पातीं कि समान दूरी के लिए वही गाड़ी इतनी महंगी क्यों पड़ रही है, जबकि जाम में फँसने की स्थिति में प्रति मिनिट किरायेवाला मीटर चालू रहता है।
2) इतना किराया देने के बावजूद कैब बुक होने पर ड्राइवर आपका इंटरव्यू लेता है। कहाँ जाएंगे, पेटीएम की पेमेंट है तो नहीं जाऊंगा, गुड़गांव नहीं जाऊंगा, नोएडा नहीं जाऊंगा, शाहदरा नहीं जाऊंगा…; एक्स्ट्रा पैसे देने होंगे… इत्यादि। इस साक्षात्कार में अनुत्तीर्ण होने के बाद आप ड्राइवर से कहते हैं कि वह राइड कैंसिल कर दे। यह अनुरोध करने के बाद आप मोबाइल देखते रहते हैं लेकिन वह राइड कैंसिल नहीं करता। आप उसे दोबारा फोन करते हैं तो वह फोन भी नहीं उठाता। थक-हारकर आप मजबूरी में अपनी ओर से राइड कैंसिल करते हैं और कम्पनी आपके नाम चालीस रुपये का बिल फाड़ देती है।
3) चूँकि मध्यम वर्ग के पास ऐसे सीन में कम्प्लेंट करने का पर्याप्त समय होता है, इसलिए कम्पनियों ने अपनी एप्लिकेशन में कोई फोन नम्बर ही उपलब्ध नहीं कराया है। आप अधिक से अधिक लिखित में शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जिसमें शिकायत के विकल्प कम्पनी ने स्वयं निर्धारित कर रखे हैं।
4) आजकल इन ड्राइवर्स का नाम हाथापाई और ईव-टीज़िंग तक के मुआमलात में थानों के स्वर्णिम रजिस्टरों में दर्ज होने लगा है, लेकिन थानों की कछुआ शैली का लाभ उठाकर खरगोशों का अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।
हिरन सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह इन लकड़बग्घों के गले में कानून की ज़ंजीर डाले। अनुरोध पढ़कर सरकार ज़ंजीर बनवाने का टेंडर पास करती है। ज़ंजीर की खनक सुनकर हिरन उत्साहित होने लगते हैं। सरकार सोशल डिस्टेंसिंग के पालन हेतु बसों और मेट्रो में सख्ती लागू कर देती है। डीजल की गाड़ियों पर बैन लगा देती है। पॉल्यूशन का चालान दस हज़ार का कर देती है। और लकड़बग्घों के लिए तैयार की गयी ज़ंजीर में हिरनों को बांधकर लकड़बग्घों के आगे पटक देती है।
हिरन सरकार की ओर कातर दृष्टि से देखते हैं और लकड़बग्घों की सहृदयता के लिए उन्हें नमन करते हैं कि अब से पहले कम से कम हमें बसों, मेट्रो और निजी वाहनों की स्वतंत्रता तो प्राप्त थी।
दिल्ली के सारे हिरन देखते रहते हैं कि सरकार हाथियों के लिए गन्ने की व्यवस्था कर रही है। हिरनों के नाम से जुटाई गयी घास खरगोशों में बाँटी जा रही है। लकड़बग्घों को हिरन परोस दिए गए हैं। और पूरी दिल्ली को व्यवस्थित करने के बाद अब सरकार पंजाब के हिरनों से वादा कर रही है कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें मुलायम सरकारी घास खिलाई जाएगी।
मैं ज़ंजीर में बंधा हुआ 2.3 गुना सर्ज की निजी कैब में बैठा हूँ और बस स्टैंड पर लगा होर्डिंग पढ़ रहा हूँ जिसमें अन्योक्ति अलंकार में यह लिखा है कि- ‘दिल्ली सँवारी, अब पंजाब की बारी।’
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Ek Adad Kirdar, Prose
भारतीय शौर्य का शीर्ष लहूलुहान है। एक उड़न-खटोले के ध्वंस ने माँ भारती की गोद को छलनी कर दिया। मृत्यु का यह क्रूर ताण्डव एक क्षण में दर्जन भर शेरों को मिट्टी बना गया।
यह दुर्घटना देश को ठगे जाने के एहसास से भर गयी है। ऐसा लग रहा है कि जिन वृक्षों को सींचकर जेठ की धूप के लिए घना किया जा रहा था, उन्हें यकायक पूस का पाला मार गया। जिन्होंने अपने जीवन का दाँव लगाकर देश को सुरक्षित रखने की शपथ उठाई थी, वे अनमोल जीवन बिना कारण ही ख़र्च हो गये। जिनके कन्धों पर देश की सुरक्षा की पालकी रखकर हम निश्चिंत थे, वे अचानक कन्धों पर सवार हो गए।
देव पर चढ़ने जा रहे मोतियों को मार्ग में ही कोई कौआ चुग गया। यह घटना पुलवामा की याद ताज़ा कर गयी है। जो देश की सुरक्षा के उत्तरदायी हैं, उनकी सुरक्षा का दायित्व किस पर है -यह प्रश्न फिर से मुँह उठाकर खड़ा हो गया है।
रावत साहब! आपका यह सेल्यूट स्वीकार नहीं हो पा रहा है। आप वीरों को लेकर स्वर्ग चले गए हैं और हम जीवित विजेता की तरह ठगे खड़े हैं। समस्याओं की शरशैया पर पड़े भीष्म की बिंधी हुई देह में दर्जन भर तीर और उतर गये हैं। वीरप्रसूता भारती की कोख कभी बांझ तो नहीं होती लेकिन जब भी उसका कोई लाल ‘ऐसे’ काल के गाल में समाता है तो उसका कलेजा ज़रूर फटता है।
यद्यपि यह शोक का समय है, तथापि घर के बुजुर्गों की एक सीख याद आ रही है कि यात्रा के समय धन को अलग-अलग जेबों में बाँटकर रखना चाहिए, ताकि कोई गिरहकट यदि जेब काट ले तो भी किसी न किसी जेब में घर लौटने का किराया बचा रह जाए।
ट्विटर और फेसबुक पर इस महाशोक के लिए सम्वेदनाओं की धारा बह रही है। इस बार कोई उत्तरदायी नहीं है तो सम्वेदना व्यक्त करनेवालों के आचरण में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह के चिह्न तलाशे जा रहे हैं। मुझे लगता है कि राष्ट्रप्रेम के नारों के बीच, मौन ओढ़कर सो चुके इन मंत्रों को कुछ देर के लिए यह आश्वस्ति तो दी ही जानी चाहिए कि अपने-अपने वाद में जकड़े उनके देशवासी किसी अवसर को तो अपनी आवाज़ ऊँची करने का अवसर मानने से परहेज कर लेते हैं।
हर किसी की मृत्यु को राजनैतिक कहासुनी का अवसर माननेवालों को कुछ समय के लिए ही सही लेकिन मौन होकर माँ भारती के आँसुओं की आवाज़ सुनने का धैर्य जुटाना सीखना होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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एक अभिनेत्री ने कुछ ऐसे बयान दिये हैं, जो तथ्यात्मक रूप से मिथ्या हो सकते हैं, लेकिन इन बयानों का विरोध करनेवालों की भाषा तथा तर्कशक्ति ने अभिनेत्री के मिथ्या भाषण से ध्यान भंग करने में महती भूमिका अदा की है। ‘कम कपड़े पहनकर फिल्मी पर्दे पर आनेवाली नचनिया हमें बताएगी कि आज़ादी क्या होती है!’ -यह वाक्य पढ़कर मुझे लगा कि कुतर्क तथा तर्कहीनता इस देश की किसी भी बहस का अंग बन चुका है। क्यों भाई, यदि किसी अभिनेता/अभिनेत्री ने किसी फिल्म में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है तो क्या इससे उसका चरित्र आंका जाएगा? क्या कम कपड़े पहननेवाले इस देश के नागरिक नहीं हैं?
कोई ‘क्या’ कह रहा है -इस मुद्दे पर बहस को केंद्रित करने की बजाय हम उसके परिधान, उसकी जाति, उसके धर्म, उसके व्यवसाय, उसकी पारिवारिक स्थिति और उसकी निजता को क्यों टटोलने लगते हैं?
आज़ादी भीख में मिलनेवाली बात कोई साड़ी-ब्लाउज़ या सूट-शलवार पहनकर कहे तो क्या यह सत्य हो जाएगी? हमें लम्बे समय से मूल मुद्दे को भटकाने के संस्कार दिए गए हैं। टीवी पर होने वाली बहसें यह ट्रेनिंग देने में सफल हुई हैं।
प्रश्न पूर्व का पूछा जाएगा तो उत्तरदाता उसे उठाकर दक्षिण में पटक देगा और फिर दक्षिणवाले उस प्रश्न को अनर्गल साबित कर देंगे। इतना हो हल्ला होगा कि कुछ घड़ी बाद ख़ुद प्रश्न भी यह भूल चुका होगा कि मेरा जन्म क्यों हुआ था।
कोई वर्तमान का प्रश्न करे, तो उसे इतिहास दिखाने लगो। कोई इतिहास पर तुम्हारी ज़ुबान पकड़ ले तो उसे धर्म-जाति के मेले में ग़ुम कर दो। कोई धर्म-जाति पर प्रश्न लेकर खड़ा हो तो उसे आस्था आहत करने के आरोप में राष्ट्रद्रोही और धर्मद्रोही करार दे दो। और यहाँ से भी वह बच जाए तो उसके निजी जीवन, उसके पहनावे, उसके भाषाई उच्चारण दोष, उसके खानपान जैसे विषयों पर बिना बात की बहस छेड़ दो।
नरेंद्र मोदी चलते-चलते संसद की सीढ़ियों पर लड़खड़ा गये और हम इस घटना से उनको नालायक साबित करने लगे। नरेंद्र मोदी बेध्यानी में राष्ट्रगान की धुन पर सावधान न हुए और हम उस क्लिप को लेकर ठट्ठा करने लगे। नरेंद्र मोदी ने बताया कि उनका सीना छप्पन इंच का है और हम इस आधार पर उन्हें महान मानने लगे। चुनाव रैली में राहुल गांधी ने कुर्ते की फटी जेब दिखाई और हम राहुल गांधी को मूर्ख कहने लगे। किसी बयान में योगी आदित्यनाथ के मुँह से लक्ष्मण की जगह भरत निकल गया और हमने हंगामा उठा लिया।
क्यों भाई? हमें राजनेताओं से देश चलवाना है या भागवत सुननी है? किसी की जेब फटी होगी तो उससे उसके राजनैतिक निर्णय पर क्या फर्क पड़ जाएगा? हमें नरेंद्र मोदी से देश चलवाना है या भारोत्तोलन करवाना है? राष्ट्रगान पर सावधान खड़े रहना चाहिए, यह बात तो प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ा दी जाती है। लेकिन अगर कभी किसी से कोई चूक हो जाए तो उसे उसकी राष्ट्रभक्ति से जोड़कर क्यों देखा जाए?
कोई राजनेता अपनी पत्नी से अलग रह रहा है तो यह उसका व्यक्तिगत मुआमला है। इस पर प्रश्न उठाने का अधिकार उसकी पत्नी के अतिरिक्त किसी को भी क्यों हो? कोई राजनेता विवाह नहीं कर रहा तो यह भी उसका निजी निर्णय है? इससे उसके राजनैतिक निर्णयों के आकलन कैसे किया जा सकता है?
कभी विचार करके देखें तो हम पाएंगे कि अपने राजनीतिज्ञों को यह बात हमने ही सिखाई है कि असल राजनीति को छोड़कर इधर-उधर के ड्रामे करते रहो तो जनता ज़्यादा वोट देगी। अन्यथा हर काम वोट के लिए करनेवाले लोग ऐसे कार्यों का प्रोपेगैंडा क्यों करते, जिनका ‘राज्य की नीतियों’ से कोई लेना-देना नहीं हो।
कोई वैष्णोदेवी जाए तो जाने दो। कोई केदारनाथ जाए तो यह उसकी निजी आस्था है। कोई अजमेर में चादर चढ़ाए तो उस उसका पर्सनल मुआमला है। कोई मंदिर में झाड़ू लगाए तो यह उसकी मर्ज़ी है। कोई राममंदिर में दीये जलाए तो यह उसका अपना मत है। हम इन सब कार्यों को उनकी राजनैतिक स्थिति का मापदण्ड क्यों बनाते हैं? हम ऐसा क्यों मान बैठे हैं कि धर्मस्थल पर जानेवाला व्यक्ति भ्रष्टाचारी हो हो नहीं सकता; वह भी तब जब हमारे देश के न्यायालयों में धर्मस्थलों पर हुए कदाचार के सैंकड़ो मुआमले लम्बित हैं।
हम निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन को अलग-अलग करके क्यों नहीं देख पाते।
सीता का परित्याग करने वाले राम आदर्श राजा हैं। राधा को बिरह देने वाले कृष्ण सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। यशोधरा और राहुल को सोता छोड़कर जानेवाले तथागत सर्वाेत्कृष्ट ज्ञानी हैं। क्या इन कथाओं से भी हम यह नहीं सीख सकते कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक प्रश्नों के सटीक उत्तर दे रहा हो तो उस समय उसे निजता के कठघरे में घसीटकर प्रश्नावली नहीं बदलनी चाहिए।
✍️ चिराग़ जैन
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कबिरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी ख़ैर… अहा! इस पंक्ति को समझने का प्रयास व्यक्ति को कबीर होने का अर्थ बताता है। कबीर इस दोहे में बाज़ार में ही क्यों खड़े हैं? वे मंदिर-मस्जिद; घाट, चौपाल कहीं भी खड़े होकर सबकी ख़ैर मांग सकते थे। बल्कि मंदिर-मस्जिद में मांगना ज़्यादा सम्मानजनक प्रतीत होता। अक्सर बड़े-बड़े सम्मानितों को मंदिर-मस्जिद में मांगते देखा गया है। इसलिए कबीर को भी कुछ मांगना था, तो मंदिर-मस्जिद अधिक उपयुक्त स्थान रहता।
मंदिर-मस्जिद में मांगने का एक लाभ यह भी है कि वहाँ जिससे मांगने जाते हैं; वह किसी को यह नहीं बताने जाता कि अमुक मुझसे फलां चीज़ मांगने आया था। बाक़ी कहीं भी कुछ मांग के देख लेना। तुम्हें वह चीज़ मिले या न मिले, लेकिन तुम्हारी मंगताई का प्रचार ज़रूर हो जाएगा। ईश्वर-अल्लाह के पास इतनी फ़ुरसत ही नहीं है कि वे प्रचार में संलग्न हो सकें। वे तो भाँति-भाँति के मंगतों की दरख़्वास्त और शिक़ायतें निपटाने में ऐसे घिरे हैं कि शायद युगों-युगों से नज़रें उठाकर देख भी न सके हों, कि हमने उनकी दुनिया की सूरत क्या बना दी है।
लेकिन कबीर ने कुछ मांगने के लिए बाज़ार चुना। बाज़ार में मांगने का प्रावधान ही नहीं है। वहाँ तो छीना जा सकता है, ठगा जा सकता है, हड़पा जा सकता है… मांगने की परम्परा बाज़ार की पर्सनेलिटी को सूट नहीं करती। लेकिन कबीर ने उसी बाज़ार को मांगने के लिए चुना। और मांगा भी तो क्या… ‘सबकी ख़ैर!’ यह भी कोई मांगने की चीज़ है भला? लेकिन कबीर मांगते हैं। सर-ए-आम मांगते हैं।
यही कबीर होने का पहला सोपान है। यही कबीर होने की पहली शर्त है। कुछ ऐसा कर गुज़रना, जो परिपाटी ही नहीं है; कुछ ऐसा कर गुज़रना जिसका चलन ही नहीं है। परंपराओं को धता बताकर चलने का जीवट ही कबीर को कबीर बनाता है।
इसीलिए कबीर पहले ही कह देते हैं कि कबिरा खड़ा बजार में…! अब ‘कबीर’ महत्त्वपूर्ण हैं। कबीर बाज़ार को चेतावनी दे रहे हैं कि जो बाज़ार में खड़ा है वह ‘कबीर’ है। यदि इस पंक्ति में ‘बाज़ार’ को प्रमुख समझ लिया जावे तो कबीर को गौण होना पड़ेगा। इसलिए कबीर स्पष्ट कहते हैं कि अब बाज़ार में ‘कबीर’ खड़ा है। इसलिए बाज़ार को गौण होना होगा। अब बाज़ार में ‘सबकी’ ख़ैर मांगी जाएगी।
‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ -इस व्यक्तित्व के साथ ही कोई कबीर हो सकता है। और अपने भीतर के इसी कबीर को जीवित रखने में सफल होना किसी मनुष्य के मनुष्यत्व का द्विगुणित हो जाना सुनिश्चित कर देता है।
बाज़ार में प्रविष्ट होते ही ‘अर्थ’ मुखर हो जाता है। वहाँ पहुँचकर बड़े से बड़े फ़क़ीर भी व्यापारी होते देखे गए हैं। इसीलिए कबीर के पहले और कबीर के बाद किसी साधु-महात्मा-फ़क़ीर ने यह घोषणा नहीं की कि वह बाज़ार में खड़ा है। यह जोख़िम कबीर ही उठा सके। और कबीर भी यह जोख़िम इसीलिए उठा सके कि उन्होंने कभी स्वयं के फ़क़ीर होने की भी कोई घोषणा नहीं की।
यदि कबीर ने अपने आईकार्ड में ओक्यूपेशन ‘फ़क़ीर’ या ‘संत’ लिखवा लिया होता… तो वे भी अपने बाज़ार में खड़े होने का ऐसा ढिंढोरा न पीट पाते।
लेकिन कबीर तो कबीर थे। वे वैरागी होकर बाज़ार में खड़े नहीं हुए, बल्कि बाज़ार में खड़े होकर वैरागी हो गये। …ना काहू से दोस्ती। कितने अनुभवी थे कबीर। बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में बताया कि उनकी किसी से दोस्ती भी नहीं है और वैर भी नहीं है। यदि वे आधी पंक्ति लिखकर छोड़ देते तो उसका इंटरप्रिटेशन ‘यूँ’ किया जा सकता था कि किसी से दोस्ती न होने का अर्थ है कि सबसे दुश्मनी है। जैसे हमसे कोई कहे कि वह झूठ नहीं बोलता… तो हम यह स्वयं अर्थ निकाल लेंगे कि वह सच बोलता है। लेकिन कबीर स्पष्ट करते हैं कि झूठ न बोलने का अर्थ सच बोलना नहीं है। किसी से दोस्ती न होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी से वैर है या सबसे वैर है। दो विलोमार्थी शब्दों के मध्य भी एक भाव होता है। श्वास और उच्छ्वास के मध्य भी एक निर्वात होता है।
इस निर्वात पर खड़े होकर आप चाहे बाज़ार में जाएँ, मंदिर में जाएँ, मस्जिद में जाएँ, मसान में जाएँ, चाहे वेश्यालय में ही क्यों न जाएँ… यहाँ खड़े व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व कोई नहीं छीन सकता। यहाँ खड़ा व्यक्ति अपने वातावरण को प्रभावित कर तो सकता है, किन्तु अपने वातावरण से प्रभावित हो नहीं सकता। यहीं खड़ा व्यक्ति सबकी ख़ैर मांग सकता है, बिना यह ध्यान किये कि उसके इस साहस से बाज़ार की परंपरा ध्वस्त हो रही है और बाज़ार पर शासन करने वाला ‘अर्थ’ कबिरा के शब्दों का ‘अर्थ’ बूझते हुए मुँह बाये खड़ा रह जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
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आज पुनः अनुरोध कर रहा हूँ कि किसी रचनाकार की रचना अथवा उसकी रचना का कोई अंश सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय रचनाकार का नाम अवश्य लिखें।
ऐसा न करने की स्थिति में निम्नलिखित स्थितियां उत्पन्न होती हैं :
1) रचना अनाथ हो जाती है, और लोग उसे सोशल मीडिया की रचना कहने लगते हैं। मूल रचनाकार अपनी ही रचना को सुनाते हुए चोर कहलाने लगता है।
2) कोई अन्य व्यक्ति उस अनाथ रचना को अपने नाम से सुनाने या पोस्ट करने लगे तो मूल रचनाकार उसे अपनी सिद्ध करने में थक जाता है।
फेसबुक पर यह विषय कई बार उठाया है लेकिन लोग ज्ञान देते हैं कि अगर कोई आपकी रचना शेयर कर रहा है तो आपको ख़ुशी होनी चाहिए। उल्टे हमें बताया जाता है कि अपनी रचना को अपनी कहने की जो कोशिश हम कर रहे हैं वह हमारी छोटी सोच की परिचायक है।
सो महान सोच वाले इन लोगों से यही कहना चाहूंगा कि रचनाकार की रचना उसकी सन्तान की तरह होती है। यदि किसी के बालक सुन्दर हैं तो उन्हें प्यार करने का हक़ पूरे गाँव को होता है, लेकिन उनका अपहरण कर लेने का अधिकार किसी को नहीं है।
सोशल मीडिया की इन्हीं प्रवृत्तियों का लाभ उठाकर कुछ चोर कवियों ने ख़ूब प्रसिद्ध पंक्तियों को भी जस का तस या एकाध शब्द बदलकर अपने नाम से पोस्ट करने की सिरीज़ चला रखी है। यदि पुण्य-पाप होते हैं तो इन सब चोरियों का पाप उनके खाते में जाएगा, जो किसी की रचना उद्धृत करते समय रचनाकार का नाम लिखना/बोलना आवश्यक नहीं समझते।
इस स्थिति के सुधार के लिए निम्न दो क़दम उठाए जा सकते हैं
1. कोई भी ऐसा मेसेज फॉरवर्ड न करें, जिसमें रचनाकार का नाम न लिखा हो।
2. यदि कहीं किसी जगह ऐसी प्रवृत्ति दिखे तो उसके कमेंट बॉक्स में मूल रचनाकार का नाम अवश्य लिख कर आएं।
सोशल मीडिया की चौर्य प्रवृत्ति को इतना न बढ़ने दें कि मौलिक रचनाकार अपनी पंक्तियाँ पोस्ट करना बन्द कर दें।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
मोबाइल फोन की तरह मन भी अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग मोड पर सैट हो जाता है। सम्भवतः मनोविज्ञान में इसी को मूड कहा जाता हो।
कभी हम बहुत ख़ुश होते हैं, मतलब हम हैप्पी मोड में हैं। ऐसे ही सैड मोड, कन्फ्यूज़्ड मोड और एंग्री मोड भी हम सबके भीतर ऑन-ऑफ होते रहते हैं। यह सहज मानवीय स्वभाव भी है। लेकिन कुछ लोग पूरा जीवन एक ही मोड में बिता देते हैं। इनके सॉफ्टवेयर में बाक़ी किसी मोड पर जाने की वायरिंग ही नहीं होती। आप किसी भी परिस्थिति का वायर छू दो, वह उनके फिक्स मोड को ही पॉवर सप्लाई करेगा।
ऐसा अक्सर भयभीत मोड और चिड़चिड़ा मोड के लोगों के साथ होता है। चिड़चिड़ा मोड के व्यक्ति हमेशा चिड़चिड़ाहट के अलंकार से अपना चेहरा सजाए रखते हैं। जिनका ऊपर का ओंठ कुछ शूकराकार होता हुआ ऊपर उठा रहता है और नासिका के मध्यभाग को सिकोड़ने की कवायद में दोनों नथुने भैंसे के नथुनों से प्रतियोगिता करते रहते हैं। चूँकि भैंसा कभी-कभी थकता भी है, इसलिए वह वर्ष में तीन-चार बार इनसे हार जाता है। इस विजय से इनकी चिड़चिड़ी शिराओं में प्रसन्नता की जो ऊर्जा प्रवाहित होती है, वह भी अंततः चिड़चिड़ाहट में ही परिणत हो जाती है।
लगभग यही स्थिति भयभीत मोड के मनुष्यों की होती है। वे किसी भी बात से भयभीत हो सकते हैं। बल्कि यूँ कहिये कि वे बिना बात के ही भयभीत रहते हैं। आप उनको सामान्य फोन मिलाकर दीपावली की बधाई दें। वे तुरन्त भयभीत हो जाएंगे कि आपको उनसे क्या लोभ है जो आप उन्हें बधाई देने के लिए फोन कर रहे हैं? आप उनकी प्रशंसा करो तो वे भयभीत होकर आपकी प्रशंसा में षड्यंत्र सूंघने लगेंगे। आप उनकी प्रशंसा न करो तो वे आपके भीतर ईर्ष्या के समंदर देख लेंगे।
इनकी स्थिति उस मुर्गे की तरह होती है जो जन्मते ही यह मान बैठता है कि उसका जन्म केवल कटने के लिए हुआ है। इस महान विचार को स्वीकार करने के बाद वह जीवन भर डॉक्टर और कसाई के बीच भेद कर पाने की क्षमता गँवा बैठता है।
संदेह इनकी धमनियों में अनवरत दौड़ता रहता है। इनकी धड़कनों से अहर्निश ‘सावधान-सावधान’ की प्रतिध्वनि मुखरित होती है। सड़क पर चलते हुए दो व्यक्ति यदि हँसते हुए दिख जाएँ तो ये कल्पनाशीलता का प्रयोग करके उनकी सामान्य हँसी को पहले ठहाका और फिर राक्षसी अट्टहास बना लेते हैं। फिर वे दोनों अनजान मनुष्य इन्हें लुटेरे लगने लगते हैं।
इनकी यह असीम प्रतिभा इन्हें कभी चैन से सोने नहीं देती। ये भी किसी तपस्यारत योगी की तरह पूरा जीवन अपनी भय के कबूतर का अपने हृदय के भीतर ही पोषण करते रहते हैं। यदि कभी कोई प्रसन्नता, मेनका बनकर इनकी साधना भंग करने का प्रयास करे तो ये अपने क्रोध की अग्नि से उस प्रसन्नता को उत्पन्न करनेवाले का सुख-चैन भस्म कर देते हैं।
इस मोड के लोगों में यदि ग़लती से स्वयं को समझदार समझने की पैन ड्राइव और लग गयी तो फिर तो इनका पूरा सिस्टम डिस्को करने लगता है। पैन ड्राइव का प्रभाव इनसे समझदार होने का अभिनय करवाता है और इनकी नैसर्गिक मेधा रह-रहकर इनके पर्यायवाची में लगी ‘ऊ’ की मात्रा को लम्बा करती रहती है। अब इनका भय झुंझलाहट के सिंगार से युक्त हो जाता है। झुंझलाहट इसलिए कि पैनड्राइव लगाने के बावजूद कोई इन्हें समझदार मानने को तैयार नहीं होता और ये स्वयं को समझदार मान चुके होते हैं।
इन विरोधाभासी मान्यताओं के बीच ये बेचारे समझदारी के अभिनय का अनुपात बढ़ाते हुए लोगों से सौहार्दपूर्ण व्यवहार का अतिरिक्त प्रयास करने लगते हैं। अपने भयभीत विवेक से ये जिसे ‘सफल’ मान रहे होते हैं, उसकी तरह बैठने लगते हैं, उसकी तरह बोलने का प्रयास करते हैं; लेकिन ज्यों ही कोई इनके अभिनय को सत्य समझकर इनकी समझदारी की प्रशंसा कर देता है, तो इनकी नैसर्गिक प्रतिभा तुरन्त प्रकट हो जाती है और वह उस प्रशंसा में षड्यंत्र सूंघने लगती है।
काश अपनी असुरक्षा-ग्रंथि को पुष्ट करने की बजाय कभी ये लोग यह स्वीकार कर सकें कि हमारे पास है ही क्या जो कोई हमसे छीन लेगा…! काश ये लोग समझ सकें कि ख़ुश रहना बहुत बड़ी कला है, और इस कला पर हर प्रकार का भय स्वाहा किया जा सकता है।
✍️ चिराग़ जैन