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दिल्ली चुनाव 2014

आडवाणी जी से बोले मोदी न निराश रहो
चार-पाँच साल की है बात चला जाऊँगा
जब मेरे शाह के वज़ीर हार मान लेंगे
आपको ही सौंप के बिसात चला जाऊँगा
वोट देने वाले सब लोग टापते रहेंगे
कर के मैं बड़ी-बड़ी बात चला जाऊँगा
भाजपाई सोचें उन्हें काशी जाना है कि काबा
मेरा क्या है मैं तो गुजरात चला जाऊँगा

दिल्ली के सीएम को मिली है जहाँ कोठी वहीं
रूठने मनाने वाला कक्ष भी बना लिया
केजरी ने बीच-बीच खांसने-खखारने को
मौसम सा अपने समक्ष भी बना लिया
दिल्ली जीतने के बाद बाकी देश की विधान
सभाओं को झाड़ुओं का लक्ष भी बना लिया
आप के ख़िलाफ़ कोई बोल नहीं पा रहा था
आप ने ख़ुद अपना विपक्ष भी बना लिया

मोदी जी के जादू का सुरूर सा उतर गया
नुकसान हुआ भरपाई का अभाव है
भाजपाइयों की चैन भरी नींद उड़ गई
कांग्रेसियों को तो जम्हाई का अभाव है
सिस्टम को ऊपरी कमाई का अभाव और
जनता को मुफ्त वाई-फाई का अभाव है
जिसने गलीचा सा बिछा दिया था भारत में
उसे राजधानी में चटाई का अभाव है

अधिसूचना के दिन प्रेमी ने हिदायत दी
सावधान रहो प्रेम से है बड़ी जनता
प्रेमिका ने पूछा काहे रैलियों में कोसा मोहे
प्रेमी बोला यही सुनने पे अड़ी जनता
वोटिंग के दिन प्रेमी प्रेमिका से लड़ पड़ा
उन्हें देखकर आपस में लड़ी जनता
परिणाम बाद प्रेमी सीना चौड़ा कर बोला
गठजोड़ कर लो कुएं में पड़ी जनता

लोकसभा वाले जो चुनाव थे वहां तो मेरे
नाम का ही जलवा चला था भाई-बहनो
कांग्रेसी शासन की ठगी हुई जनता को
हाथ का निशान तो खला था भाई-बहनो
चाय के पतीले में पका के जाति वाला तेल
पीएम के पद को तला था भाई-बहनो
अच्छे दिन, काले धन की न अब आस रखो
वह तो चुनावी जुमला था भाई बहनो
✍️ चिराग़ जैन

प्रेम की तकनीकी चुनौतियां

यूरिया का ज़ोर, हर डाल कमज़ोर, अब
चंपा की टहनिया पे लूम नहीं सकते
एमएमएस बनने का डर लगा रहता है
प्यार के नशे में अब झूम नहीं सकते
प्यार के हज़ार दुश्मन हर मोड़ पे हैं
एक-दूसरे के साथ घूम नहीं सकते
और अब मुआ हैलमेट गले पड़ गया
बाइक पे बैठ के भी चूम नहीं सकते

✍️ चिराग़ जैन

संक्रमण काल

चौपालों पे कितने ठहाके गूंजा करते थे
आज अधरों पे मुस्कान भी नहीं रही
कभी स्वाभिमान तलवारों से दमकता था
आज तलवार छोड़ो, म्यान भी नहीं रही
पेड़ों से घरों की पहचान थी कभी पर अब
पेड़ भी नहीं हैं पहचान भी नहीं रही
नारियों के हाथ में भी आई न व्यवस्था और
हद ये है पुरुष प्रधान भी नहीं रही

✍️ चिराग़ जैन

भारत की तस्वीर

भारत की आज तस्वीर जो बनी हुई है
उसमें पुरानी हर रीत का भी रंग है
हल्दीघाटी वाली एक हार की कसक भी है
पोरस की स्वाभिमानी जीत का भी रंग है
चंद्रगुप्त मौर्य वाले साहस का नूर भी है
चाणक्य शिखा की कूटनीति का भी रंग है
झाँसी वाले शौर्य की कहानी तलवार पे है
पीठ पर ममता की प्रीत का भी रंग है

भारत की वीणा पे जो सरगम गूंजती है
उसमें वीणा के हर तार का भी योग है
क्रांति के बारूदों के धमाकों की धमक भी है
शांति का व मान-मनुहार का भी योग है
तलहट में छिपे खज़ानों की खनक भी है
अभिशाप झेलते बिहार का भी योग है
काम की प्रभावना की अजंता-एलोरा भी है
राम-कृष्ण योग के विचार का भी योग है

बरखा में नृत्यमग्न मोर अनिवार्य है तो
मोर की नमी से भरी कोर भी ज़रूरी है
तुंग हिमगिरि की विशालता आवश्यक है
सागर की गर्जना का रोर भी ज़रूरी है
अवध की सुरमई शाम अनिवार्य है तो
काशी के किनारों वाली भोर भी ज़रूरी है
देश की अखण्डता को पूर्ण करने के लिए
भारती का एक-एक पोर भी ज़रूरी है

✍️ चिराग़ जैन

महाश्रमण

महावीर स्वामी की पुरातन परंपरा के
वर्तमान युग में निशान देख लीजिए
संत के समागम का कैसा है प्रभाव आज
सज उठा कैसे बियाबान देख लीजिए
आभा का प्रभाव है या तप का चमत्कार
सबके दुखों का है निदान देख लीजिए
जहां-जहां चरण पड़े हैं दिव्य श्रमणों के
वहां-वहां तीरथ महान देख लीजिए

पुण्य का उदय है आपके हमारे जीवन में
ऐसे दिव्य पावन सुखद क्षण उतरे
धर्म की सभा में धार्मिकों का समागम है
जैसे महावीर का समोशरण उतरे
अहिंसा के बल पर शासन हो कैसे भला
धरती पे इसके उदाहरण उतरे
महावीर और महाप्रज्ञ की विरासत को
साथ लिए देखिए महाश्रमण उतरे

सादगी का नूर भी है, ज्ञान का कपूर भी है
अहिंसा का देते हैं पैग़ाम भी महाश्रमण
धर्मसंघ की कमान साधते हैं दिन-रैन
साधना में रहें आठों याम भी महाश्रमण
धर्म की पकड़ डोर, नापें धरती का छोर
घूमें गली-गली गाम-गाम भी महाश्रमण
कहाँ आखरों में बंध पाएंगे ऐसे महान
श्रमण; कि जिनका है नाम भी महाश्रमण

त्याग, तप, साधना से ऐसे हो गए प्रबल
कामना पे लगाते विराम भी महाश्रमण
भीतर से बाहर तलक दिव्यरूप संत
आत्मा भी, हाड़-मांस-चाम भी महाश्रमण
हर क्षण, हर पल, एक सा सलोना रूप
सुब्ह भी महाश्रमण, शाम भी महाश्रमण
जिसने समर्पण के झरोखों से निहारा
उसके लिए तो चारों धाम भी महाश्रमण

✍️ चिराग़ जैन

देश को महान कौन करता

यदि इतिहास वाले लोग हम जैसे होते
बोलो दुविधाओं का निदान कौन करता
झाँसी वाली रानी कर लेती समझौता गर
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कौन करता
भगत भी चाटुकारों वाली भाषा सीख लेते
भारतीयता पे अभिमान कौन करता
नेताजी सुभाष औ पटेल होते स्वार्थी तो
फिर मेरे देश को महान कौन करता
✍️ चिराग़ जैन

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