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संबंधों की साँस उखड़ने लगती है

जब बेटी की उम्र ज़रा रफ़्तार पकड़ने लगती है तब माँ हर आते-जाते की नज़रें पढ़ने लगती है जब मन की कच्ची मिट्टी कुछ सपने गढ़ने लगती है तब ज़िम्मेदारी की भारी बारिश पड़ने लगती है यूँ तो वो अपनी हर ज़िद्द मनवा ही लेता है मुझसे लेकिन मेरे भीतर-भीतर नफ़रत बढ़ने लगती है प्यार अगर सच्चा...

अपना-अपना शऊर था

सरे-बज़्म मैं रुसवा हुआ, यही दौर का दस्तूर था मैं ये बाज़ियाँ न समझ सका, मिरी सादगी का क़ुसूर था तूने ग़म में ख़ुशियाँ तबाह कीं, मैंने हँस के दर्द भुला दिये ये तो अपना-अपना रिवाज़ था, ये तो अपना-अपना शऊर था तुझे जिस्म से ही गरज़ रही, मिरा जिस्म तेरी हदों में था मिरी रूह...

मुहब्बत हार जाती है

दिलों में पल रही चाहत सदा बेकार जाती है भला सोहनी कहाँ कच्चे घड़े पर पार जाती है वो लैला का फ़साना हो या फिर मेरी कहानी हो मुक़द्दर जीत जाता है, मुहब्बत हार जाती है ✍️ चिराग़...

तो भी मैं ग़लत

मैं अगर ख़ुद अपना सच बतलाऊँ तो भी मैं ग़लत और अगर हर झूठ को सह जाऊँ तो भी मैं ग़लत ग़र तुम्हारे वार से मर जाऊँ तो भी मैं ग़लत और अगर ख़ुद को बचाना चाहूँ तो भी मैं ग़लत बेअबद हूँ मैं अगर बेहतर करूँ कुछ आपसे और गर बेहतर नहीं कर पाऊँ तो भी मैं ग़लत बेवजह अपशब्द कहने की मुझे आदत...

मुल्क़ में दहशत

जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से ये दहशतग़र्द अब...

वो शालीन पल

हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल हर तरह की वासना से हीन पल अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल आपका आना, ठहरना, लौटना इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों हो गए हैं...
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