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दिल में कोई कराह

बाक़ी नहीं है दिल में कोई कराह शायद मुद्दत हुई, हुए थे, हम भी तबाह शायद फिर से जहान वाले बदनाम कर रहे हैं फिर से हुई है हम पर उनकी निगाह शायद किस बात पर तू सबसे इतना ख़फ़ा-ख़फ़ा है तुझको कचोटता है तेरा गुनाह शायद फिर रेत पर लहू की बूंदें दिखाई दी हैं कोई ढूंढने चला है सहरा...

पनिहारी

पानी भरने को पनिहारी पनघट चली मटकिया मटकती कटि में दबात है गोरी के बदन की छुअन ऐसी मदभरी मदहोश गगरिया झूम-झूम गात है अंग-अंग में सुगन्ध ता पे मतवारी चाल मोरनी भी नत है, हिरनिया भी मात है चूम-चूम पतली कमरिया गुजरिया की गगरिया गोरी संग ठुमका लगात है क्वारी पनिहारी लिए...

स्वतन्त्रता

मन के मलंग मतवाले महानायकों की कुर्बानियों का परिणाम है स्वतन्त्रता स्वर की बुलन्दियों ने जो अदालतों में किया क्रान्ति का वो दिव्य यशगान है स्वतन्त्रता शहीदों ने भूख-प्यास सह के बचाया जिसे भारती का वही स्वाभिमान है स्वतन्त्रता लाल-बाल-पाल औ सुभाष जैसे ऋषियों की साधना...

आदमी मायूस होता है

हवस की राह चलकर आदमी मायूस होता है सदा आपे से बाहर आदमी मायूस होता है कभी मायूस होकर आदमी खोता है उम्मीदें कभी उम्मीद खोकर आदमी मायूस होता है न हो उम्मीद तो मायूसियाँ छू भी नहीं सकतीं हमेशा आरज़ू कर आदमी मायूस होता है हज़ारों ख्वाब बेशक़ बन्द ऑंखों में पलें लेकिन पलक...

बचपन

हँसी-ख़ुशी के वो लमहे हज़ार बचपन के कभी तो लौटते दिन एक बार बचपन के नहीं, दिमाग़ न थे होशियार बचपन के तभी तो दिन थे बहुत ख़ुशगवार बचपन के बड़े हुए तो बहुत लोग मिल गए लेकिन बिछड़ चुके हैं सभी दोस्त-यार बचपन के जो जिस्म को नहीं दिल को सुक़ून देते थे बहुत अजीब थे वो रोज़गार बचपन...

निश्छल सौंदर्य

उससे नहीं मिलूँ तो मन में बेचैनी-सी रहती है उसकी आँखों में इक पावन देवनदी-सी बहती है उसके गोरे-नर्म गुलाबी पाँव बहुत ही सुंदर हैं उसकी बातें निश्छलता का ठहरा हुआ समुन्दर हैं उसकी वाणी मुझको सब वेदों से सच्ची लगती है उसकी मीठी-मीठी बातें कितनी अच्छी लगती हैं वो न जाने...
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