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आधुनिक गणितज्ञ

माननीय आर्यभट्ट से कहीं आगे चीज़ हैं। वे एक और एक ग्यारह कभी नहीं करते, अपितु 5 और 6 ग्यारह करते हैं। प्लस का निशान (➕️) न दिखा तो 56; वरना 11 तो है ही..!
इन्होंने छोटी संख्या में से बड़ी संख्या को घटाने जैसे उल्टे-सीधे प्रयोग कभी नहीं किए। मामला हमेशा सीधा-सपाट रखा; बड़ी संख्या से छोटी को घटाना है। इस मामले में वे हमेशा क्लियर रहे हैं, मॉनीटर बनने से गुरु बनने तक!
सोच बड़ी है, इसलिए ‘अल्प’ और ‘बहु’ के बीच कोई प्रमेय सिद्ध करते समय पाइथागोरस ने अल्प से हमेशा बहु ‘त’ दूरी बनाए रखी है। कुछ विदेशी अल्पों के साथ वे निकट खड़े होकर फोटो खिंचा लेते हैं, क्योंकि तब उनकी संख्या में उनकी क्रय क्षमता जोड़ ली जाती है।
स्वयं को रामानुजन समझनेवाले ये महान गणितज्ञ गणित में अपवाद खोजनेवाले विश्व के प्रथम और एकमात्र व्यक्ति हैं। इन्होंने अनेक जोड़-तोड़ करके यह सिद्ध किया है कि- “चुनावी जीत का आँकड़ा हासिल करने के लिए कम पड़ रही संख्या में पार्टी फण्ड की कोई भी संख्या जोड़कर किसी को कहीं से भी तोड़ा जा सकता है। एक बार सरकार बनने के बाद इस जोड़े गए को निचोड़कर छोड़ देने का भी नियम है।”
कूटनीति के गणितीय सिद्धांत की गहन साधना के परिणामस्वरूप ये किसी भी लघुत्तम का नाम बदलकर महत्तम रखते हैं और अवसर के अनुसार उसे समापवर्त्य बना लेते हैं।
ऐसा कोई भी व्यक्ति जो इसके कद को आघात पहुँचा सकता है उसके पद को ‘घात’ देकर कोष्ठक में बंद करने में माननीय सिद्धहस्त हैं। बीजगणित के इतने उद्भट विद्वान हैं कि संख्या, मान, घात और कोष्ठक को अलग-अलग करके जोड़-घटा लेता है। भास्कराचार्य जानते हैं कि सूत्र के साथ चाहे कुछ भी करना पड़े किंतु सार में लाभ न दिखा तो यह असार संसार विस्तार से इनका ‘समूचा राजनीति शास्त्र’ तार-तार कर देगा।
चूँकि किसी बैंक का वार्षिक घाटा मित्र के नाम के आगे लिखी गई ऋणात्मक संख्या के बराबर होता है, इसलिए बैंक इनके मित्रों को ‘धन’ और धन्यवाद एक साथ प्रदान कर देते हैं। नीति आयोग की योजना के अनुरूप अब समूचे राष्ट्र में ‘बैंक’ शब्द को ‘धर्मशाला’ शब्द से रिप्लेस कर दिया जाएगा ताकि परिग्रही बैंककर्मी, घाटे में जा रही गीताप्रेस गोरखपुर का साहित्य ख़रीदकर आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हो सकें।
महान गणितज्ञ जानते हैं कि जब अंत में शून्य ही बचना है तो क्यों न छोटी-बड़ी तमाम संख्याओं को निपटाकर शून्य के विकास में हाथ बँटाया जाए!

✍️ चिराग़ जैन

कुएं में भांग

मन यह सोचकर आतंकित है कि हम उस स्थिति तक आ चुके हैं जहाँ कुँआ और खाई में से किसी एक को चुनने की विवशता है। एक ओर वे हैं, जिनसे छीनकर सत्ता भाजपा को दी गई थी और दूसरी ओर ये हैं जो ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि किसी भी कीमत पर इन्हें सत्ता से बाहर न किया जा सके।
हमें इन दो में से एक का चुनाव करना है। इनसे इनकी खामियों पर प्रश्न करो तो ये कांग्रेस की कमियाँ गिनाने लगते हैं। और कांग्रेस से उसकी गलतियों पर सवाल पूछो तो वे भाजपा के अपराधों की सूची थमा देती है।
जो भाजपा जीवन भर महबूबा मुफ्ती को ग़द्दार साबित करने पर तुली रही, वही कश्मीर में सत्ता के लिए उसी महबूबा मुफ्ती से गठबंधन कर लेती है। उधर, जैन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट में DMK के कुछ नेताओं का नाम आने पर कांग्रेस गुजराल सरकार पर दबाव बनाती है कि वह DMK को सरकार से बाहर करे। इंद्रकुमार गुजराल कांग्रेस की यह शर्त नहीं मान पाते तो कांग्रेस उनकी सरकार गिरा देती है। बाद में यही कांग्रेस उसी DMK के साथ गठबंधन कर लेती है।
बचपन से हम एक नेता का किस्सा सुनते आए हैं कि उसने किस तरह बुलडोजर चलाकर तुर्कमान गेट का इलाक़ा ख़ाली करा लिया था। उस सनक में यह तक नहीं विचारा गया कि रातोंरात बेघर हुए इतने लोग कहाँ पनाह लेंगे! अब यही बुलडोजर उत्तर प्रदेश में किसी और का डंका पीटने निकल चला है।
कांग्रेस ने एशियाड और कॉमनवेल्थ खेलों में पानी की तरह पैसा बहाया। भाजपा के हिस्से G20 सम्मेलन आया तो इन्होंने भी सारी कसर निकाल ली।
इंदिरा सरकार में सत्ता की आलोचना अपराध था। सरकार का विरोध करना जेल की यात्रा को निमंत्रण था। वर्तमान सरकार में सत्ता से कुछ पूछ लो तो पूरा सिस्टम और पूरी ट्रोल आर्मी आपके पीछे पड़ जाती है। केंद्रीय मंत्री पत्रकार को सर-ए-आम धमकी देती हैं कि मैं आपके मालिक से बात करूंगी।
रामदेव और अन्ना हज़ारे ‘जन आंदोलन’ करने लगे तो कांग्रेस सरकार ने बल प्रयोग किया। गांधी के देश मे सत्याग्रही को जेल में ठूस दिया गया। अब आदर्श अनुगामी की तरह किसान आंदोलन और पहलवान आंदोलन पर बल प्रयोग करने में सरकार बिल्कुल नहीं हिचकिचाई।
भाजपा ने अपनी ट्रोल आर्मी को अभयदान दे रखा है कि गांधी, नेहरू पर जितनी कीचड़ उछाल सकते हो, उछालो। इधर कांग्रेस ने भी सावरकर के अपमान पर यही नीति अपनाई हुई है।
कांग्रेस ने इंदिरा जी की हत्या के बाद हुई हिंसा को जस्टीफाई करने में शर्म नहीं की। इधर भाजपा ने भी गोधरा के वीभत्स हत्याकांड के बाद हुई हिंसा को बेशर्मी से जस्टीफाई किया।
कांग्रेस जब तक शासन में रही उसने 84 के नामजद आरोपियों को न केवल जेल की सलाखों से बचाए रखा, बल्कि उन्हें सत्ता का सुख देकर पुरस्कृत भी किया। 2002 के नामजद आरोपियों के साथ भाजपा भी ठीक यही कर रही है।
कांग्रेस ने के कामराज और पी वी नरसिम्हा राव के साथ जो व्यवहार किया, भाजपा ने वही व्यवहार लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ किया।
भाजपा को पानी पी पीकर कोसनेवाले कपिल मिश्रा आज भाजपा में माननीय हैं। उधर कांग्रेस में रहकर भाजपा से रोज़ ग़द्दारी का सर्टिफिकेट प्राप्त करने वाले सिंधिया और गुलाम नबी आज़ाद, आज कांग्रेस को भ्रष्टाचारी बताते फिरते हैं।
भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आनेवाले नेता कांग्रेसियों को ईमानदार लगते हैं और कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने वाले नेता भाजपाईयों को देशभक्त लगते हैं।
ऐसे और भी हज़ारों उदाहरण मिल जाएंगे। सत्ता की ओर दौड़नेवाले तभी तक सिद्धांतों की दुहाई देते हैं, जब तक वह सिद्धांत उनका पथ अवरुद्ध न करे। जनता इनसे भागकर उधर जाती है तो वे घाव पर मरहम लगाने के बहाने चिकोटी काटने लगते हैं। उनकी चिकोटी से त्रस्त होकर इधर आती है तो ये घाव सहलाने के बहाने छेड़खानी करने लगते हैं।
नागरिकों को विवेकयुक्त होकर आचरण करना होगा। सभी राजनैतिक दल सत्ता की रस्साकशी में व्यस्त है, प्रशासन शासन की उँगलियों पर कठपुतली की तरह ठुमक रहा है, न्यायपालिका शासन और प्रशासन की इच्छाशक्ति के अभाव में जर्जर हुई जा रही है और पत्रकारिता तलवार से यशगान लिखकर दिन काट रही है। ऐसे में अपने देश को बचाने की ज़िम्मेदारी नागरिकों के कंधों पर है l
हम जो कर सकते हैं, वह अभी इसी वक़्त से प्रारंभ करें। जहाँ तक सम्भव हो नियमों का पालन करें। धर्म-संप्रदाय और जातियों पर चर्चा न करें। शिक्षा, सफाई और रोज़गार पर ध्यान केंद्रित करें। अपने-अपने परिवार को सामाजिक विद्वेष के सोशल मीडिया प्रचार से बचाए रखें।
इन सब कार्यों को करने में जहाँ सिस्टम का भ्रष्टाचार अवरोधक बने, वहाँ स्वयं को गांधी बनाकर धैर्य और अहिंसा का मार्ग अपनाएं। जहाँ सत्ता तुम्हें विवशता के दोराहे पर खड़ा कर दे वहाँ सावरकर बनकर अपनी जान बचा लो, क्योंकि आप बचे रहे तो ही कुछ कर सकोगे। देश को गांधी और सावरकर ही नहीं; राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और अम्बेडकर भी चाहिएं। पढ़ो ताकि आपको बरगलाया न जा सके! समझो, ताकि आपको डराया न जा सके।

✍️ चिराग़ जैन

नफ़रत की फसल

घृणा और द्वेष के बीज अब फलने लगे हैं। विषबेल ने एक बड़े से वृक्ष को जकड़कर उसके प्राण सोखने प्रारंभ कर दिए हैं। रंग-बिरंगे फूलों से सजे उद्यान का हर फूल दूसरे रंग के फूलों से नफ़रत करने लगा है। किसी डाल को कटते देखकर अन्य डालियाँ ख़ुश होने लगी हैं। क्यारियों ने अपनी सोच सीमित करके अपने भीतर उग आए विजातीय बिरवे के घेरकर मारना शुरू कर दिया है।
अनुभवी बागवां इस माहौल से विचलित हैं। एक दिन, हमारे समाज ने संप्रदायों की कुल्हाड़ी से कटना स्वीकार किया था लेकिन आज जातियों के बुलडोजर, पंथ के फावड़े, परंपराओं की खुरपियाँ, विचारधाराओं की छुरियाँ और मतांतर की आरियाँ हमारे सौहार्द को खंड-खंड कर रही हैं।
‘फूट डालो, शासन करो’ की नीति से समाज का नहीं, राजनीति का भला होता है। यह सत्य जानते हुए भी हम बँटते जा रहे हैं। हिंदू-मुस्लिम के साम्प्रदायिक दंगों ने जातीय हिंसा तक पैर पसार लिए हैं।
किसी हादसे में पीड़ित की पीड़ा से पहले हम उसका धर्म और जाति देखना हमने कब सीख लिया, हमें पता ही न चला। उन्माद के इस आवेश में हम कब अपने ही आदर्शों की हत्या करने लग गए, हम समझ ही न सके।
हमें समझ ही नहीं आ रहा है कि डीपी पर श्रीराम की फोटो लगाकर जब हम दूसरों की पोस्ट पर माँ-बहन की गालियाँ लिखते हैं तो राम की मर्यादा का उल्लंघन कर रहे होते हैं। हमें समझ ही नहीं आ रहा है कि प्रोफाइल कवर पर नबी का कोई निशान छापकर जब हम किसी को ट्रोल करते हुए भद्दी भाषा लिखते हैं तब कुल इस्लाम की छवि पर धूल उड़ा रहे होते हैं। हम समझने को तैयार नहीं हैं कि नाम के आगे ‘जैन’ लिखकर जब हम किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन अथवा अनुमोदन कर रहे होते हैं तो महावीर की देशना का उपहास कर रहे होते हैं। हम सुनने को तैयार नहीं हैं कि ख़ुद बाबा साहब के अनुयायी कहकर जब कभी हम अराजक होते हैं तब बाबा साहब के संविधान का अपमान कर रहे होते हैं।
हिन्दू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, पटेल, ठाकुर, दलित और जितने भी समाज हैं उन सबमें राजनीति के कुछ रंगे सियार घुस आए हैं। ये स्वयं को समाज का उद्धारक घोषित करके समाज को विनाश के रास्ते पर धकेल देते हैं। ये रंगे सियार बच्चों को प्यार के बजाय लड़ाई-भिड़ाई करना सिखाते हैं। ये रंगे सियार आपको विज्ञान तथा शिक्षा का उपहास करना सिखाते हैं ताकि आपका विवेक जागृत न हो सके और आप अपने धर्मग्रंथों को वैसे समझें, जैसे ये रंगे सियार आपको समझाना चाहते हैं।
ये रंगे सियार आपको बताते हैं कि जो आपको प्यार से रहने की सीख देता है, वह आपका दुश्मन है; और आप मान लेते हैं। ये आपको सिखाते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव, सौहार्दपूर्ण वातावरण, शांति, भाईचारा और सहकार जैसे शब्द खतरनाक हैं; और आप मान लेते हैं।
इन सियारों के कहने पर आप अराजक हो जाते हैं। इन सियारों के कहने पर आप अपराधी हो जाते हैं। और जब पुलिस आपको पकड़ लेती है तो आप ही जैसे अन्य अंधानुकरणियों की ताक़त दिखाकर ये आपको थाने से छुड़ा लाते हैं और आप इनके एहसानमंद हो जाते हैं।
जब आप पूरी तरह इनकी गिरफ्त में आ जाते हो, तो ये रंगे सियार किसी दूसरे दल के सियार से गठबंधन करके अपने फ़ायदे के लिए आपकी ताकत बेच देते हैं। आप भी अपने अपने सियार का अनुसरण करते हुए ख़ुशी-ख़ुशी उसका जयकारा लगाने लगते हो, जिसको कल तक गाली देते फिर रहे थे। धीरे-धीरे धर्म पीछे रह जाता है और कोई एक रंगा सियार अपने कट-आउट से धर्म को ढक लेता है। धीरे-धीरे जाति के उद्धार का आंदोलन पीछे रह जाता है और एक सियार का चेहरा पूरे आंदोलन से बड़ा हो जाता है। और हम उस चेहरे की चुनावी जीत को ही अपने धर्म की जीत मानने लगते हैं। हम उस चेहरे की जीत को ही अपनी जाति की जीत मानने लगते हैं। हम उस चेहरे को ही राष्ट्र मानने लगते हैं।

इस लेख में कुछ नया नहीं है। ऐसे दर्जनों लेख पहले भी लिखे जा चुके हैं, लेकिन उन्माद के नक्कारखाने में सौहार्द की तूती इस उम्मीद से आवाज़ लगाती रहेगी कि कभी तो कोई कान नगाड़ों के हो-हल्ले में सरगम की मिठास सुन सकेगा। कभी तो सियारों की हुवा-हुवा के बीच कोयलों की कूक सुनी जाएगी। कभी तो कंस के जानकारों पर कृष्ण की बाँसुरी विजयी होगी!
✍️ चिराग़ जैन

बर्बरता का पहला आक्रमण

‘ख़ून का बदला ख़ून’ किसी सभ्य समाज के संचलन की नीति नहीं हो सकती। बर्बरता का पहला आक्रमण नैतिकता के आत्मबल पर होता है। और इस आक्रमण से बौखलाकर ज्यों ही आप अनैतिक हुए, उसी क्षण आपने बर्बरता का आत्मविश्वास दोगुना कर दिया।
भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने भाजपा विरोधियों की ट्रोलिंग प्रारंभ की। वे भाजपा, सरकार और प्रधानमंत्री के सम्मुख उठे हर सवाल पर गाली-गलौज तक उतरने लगे। इस प्रवृत्ति से विवेकशील और लोकतांत्रिक मस्तिष्क आहत हुए। लेकिन इनका आहत होना भाजपा की विजय नहीं थी। भाजपा की विजय उस क्षण प्रारम्भ हुई जब सत्य, तथ्य और लोकतांत्रिक तरीकों को छोड़कर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थक भी गाली-गुफ़्तार और चरित्र हत्या तक उतरते दिखाई दिए।
आज परिस्थिति यह है कि अगर आप किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं तो आप निष्पक्ष तथा लोकतांत्रिक नहीं रह सकते। आपको किसी एक दल अथवा व्यक्ति का अंध-समर्थन करना ही होगा। आप नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल में से किसी एक को भी देवदूत न मानकर तीनों को मनुष्य मानकर सरवाइव नहीं कर पाएंगे।
एक बार जिसके बैंक में आपने अपना विवेक समर्पित कर दिया उसकी स्तुति और उसके विरोधियों की भर्त्सना ही आपका धर्म है।
मैं आम आदमी पार्टी की किसी नीति या योजना पर प्रश्न पूछ लूँ तो यह मान लिया जाएगा कि मैं भाजपा का आदमी हूँ। मैं राहुल गांधी की यात्रा की प्रशंसा कर दूँ तो मुझे कांग्रेस का चमचा मान लिया जाएगा। मैं बग्गा की गिरफ्तारी के तरीके पर सवाल कर लूँ तो मुझे भगवंत मान और केजरीवाल का विरोधी घोषित कर दिया जाएगा। मैं बीबीसी के ऊपर हुई कार्रवाई का सवाल उठाने की सोचूँ तो मुझे कांग्रेसी मान लिया जाएगा।
मैं देश की महँगाई पर बोला तो मैं मोदी विरोधी और दिल्ली की ट्रैफ़िक व्यवस्था पर बोला तो केजरीवाल विरोधी। यहाँ तक कि आपराधिक मुआमलात पर चर्चा करने पर भी आपका राजनैतिक चरित्र जज किया जाने लगा है। आप हाथरस के बलात्कार कांड की भर्त्सना करो तो आप भाजपा विरोधी हैं। आप श्रद्धा-आफताब मुआमले के अपराधी को लानत भेजें तो आप भाजपा समर्थक हैं।
और आजकल तो लोग यहाँ तक लिखने लगे हैं कि दिल्ली का सीएम इतना पढ़ा-लिखा है, तेरी औक़ात नहीं है उसे कुछ कहने की’; ‘मोदी जी पर कुछ बोलने की औक़ात तेरी नहीं है’; ‘राहुल गांधी विदेश में पढ़ा है, उसकी सोच तू नहीं समझेगा -ये कैसा देश बना रहे हैं हम। ये किधर दौड़े चले जा रहे हैं हम?
देश का एक नागरिक अपने प्रतिनिधियों से सवाल क्यों नहीं पूछ सकता? वह अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को सलाह देने की औक़ात क्यों नहीं रखता? जिनका चुनाव मैं कर सकता हूँ उन्हें सुझाव क्यों नहीं दे सकता?
यदि विरोध की चरित्र हत्या करने की भाजपाई परम्परा को आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के समर्थकों ने पुष्ट न किया होता तो आज पवन खेड़ा और मनीष सिसोदिया के मुआमलात पर लोकतन्त्र इतना कमज़ोर न दिखाई देता। और भारतीय जनता पार्टी ने सिस्टम का उपयोग करके अपने विरोधियों की जड़ें खोदने का कार्य न किया होता तो किसी भी बग्गा की गिरफ्तारी से पहले पंजाब सरकार को लाख बार सोचना पड़ता।
मैं इस देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को पुष्ट किए जाने का प्रबल समर्थक हूँ। मैं स्पष्ट देख सकता हूँ कि यदि अपने पक्ष में हो रही अराजकता का मैंने समर्थन किया तो मेरे विरुद्ध हो रही अराजकता का विरोध मैं स्वयं नहीं कर पाऊँगा।
मूलभूत प्रश्नों पर आँखों में आँखें डालकर बोलना आवश्यक है। अन्यथा वो आपके सिसोदिया को उठाएंगे और आप उनके बग्गा को उठाते रहना। अन्यथा वो पठान में भगवा के अपमान का मुद्दा गढ़ते रहेंगे और आप नोटों पर देवी-देवताओं के चित्र लगवाने का पुंछल्ला छेड़ते रहना। अन्यथा वो आपके समर्थकों को गाली दिलवाते रहेंगे और आप उनके समर्थकों को गाली दिलवाते रहना।
✍️ चिराग़ जैन

भविष्य का अनुमान

किसी समाज के वर्तमान का आकलन उसके वैभव से किया जाता है, किंतु उसके भविष्य का अनुमान केवल उसके विवेक से लगाया जा सकता है। घटनाएँ और दुर्घटनाएं यदि समाज के लिए कुछ दिन तक न्यूज बुलेटिन की स्टोरी भर बनकर रह जाएं और उनसे बेहतर समाज के निर्माण का कोई विमर्श नहीं उपजे तो समझ लीजिए कि हमारी पीढ़ियां ख़तरे में हैं।
यह वर्ष प्रारंभ हुआ और देश की राजधानी में एक जीती-जागती लड़की सड़कों पर घसीटकर मार दी गई। पूस की सर्द रात में 12 किलोमीटर तक किसी इंसानी जिस्म के खुरदरी सड़क पर घिसटने की कल्पना से लोगों की रूह काँप गई।
सुबह होने से पहले लड़की दुनिया से जा चुकी थी और ख़बर दुनिया पर छा चुकी थी। अब शुरू हुआ हेडलाइंस और पब्लिक सिम्पैथी का घिनौना खेल।
न्यू ईयर के जश्न के तुरंत बाद मीडिया को एक सेंसेशनल स्टोरी मिली तो ‘पुलिस की लापरवाही’; ‘स्त्री सुरक्षा’ और बलात्कार जैसे शब्दों के साथ रिपोर्टिंग की जाने लगी। चूँकि ख़बर में पुलिस को विलेन बनाना था, इसलिए हर ख़बर में लड़की को ‘पीड़िता’ कहकर संबोधित किया जा रहा था।
दस बजते-बजते राजनीति गरमा गई और आरोपियों में से एक का भाजपा कनेक्शन भुनाने के लिए आम आदमी पार्टी एक्टिव हो गई। उधर दिल्ली के एलजी और केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने घटना पर अफसोस ज़ाहिर करते हुए दिल्ली पुलिस से घटना की अपडेट लेनी शुरू कर दी।
दो दिन तक मीडिया मृतका की माँ के रोते-बिलखते फुटेज, सौरभ भारद्वाज की प्रेस कॉन्फ्रेंस, दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों की प्रेस स्टेटमेंट और थाने के बाहर जमा भीड़ की बाइट चलाकर काम चलाता रहा। उस रात के चश्मदीदों की क्लिप भी हर तीन-चार मिनिट में रिपीट होती रही, जिससे यह सिद्ध हो रहा था कि दिल्ली पुलिस नाकारा है। कुछ बड़े चैनल्स ने स्कूटी से टक्कर और गाड़ी के नीचे फंसी लड़की की एनीमेशन भी चलाई। एक डिवाइडर से यू टर्न लेती गाड़ी की सीसीटीवी फुटेज भी सैंकड़ों बार चलाई गई। बारह किलोमीटर तक घिसटकर मर चुकी लड़की को मीडिया दो दिन तक घसीटता रहा।
अदालत में सुनवाई होने से पहले ही आरोपियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। पुलिस की चार्जशीट का तो पता नहीं लेकिन जल्दबाज़ रिपोर्टर्स ने उन्हें बलात्कारी कहने में देर नहीं लगाई।
लड़की की पहचान, उसके परिवार की पहचान, उसकी सहेली की पहचान सब कुछ मीडिया ने सार्वजानिक कर दी और विधि-पत्रकारिता के नियम-कायदे मुँह बाये देखते रह गए।
उधर एक आरोपी का भाजपा से सम्बंध होने के कारण भाजपा इस पूरे मुद्दे पर बैकफुट पर रही।
दो दिन बाद सुधीर चौधरी ने अपने ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में यह दावा किया कि कंझावला कांड में एक नया एंगल सामने आया है कि उस रात दुर्घटना में मरने वाली लड़की के साथ एक सहेली भी थी। सुधीर चौधरी ने यह भी बताया कि उस सहेली से उनके चैनल ने एक्सक्लूसिव बातचीत करके पता चला लिया है कि मृतका उस रात होटल के कमरे से शराब पीकर निकली थी और उसका उसकी सहेली से झगड़ा भी हुआ। होटल के स्टाफ से यह भी पता चल गया कि वह लड़की पहले भी इस होटल में आती रही है, कि उस लड़की से मिलने (थोड़ी देर के लिए) उसके पुरुष मित्र भी आए थे…!
इसके बाद अचानक सोशल मीडिया के ग्रुप्स में कुछ ऐसा पोस्ट किया जाने लगा जिससे ख़बर के प्रति लोगों का नज़रिया एकदम बदल गया। जो बिलखती माँ अपनी बेटी के हत्यारों को मृत्युदंड देने की मांग कर रही थी, वही अब अपनी मरी हुई बेटी को छीछालेदर से बचाने की कोशिश करती मिली।
मेरा प्रश्न यह है कि हम आख़िर कब तक इस प्रचार तंत्र के हाथों की कठपुतली बने रहेंगे? नीचे जो प्रश्न मैं पूछ रहा हूँ उनको गंभीरता से सोचकर अपने आप से उनके उत्तर पूछने का प्रयास करना :-
1. अगर वह लड़की किसी तथाकथित अपराध में लिप्त रही भी हो (जो सुनिश्चित करना न्यायालय का कार्य है) तो भी क्या उसे मार देने की छूट किसी अन्य नागरिक को दे देनी चाहिए?
2. अगर वह नशे की हालत में किसी गाड़ी से टकरा ही गयी थी, तो भी क्या उसे 12 किलोमीटर तक सड़क पर घसीटना जस्टीफाई किया जा सकता है?
3. रात के समय यदि कोई लड़की सड़क पर किसी भी स्थिति में मृत पाई जाए, तो क्या उस स्थिति में यह मान लेना चाहिए कि उसका बलात्कार ही हुआ होगा?
4. इस दुर्घटना के बाद क्या हमारे समाज को इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए कि देर रात तक बाहर रहने वाले लोगों की गतिविधियों पर कम से कम पारिवारिक अंकुश की पहल की जाए।
5. स्कूटी पर जा रही स्त्री हो या गाड़ी में घूम रहे पुरुष; दोनों ही के लिए भीषण सर्दी की रात में सुनसान सड़कों पर निकलना असुरक्षित क्यों नहीं है?
6. पुलिस की मुस्तैदी और कार्यशैली पर पूरी व्यवस्था को गंभीरता से पुनर्विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
7. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिसकर्मी से शिकायत करने पर यदि पुलिसवाला उल्टे आपको ही डाँटकर भगा दे तो आप कुछ नहीं कर पाते।
8. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिस अपनी जनता से सुरक्षाकर्मी जैसा नहीं अपितु तानाशाह जैसा व्यावहार करती है।
9. क्या यह सत्य नहीं है कि आरोपियों में एक व्यक्ति के भाजपा सम्बंध से भाजपा विरोधियों को ‘अवसर’ मिल गया?
10. क्या यह सत्य नहीं की लड़की की सहेली की गवाही से भाजपा समर्थकों को ‘अवसर’ मिल गया?
11. क्या यह सत्य नहीं कि हमें हमारी सड़कों को दिन-रात सुरक्षित और निर्भय बनाए रखने के प्रयासों को वरीयता देनी चाहिए।
12. क्या यह आवश्यक नहीं कि इस घटना की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया को मनुष्य होने की न्यूनतम अर्हता का ध्यान रखना चाहिए!
मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले यह अच्छी तरह जाँच लें कि आप जो लिखने जा रहे है वह खुले हुए ज़ख़्म पर मरहम लगाने जैसा है, यदि आपकी उंगली ने रिसाव के किसी भी संवेदनशील तन्तु को छू दिया तो घाव की टीस, चित्कार बनकर मनुष्यता के कान फोड़ देगी!

✍️ चिराग़ जैन

मुनाफ़े का रन-वे

विमानन सेवाओं ने मुनाफ़े को वरीयता देते हुए यात्रियों के कष्टों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया है। आप जब कोई फ्लाइट बुक करते हैं तो उसके हिसाब से आगे का कार्यक्रम तथा बुकिंग भी प्लान करते हैं। जब सब कुछ तय हो जाता है तब अचानक पता चलता है कि एअरलाइंस को सवारी कम मिली, इसलिए उसने आपसे बिना पूछे आपको किसी अन्य फ्लाइट में शिफ्ट कर दिया है। इस बदलाव से आपका यात्रा का उद्देश्य, आपकी आगे की यात्रा तथा आपका सुख-चैन ध्वस्त होता हो तो होता रहे। जब आप एयरलाइंस के ऑफिस में फोन करके इस असुविधा की शिकायत करते हैं तो वहाँ आईवीआर की तरह रटे हुए वाक्य बोलनेवाले मनुष्य आपसे कुल तीन वाक्यों में बात करते हैं:
1. आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है।
2. आप यदि यात्रा नहीं करना चाहते तो आपको फुल रिफण्ड मिलेगा।
3. सॉरी, सर यह कंपनी पॉलिसी है, इसमें हम आपकी कोई सहायता नहीं कर सकते।
इन तीन वाक्यों के बल पर वे आपका रक्तचाप अपने हवाई जहाज से भी ऊँचा पहुँचाकर फोन काट देते हैं।
फ्लाइट कैंसिलेशन के कारण बताते हुए ‘ऑपरेशनल रीज़न’ लिखकर काग़ज़ की ख़ाना-पूर्ति कर दी जाती है।
आप परेशान होकर अन्य फ्लाइट विकल्प देखते हैं तो अन्य एयरलाइंस की टिकट ‘आपदा में अवसर’ तलाशते हुए दो-तीन गुनी बढ़ चुकी होती है। अब आपको समझ नहीं आता कि फुल रिफण्ड देनेवाली एयरलाइंस का धन्यवाद किन शब्दों में ज्ञापित करें!
मैं ऐसी ही एक एयरलाइंस से फुल रिफंड लेने की ख़़ुशी मनाता हुआ, तीन गुना किराया और चार गुना समय नष्ट करके वाराणसी से चेन्नई जा रहा हूँ। रास्ते में चार घण्टे बंगलोर हवाई अड्डे पर बैठकर इतनी दयावान विमानन सेवाओं के प्रति कृतज्ञ महसूस करूंगा।
न्यायालय में इस प्रकार के मुक़द्दमों के भाग्य में सिवाय धूल के कुछ नहीं है। प्राधिकृत नियामकों को नैतिक-अनैतिक तरीक़े से विमानन सेवाओं से उगाही करने से फ़ुर्सत नहीं मिलती। लोक कल्याणकारी सरकारों ने ये सब सेवाएँ निजी हाथों में बेचकर अपना पल्ला झाड़ ही लिया है।
चूँकि सरकार सर्वज्ञ होने के साथ-साथ स्थितप्रज्ञ भी है, अतः वह यह सारा खेल जानते हुए भी अपनी वेदी पर चढ़नेवाले चढ़ावे से आगे देखने का प्रयास नहीं करती। जनता के दुःख-दर्द में यदि सरकार हस्तक्षेप करेगी तो जनता अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने की इम्यूनिटी नहीं जुटा पाएगी, इसलिए सरकार जनता को मुनाफ़ाखोरों के आगे फेंककर अपने हिस्से का चढ़ावा चबाते हुए जनता के संघर्ष का खेल देखती रहती है।
हाल ही में जिस सरकारी एयरलाइंस को निजी हाथों में बेच दिया गया है, उसमें नए मालिक ने आरटीआई और जन-शिकायतों की सारी फाइलें नष्ट करके ये दोनों विभाग बंद कर दिए हैं। जनता के प्रति उत्तरदायित्व का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता।
आम नागरिक इस बात से ख़ुश है कि विमानन सेवाओं के किरायों से लेकर मनमानी तक, कहीं कोई अवरोधक नहीं है… देश सही दिशा में विकास कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

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