Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Purushottam
राजवैभव की नहीं है चाह कोई
कीर्ति की, यश की नहीं परवाह कोई
जय-पराजय की घड़ी में मन सहज हो
शोक हो, भय हो, न हो उत्साह कोई
राम, मुझको दो भले मत आवरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
जग जिसे पाषाण माने, देख लूँ मैं साँस उसकी
जो नदी-तट पर खड़ा हो, जान पाऊँ प्यास उसकी
याचना से जो पिता को धर्मसंकट में फँसाए
मैं स्वयं को दांव पर रखकर, सुनूँ अरदास उसकी
हर कठिन क्षण का करूँ वातावरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
प्रेम की जूठन नहीं, केवल समर्पण-भाव देखूँ
वृद्ध पक्षी की पराजय भूल, उसके घाव देखूँ
मित्रता में मित्र का जीवन सुलझना प्राथमिक हो
तब कहीं निज भाग्यरेखा का कोई उलझाव देखूँ
धीर के शृंगार से अंतःकरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
जब चयन का प्रश्न आए, साधना का पथ चुनूँ मैं
कथ्य की इति हो जहाँ पर, उस जगह से अथ चुनूँ मैं
जब परिस्थितियाँ कई चेहरे बनाकर सामने हों
तब समर में जूझने को आत्मबल का रथ चुनूँ मैं
हर समय, हर भाव का हो व्याकरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
क्यों भला भाती नहीं शीतल नदी की धार
यूँ समझ लो आप अपनी प्यास को भूले हुए हो
ख़ुश हुए तो भूल बैठे दर्द का उपकार
रो पड़े तो प्राण के उल्लास को भूले हुए हो
आज से पीछा छुड़ाकर भागते हो
एक कोरे ख़्वाब के संग जागते हो
क्यों हज़ारों ख़्वाहिशों का ढो रहे हो भार
आप शायद वक़्त के इतिहास को भूले हुए हो
कब समय किसकी बना दे कौन सूरत
आँसुओं में भीग जाएँ, शुभ मुहूरत
कुंडली में दिख रहा आंगन खड़ा त्योहार
आप शायद राम के वनवास को भूले हुए हो
पाल भी बांधो, हवा भी है ज़रूरी
भीगकर ही नापती है नाव दूरी~
पार कर पाती नहीं नौका, कोई पतवार
तो यक़ीनन आप इक अरदास को भूले हुए हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
राज्य, वैभव और निज पहचान तक से हाथ धोकर
चल दिये पाण्डव स्वयं के शौर्य से अज्ञात होकर
वीरता के उपकरण को गौण रहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
भाग्य ने क्या खेल खेला है विवशता के पलों में
सूख जाने की अनोखी खलबली है बादलों में
शस्त्र, जिनको प्राप्त करने के लिए काया गलाई
अब उन्हीं सबको छुपाते फिर रहे हैं जंगलों में
प्राण के बिन, देह को चुपचाप दहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
देख लो, राजा युधिष्ठिर कंक बनकर जी रहे हैं
द्यूतगृह में दांव हारे, रंक बनकर जी रहे हैं
विश्व जिनकी वीरता को देखकर इतरा रहा था
वे स्वयं के शौर्य का आतंक बनकर जी रहे हैं
पार्थ ने गांडीव तज, शृंगार पहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
द्रौपदी को साज और सिंगार की अनुमति नहीं है
भीम को निज जीभ के सत्कार की अनुमति नहीं है
वीरता भयभीत है, कोई उसे पहचान ना ले
अब अनुज को अग्रजों के प्यार की अनुमति नहीं है
आह, हर इक चाह का अवसाद गहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
शौर्य के हर चिह्न से परहेज करना पड़ रहा है
धैर्य की भी धड़कनों को तेज़ करना पड़ रहा है
यश बढ़ाने का हर इक आशीष अब अभिशाप सा है
हाय अपने आपको निस्तेज करना पड़ रहा है
रक्त तक को धमनियों में शांत बहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
इस पराभव का जनक क्या द्यूत का षडयंत्र बल है
कर्म के अनुरूप फल होगा, नियम ये भी अटल है
दांव पर थी लाज और भुजदण्ड में कंपन नहीं था
यह विवशता उस नपुंसक शौर्य से उत्पन्न फल है
इक घड़ी का मौन अब दिन-रात सहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
हाँ, जगत् में एक कण के अंश-सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा व्यक्तित्व इस कण की चमक दुगुनी करेगा
हाँ, समय में एक क्षण के अंश-सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा व्यक्तित्व इस क्षण की दमक दुगुनी करेगा
साँस है बस दास प्राणों की किसी आह्लाद के बिन
हर इमारत ताश का घर है महज; बुनियाद के बिन
वक़्त पर बोला नहीं जो, क्या भला जीवन जिया वो
ज्यों कहानी में कोई किरदार हो संवाद के बिन
हाँ, समर में मात्र रण के अंश सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा व्यक्तित्व इस रण की धमक दुगुनी करेगा
कृष्ण जिसका छत्र धारें, मैं वो गोवर्धन नहीं हूँ
देव जिस पर पर पुष्प वारें, कालिया मर्दन नहीं हूँ
बाँसुरी की तान, माखन, मोरपंखी, भी नहीं मैं
चक्र का नर्तन नहीं हूँ, शंख का गुंजन नहीं हूँ
कुंजवन में एक तृण के अंश सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा व्यक्तित्व इस वन की गमक दुगुनी करेगा
मैं पराजित गिद्ध जैसा पात्र हूँ, सीताहरण में
मैं हूँ बूढ़े रीछ का प्रेरक वचन, लंकादहन में
देखने में गौण हूँ फिर भी कथा का भार मुझ पर
मैं किसी रथचक्र-सा बेमोल, अभिमन्यु मरण में
कर्ण के किस्से में बिच्छू दंश-सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा होना, किसी प्रण की रमक दुगुनी करेगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
रास्ता दूभर बहुत था
हारने का डर बहुत था
राह की धरती नहीं थी
चाह का अम्बर बहुत था
जूझने में व्यस्त थे, सुबकी नहीं आई
जीतने पर आँख भर आई
ज़िन्दगी की नाव की पतवार का एहसास भी था
साथ ही इस अनकहे से प्यार का आभास भी था
यूँ समझ लो, द्वार पर शिशुपाल भी था, कंस भी था
और मन के कुंजवन में अनवरत इक रास भी था
और उस पर रीतियों का बोझ हरजाई
जीतने पर आँख भर आई
देह के संवाद पर सब दोस्त-यारों की नज़र थी
और मन के हाल पर बस चांद-तारों की नज़र थी
हम निरंतर शुष्क होती कोंपलों से काँपते थे
पर हमारी डालियों पर भी बहारों की नज़र थी
एक दिन ख़ुद ही समूची डाल हरियाई
जीतने पर आँख भर आई
एक दिन पाया बिवाई में महावर भर गया है
एक दिन देखा हर इक निःशब्द में स्वर भर गया है
पीस की हर टीस सहकर अब हथेली रच उठी है
और इक सौभाग्य का क्षण मांग आकर भर गया है
हर पुरानी याद मुस्काई
जीतने पर आँख भर आई
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
रात काटें जागकर हम
दिन बिताते भागकर हम
व्यस्तता से घिर रहे हैं
क्यों उनींदे फिर रहे हैं
इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो
आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो
व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन ऐसा चुरा लें
काश बेपरवाह होकर आँख मूंदें, मुस्कुरा लें
याद की कुछ गठरियाँ खोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
पिंडलियों में नींद के अन्याय की पीड़ा भरी है
भृकुटियों पर एक मुद्दत से बहुत चिंता धरी है
भीड़ के जंजाल से हटकर कभी एकांत बुन लें
शांत हों इतने कि अपनी देह की आवाज़ सुन लें
एक दिन ख़ुद के लिए रो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
विश्व का हमने कोई कर्जा नहीं खाया हुआ है
किसलिए मुस्कान का ये झूठ चिपकाया हुआ है
एक दिन बस एक दिन की ज़िंदगी का लुत्फ़ ले लें
जीतने और हारने से दूर होकर खेल खेलें
ज़िंदगी में ज़िन्दगी बो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
✍️ चिराग़ जैन