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सावधान, आगे सड़क है!

भारत एक ऐसा देश है, जहाँ सड़कें बनाई नहीं जातीं। ऐसा लगता है मानो हर सड़क भारतीयों को संघर्षों से जूझने का प्रशिक्षण देने के लिए राहों में बिछ गई हो। देश की राजधानी से प्रारंभ करते हैं। इस शहर की सड़कों के दोनों ओर फुटपाथ बनाए गए हैं। फुटपाथ, अर्थात् रेहड़ी, पटरी लगाने का स्थान। कहीं-कहीं मूत्रालय बनाकर वातावरण में इत्र छिड़कने की भी व्यवस्था की गई है।
नागरिकों की सुविधा के लिए फुटपाथ से मिलकर जो पहली लेन है वह पार्किंग के काम आती है। बीच की लेन पर मातृत्व की याद दिलाने के लिए साक्षात् गौ माता सपरिवार उपस्थित रहती हैं। दाहिनी लेन, जो डिवाइडर से चिपककर लेटी है, उस पर कभी डिवाइडर की रेलिंग उंगली करती दिखाई देती है, तो कभी पुलिसवाले अंकल बैरिकेड्स रखकर इधर-उधर चले जाते हैं।
इससे भी कोई फर्क़ न पड़े तो फास्ट लेन पर गाड़ी ख़राब हो जाएगी। और भी कुछ नहीं तो गड्ढों की व्यवस्था तो कहीं भी हो ही जाती है।
इन सबकी उपस्थिति के बावजूद जो वाहन सड़कों पर चलने की हिम्मत करते हैं, उन्हें हर चौराहे पर भिखारियों और हिजड़ों का वेश बनाकर सर-ए-आम लूटने के लिए सरकारी संरक्षण प्राप्त समाजसेवकों की व्यवस्था की गई है।
सड़क का सौंदर्य बढ़ाने के लिए सरकार ने जगह-जगह ‘नो पार्किंग’ और ‘टो अवे’ के बोर्ड लगाए हैं। इन बोर्ड्स के ठीक नीचे ई-रिक्शा चालकों ने अपना डिपो बना रखा होता है।
सड़क एवं परिवहन मंत्री ने ई-रिक्शा का आविष्कार करके महानगरों के वाहन चालकों को यह बताने का प्रयास किया है कि महाभारत के युद्ध में करोड़ों सैनिकों की भीड़ के बीच से रथ निकालकर ले जाने की कला जाननेवाला शख़्स महारथी क्यों कहलाता था।
इन सड़कों को देखकर कई बार ऐसा लगता है, मानो सड़क कह रही हो… ‘क्यों व्यर्थ घर से निकलता है? आख़िर कहाँ पहुँचना चाहता है? अब तक सड़कों की धूल फाँककर भी तू कहाँ पहुँच पाया है। तेरा घर ही तेरा असली ठिकाना है। तू कितनी भी दूर निकल जा, अंततः लौटकर इसी घर में आना है। तो जब यहीं लौटना तय है तो सड़कों पर निकलना ही क्यों… घर रहेगा, ईंधन बचेगा, टेलीविजन चला, व्हाट्सएप खोल, मेसेज फॉरवर्ड कर… जहाँ तू नहीं पहुँच पाया, वहाँ अपना व्हाट्सएप भेज दे। वैसे भी तू कोई सड़कों पर भटकने वाला सड़क छाप थोड़े ही है। यह भटकाव छोड़कर थोड़ा ठहर जा पगले! घर बैठ पगले!’

✍️ चिराग़ जैन

कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म

“मुझसे पूछा नहीं” – यह भाव किसी की भी नाराज़गी का सहज कारण हो सकता है। बल्कि यह कहा जाए कि दुनिया भर की सारी शिकायतों का अध्ययन किया जाए तो 70-80 प्रतिशत शिकायतों के मूल में यह भाव मिलेगा।
पहली बार इस भाव को सीधे-सीधे अभिव्यक्त करती हुई एक फिल्म आई है। पहली बार किसी फिल्म ने नारी-समानता के तमाम उपक्रमों को पुरुष के ठीक बराबर लाकर खड़ा कर दिया है।
“कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म” को आपने अगर एक लाइट कॉमेडी की तरह देखकर ख़त्म कर दिया तो समझ लीजियेगा कि आप गंगा किनारे से सूखे लौट रहे हैं। सामने खड़े पति को छोड़कर परमेश्वर से बतियाती स्त्री उस पुरुषप्रधान समाज पर सबसे तीखा कटाक्ष है, जिसे स्त्री की संवेदना सुनाई ही नहीं देती।
फिल्म का कहानीकार केवल मसाला परोसने के लिए कहानी को हरियाणा से निकालकर बरसाने की ओर नहीं ले गया है, वह एक ही समाज के दो अलग-अलग रंग दिखाकर स्त्री की सामाजिक स्थिति का अन्तर रेखांकित कर रहा है। एक ओर गोलियाँ बरसानेवालों के यहाँ घूंघट में छिपी स्त्री है और दूसरी ओर बरसानेवालों के यहाँ लाठी थामकर खड़ी गृहस्वामिनी है, जिसके आँगन में कोई बिना पैर धोए आ जाए तो वह कुपित हो जाती है। यह सशक्त स्त्री यह संदेश देना नहीं भूलती कि उसका साम्राज्य उसके आँगन तक है किन्तु जहाँ तक उसका साम्राज्य है, वहाँ तक उसका एकछत्र राज है। फिल्म में नायक का भाई, अध्यात्म को बाज़ार बनाकर बेचने की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य कर रहा है।
नायिका का भाई एक दृश्य में नायक को पीटता है। उसका कष्ट यह नहीं है कि नायक ने किसी लड़की को शादी से भगाया है, उसका कष्ट यह है कि नायक ने ‘उसकी बहन’ को भगाया है। समष्टि से चलनेवाले समाज मे व्यष्टि की यह व्याप्ति समाज की सोच पर प्रश्नचिह्न जड़ रही है।
और पुरुष प्रधान समाज के गाल पर सबसे करारा तमाचा फिल्म का वह दृश्य है जिसमें ऑडी की ड्राइविंग सीट पर बैठी नायिका से नायक कहता है कि मैंने गुंडों की बहन को भगा लिया है अब वो लोग मुझे नहीं छोड़ेंगे। इस पर नायिका बताती है कि तूने मुझे नहीं भगाया, मैंने तुझे भगाया है। पुरुष के कर्ताभाव के अहंकार पर इससे गहरा घाव शायद ही पहले कभी हुआ हो।
बहरहाल, व्यंग्य को इतने सलीके से परोसने वाली फिल्म बहुत समय बाद देखने को मिली है। हास्य का हल्का सा स्पर्श व्यंग्य की धार को कुंद किए बिना ही फिल्म की रोचकता में वृद्धि कर रहा है।
और भी अनेक दृश्य कटाक्ष की छुरी पर रखे, संदेश के शहद का आभास कराते हैं, लेकिन मैंने सब कुछ यहाँ लिख दिया तो आपको फिल्म देखने में मज़ा नहीं आएगा।
सो, जाइए फिल्म देखिए और कमेन्ट कर के बताइये कि कटाक्ष की यह चुभन कैसी लगी।

✍️ चिराग़ जैन

भाजपा आ गई

एक समय था
जब मीडिया वाले भी सच बोलते थे
सरकारी घोषणाओं की कलई खोलते थे
फिर हर तरफ बस एक ही तस्वीर छा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई

विश्वास करो भाईसाहब
पैट्रोल पंप पर सिर्फ़ ईंधन का व्यापार होता था
फिर आ गई भाजपा
अब वहाँ भी साहिब का प्रचार होता था

ईडी और सीबीआई
लोकतंत्र के सिपाही थे
अपराध और भ्रष्टाचार के लिए तबाही थे
फिर आ गई भाजपा
अब इनके रिमोट ख़ुद जिल्ले-इलाही थे
जो हमसे पंगा ले
उसी को रगड़ दो
कैसे भी करके उस पर एक चार्जशीट जड़ दो
बाद में कोर्ट में डाँट पड़ती हो
तो पड़ने दो
विपक्ष को जेल में सड़ने दो

ख़ुद भाजपा के कार्यकर्ता
सारी ज़िन्दगी मेहनत करते थे
कि कभी तो उनके भी झंडे तनेंगे
आडवाणी जी को उम्मीद थी
कि एक दिन वो कुछ बनेंगे
फिर देश में भाजपा आ गई
सारी उम्मीदों पर पानी फिरा गई

पहले रेलमंत्री रेल का उद्घाटन करते थे
विदेश मंत्री विदेशों में विचरते थे
फिर हर मंत्रालय की योजनाओं पर
एक ही तस्वीर छप-छपा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई

मंदिर, पद्मावत जैसे मुद्दे छाने लगे
महँगाई को विकास बताने लगे
रोज़गार, ग़रीबी जैसे मुद्दों को
गाय माता चबा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई

पहले उद्योगपतियों के टैक्स के पैसे से
सरकार भरती थी घाटा
लेकिन फिर लोकहित को करके टाटा
सरकारी कंपनियाँ
उद्योगपतियों की जेब में समा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई।

आते हुए जो सड़क बनी थी
वो जाने से पहले ही लड़खड़ा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई

संसद लीक, पेपर लीक
एयरपोर्ट की छत धड़ाम
खिलाड़ी, डॉक्टर, किसान सड़क पर
अधबने मंदिर में श्रीराम
करोड़ों की मूर्ति ध्वस्त
साहिब फोटो खिंचवाने में मस्त
दो-दो इंजन के बाद भी
ट्रेन पटरी को ठेंगा दिखा गई
कमाल ही हो गया
इस देश में भाजपा आ गई

✍️ चिराग़ जैन

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