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पुलिस और जनता के बीच का रिश्ता

सोशल मीडिया पर इन दिनों प्रशासन और जनता के बीच टकराव के बेशुमार वीडियो अपलोड हो रहे हैं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस देश के लगभग प्रत्येक नागरिक ने किसी न किसी चौराहे पर, किसी न किसी थाने में या किसी न किसी सड़क पर किसी पुलिसकर्मी का दुर्व्यवहार झेला है।
सभ्य नागरिक से सभ्यता से बात करनेवाले पुलिसकर्मियों की संख्या निश्चित रूप से बहुत कम है। यदि देश एक परिवार है तो पुलिस इस परिवार की वह चिड़चिड़ी भाभी है, जो सबके साथ ही अभद्र व्यावहार करती है, और अब लोगों ने उसकी आदतों का बुरा मानना बंद कर दिया है।
आप परिवार के साथ कहीं जाओ चाहे अकेले हो, पुलिसकर्मी ने यदि आपको रोक लिया तो आपका चेहरा उतर ही जाना है। बड़े-बुजुर्ग अपनी पीढ़ियों को समझाते हैं, ‘पुलिसवाले से मत उलझो, वरना जीना हराम हो जाएगा।’
जबकि सत्य यह है कि भारत में जो लोग पुलिस की वर्दी पहनकर कानून के प्रतिनिधि बनकर घूम रहे हैं, वे कहीं दूसरे ग्रह से नहीं आए हैं। वे हमारे ही परिवारों के बेटे-बेटियाँ हैं।
यह भी सत्य है कि जनसंख्या के अनुपात में पुलिसकर्मियों की संख्या इतनी कम है कि लगभग हर थाने में हर पुलिसकर्मी के पास पेंडिंग फाइल्स की भरमार रहती है।
न्यायपालिका, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं की फटकार झेलते हुए, इन पुलिसकर्मियों की विनम्रता भड़ास बन गई है। और यही भड़ास इनकी बोली और गालियों के माध्यम से आम आदमी पर बरसती रहती है।
सड़क पर ड्यूटी करते किसी कांस्टेबल या सबइंस्पेक्टर से आप तब तक सभ्य व्यवहार की अपेक्षा नहीं कर सकते, जब तक आप स्वयं कोई तोप न हों, या फिर वह आपको व्यक्तिगत रूप से पहचानता न हो।
इन परिस्थितियों का दुष्परिणाम यह है कि कांस्टेबल, सब इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर स्तर के पुलिसकर्मियों को उनके उपरवालों से सम्मान नहीं मिलता और जनता से प्यार नहीं मिलता। दुर्भाग्यवश पुलिस महकमे में यही वह तबका है, जिसका आम जनता से सामना होता है।
ऐसे में जनता और प्रशासन के मध्य परस्पर घृणा का माहौल बन चुका है। पुलिसकर्मी आम आदमी को उसके मुँह पर गाली देता है और आम आदमी पुलिसकर्मियों को उनकी पीठ पीछे गाली देता है।
कानून के क्रियान्वयन के लिए पुलिसकर्मियों को यदि हथियार और अधिकार नहीं थमाए गए तो अपराध नहीं रुक सकते। किन्तु जिनकी रक्षा के लिए पुलिसकर्मियों को अधिकार और हथियार सौंपे गए हैं, उन्हीं के अधिकारों का हनन करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
प्रथम दृष्टया ही प्रत्येक नागरिक को अपराधी मान लेने की प्रेक्टिस इतनी पक चुकी है कि अब पुलिसकर्मी, किसी समान्य नागरिक से भद्र व्यवहार करना अपनी तौहीन समझने लगे हैं।
मैंने सामन्यतः पुलिसकर्मियों को सहज या सरल आचरण करते हुए कम देखा है। वे मुझे अक्सर दो ही परिस्थितियों में दिखाई देते हैं, या तो वे किसी पर चढ़े हुए होते हैं, या फिर उन पर कोई चढ़ा हुआ होता है।
45 डिग्री की गर्मी से लेकर, हाड़ कंपाती सर्दी और मूसलाधार बारिश तक ड्यूटी पर मुस्तैद रहनेवाले इस पुलिसकर्मी की समाज में यह दुर्दशा क्यों हो गई कि जिस जनता की सुरक्षा के लिए ये खाकी पहनकर घर से निकलते हैं, वही जनता इनके प्रति क्रुद्ध और क्षुब्ध है।
चौकीदार किसी भवन के गेट पर आपको रोककर रजिस्टर में एंट्री करने को कहता है और आप चिढ़ जाते हैं, तो आप समझ लें कि आप अराजक नागरिक है। आपकी और आपके समाज की सुरक्षा के लिए आपके मार्ग में अवरोधक लगाना उसकी विवशता है। किन्तु 100 रुपये का नोट आपसे वसूलने के लिए उन अवरोधकों का दुरुपयोग करनेवाला पुलिसकर्मी भी सामाजिक आचरण को अराजक बनाने का अपराधी है।
यदि खेत ही बाड़ से चिढ़ेगा तो फसल की सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी, लेकिन यदि बाड़ ही खेत को खाने लगेगी तो पूरा खेत ध्वस्त हो जाएगा।
पुलिसकर्मियों से बातचीत शुरू होते ही कैमरे ऑन करनेवाले लोग इस बात के प्रमाण हैं कि पुलिस महकमे ने जनता के साथ दुर्व्यवहार किया है। परिस्थितियों के किसी भी झरोखे से झाँक लो, गाली, मारपीट, अपमान और रिश्वतखोरी से त्रस्त जनता कानून के इन पहरेदारों से सहज नहीं हो सकेगी।
सिंघम जैसी फ़िल्में देखकर जनता ने यह तो समझ लिया कि पुलिसकर्मियों का जीवन आसान नहीं होता। सिंघम जैसी फ़िल्मों ने यह तो समझा दिया कि राजनैतिक दबाव, विभागीय भ्रष्टाचार और अपने वेतन-भत्तों की हकीकत के बीच ड्यूटी करना कितना कठिन है। लेकिन इतनी सी बात आज तक इस देश की जनता समझ नहीं पा रही कि किसी नागरिक से गाड़ी के काग़ज़ मांगते समय उससे बदतमीजी करना क्यों आवश्यक है। किसी का अपराध सिद्ध होने से पहले ही उसे अपराधी मान लेने की आदत किस विवशता का परिणाम है।

✍️ चिराग़ जैन

पत्रकारिता का काला दिन

आज जंतर-मंतर पर जो भीड़ जुटी है, वह कल क्या कर पाएगी, इस प्रश्न का उत्तर तो भविष्य की कुक्षि में छिपा है, लेकिन उसने आज-आज में भारतीय समाचार चैनल्स की चेहरे को जितना नंगा कर दिया है, वह पिछले दस-बारह वर्ष में कभी इतनी साफ़गोई से नहीं हो सका था।
आज के दिन की रिपोर्टिंग को देखकर यह साफ़ कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया सरकार की पीआर एजेंसी के रूप में कार्य करती है। और तथ्यों को न केवल छिपाती है बल्कि पीत पत्रकारिता करके, झूठ बोलकर सरकार के पक्ष में माहौल बनाने का हर संभव प्रयास करती है।
सरकार की पब्लिक इमेज को बनाए रखने के लिए समाचार चैनल्स को झूठ की जितनी घिनौनी तस्वीर पेश करनी पड़े, वह करेगी।
आज की रिपोर्टिंग के तीन स्तर हैं। प्रथम, दीपके की चरित्र हत्या। द्वितीय, समर्थकों को इस-उस दल का कार्यकर्ता सिद्ध करना। तृतीय, भीड़ के चित्रों से बचते हुए सौ-पचास लोगों की उपस्थिति रिपोर्ट करके यह सिद्ध करना कि आंदोलन फुस्स हो गया है।
मैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आंदोलन से नहीं जुड़ा हूं। किन्तु मैंने अपने जीवन के पांच साल तक पत्रकारिता तथा जनसंचार की पढ़ाई की है। मैंने भारतीय पत्रकारिता का जितना समृद्ध और प्रभावी इतिहास पढ़ा है, उसके झरोखे से जब मैं आज की पत्रकारिता को देखता हूं तो मुझे यह तस्वीर और भी अधिक कुत्सित नज़र आती है।
दिन को दिन और रात को रात कहने का दायित्वनिर्वहन करती हुई पत्रकारिता ने अपने इस कर्तव्य से मुंह मोड़ लिया है। यदि यह मान ही लिया जाए कि शासन के दबाव तथा व्यावसायिक घरानों के राजनैतिक हितों की मजबूरी में कई बार शाम को रात कहने वाली पत्रकारिता दरअस्ल विवश है। किन्तु भरी दोपहर को रात कहने में तो थोड़ी सी लज्जा चेहरे पर उतर ही आनी चाहिए थी।
जिन न्यूज़ प्रेज़ेंटर्स ने दस-पन्द्रह से सौ-पचास और चार-पांच सौ तक की संख्या बताकर देश के युवाओं के इस प्रयास का उपहास किया है। अगर यह ख़बर पढ़ते हुए उनकी नज़रें भी नीची हुई होतीं तो मैं उनकी विवशता को क्षम्य मान सकता था।
लेकिन जिस ढिठाई से आन्दोलन को विवश बताया गया। मेन स्ट्रीम रिपोर्टिंग से आंदोलन को नदारद किया गया, वह भारतीय पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास के मुख पर कालिख पोतने जैसा कृत्य है।
सुना है, कभी एक मशहूर एंकर शराब पीकर लड़खड़ाते हुए जनरल रावत के निधन का समाचार पढ़ते पाए गए थे। विश्वास मानिये, उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, एक पत्रकार बाकायदा खबरों की दलाली करते कैमरे में कैद हुए, बाकायदा जेल होकर आए। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, नोटबंदी के दौर में नए नोट के पक्ष में माहौल बनाते हुए नए नोट में चिप होने की ख़बर प्रसारित हुई थी। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
लेकिन आज तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने गिरने की हर मार्यादा लांघकर बाकी के तीनों स्तंभों को धराशायी करने का कुचक्र रच दिया। आज हिंदी पत्रकारिता के जनक पंडित जुगल किशोर की आत्मा बहुत कष्ट में होगी।
अंग्रेज सरकार से डरे बिना भारतीय समाज को जागृत करने के प्रयास में जेल जानेवाले पत्रकारों को आज यह देखकर कैसा लग रहा होगा कि उनकी वंशबेल ऐसे क्लीवस्वभावी प्राणियों से जा लिपटी है, जिन्हें कोरा झूठ बोलने में लेशमात्र भी संकोच नहीं होता।
हालांकि निर्लज्जता के उत्कर्ष तक जा पहुंचे पत्रकारों से कोई उम्मीद तो नहीं है लेकिन यह याद दिलाने का दुस्साहस कर रहा हूं कि इस देश में उपहार सिनेमा की ख़बर पढ़ते समय सुरेन्द्र प्रताप सिंह की हृदयगति रुक गई थी। याद दिलाना चाहता हूं कि आपातकाल के विरोध में जनसत्ता ने पूरा पेज काला छापकर सरकार का मुखर विरोध किया था।
मैं यह अपेक्षा कतई नहीं करता कि आज की पत्रकारिता सरकार की किसी नीति का विरोध कर सकेगी। लेकिन इतनी अपेक्षा तो थी ही कि ये सच से ठीक 180 डिग्री मुंह फेरकर सफेद झूठ बोलते अपने आकाओं को ख़ुश करने में नहीं हिचकिचाएंगे।
मैं सोच नहीं पाता हूं कि इन लोगों का सामना जब अपने बच्चों से होता होगा, तो क्या इनका दिल दहल नहीं जाता होगा कि अपने नौनिहालों के लिए वे कैसे भारत का निर्माण कर रहे हैं।
सरकारी योजनाओं का विज्ञापन, सरकारी ईवेंट्स की ईवेंट कवरेज तक जिन पत्रकारों की पूरी क्षमता सिमटकर रह गई है, उन्हें अपने घरों में एक आईना ज़रूर रखना चाहिए, ताकि कभी गाहे-बगाहे उन्हें अपनी शक्ल दिखाई दे जाए तो याद कर सकें कि कभी उनकी आंखों में भी हया हुआ करती थी।

✍️ चिराग़ जैन

समय बहुत नाज़ुक है

एक पत्रकार ने अध्यापकों की कौड़ी गिन दी और पूरा समाज उस पत्रकार के विरोध में खड़ा हो गया। एक प्रशासनिक अधिकारी ने ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया और युवाशक्ति ने रातोंरात एक डिजिटल क्रांति खड़ी कर दी।
शिक्षा के दोनों छोर एक साथ छेड़े गए और एक पूरे समाज के सिले हुए होंठ खुल गए। इस क्रांति का भविष्य क्या होगा यह तो कहना कठिन है, किन्तु इन दोनों प्रकरणों ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि संभावनाएं और आशंकाएं क्षीण हो सकती हैं किन्तु समाप्त कभी नहीं होती।
सोशल मीडिया पर विचरण करते हुए पाता हूं कि देश में किसी क्रांति जैसा माहौल है। रवीश कुमार से लेकर खान सर तक कोई भी ऐसी बात नहीं कह रहा है, जो समाज जानता न हो, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि बातें कही जाने लगी हैं। कब तक कह पाएंगे और कहां तक सुनी जाएंगी… यह कहना जल्दबाज़ी होगी।
इस दौर में अट्टालिकाओं के अहंकार से त्रस्त समाज से मैं यह अपेक्षा अवश्य करूंगा कि इस बार अपने विवेक से समझौता मत करना। सिस्टम का विरोध ही सही, लेकिन किसी के भी पीछे चलने से पहले यह समझ लेना कि कहीं हमारा नेतृत्व करनेवाला भी अपने किसी हितसाधन के लिए हमें भीड़ की तरह ‘इस्तेमाल’ तो नहीं कर रहा है।
कहीं श्वेत परिधानी बाबा का रिमोट किसी चालाक प्रशासनिक के हाथ में तो नहीं है। किसी के सुर में सुर मिलाने से पहले यह अच्छी तरह पड़ताल कर लेना कि कहीं इस सुरीले क्रांतिकारी के सुरों का कोई सप्तक किसी दूसरे आततायी के चरणों में जाकर विलीन तो नहीं हो रहा है।
‘जन’ एक महत्वपूर्ण शब्द है। दुनियाभर में अब राजनीति को इस ‘जन’ की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस जन को एकत्रित करके शातिर लोगों ने जैसे-जैसे धोखे किए हैं, उनसे सबक लेकर इस बार कदम मिलाकर भी चलना आवश्यक है और कदम संभालकर भी…।
मुझे याद है कांग्रेस सरकार के समय राहुल गांधी ने एक बयान दिया था कि मध्यम वर्ग कैटल क्लास की तरह सफ़र करता है। इस बयान पर खूब हंगामा हुआ था। राहुल गांधी के विरुद्ध लोगों का गुस्सा फूटा था। उस समय कांग्रेस के सत्ताजनित अहंकार के परिणामस्वरूप प्रत्येक ख़बर लोगों की भावनाओं को आहत करती थी।
अब भी लगभग वही माहौल है। बस तब जनता बोलती थी, आज बोलने पर अनकही-सी मनाही है। पानी को अगर सही तरीके से निकलने का रास्ता न मिले तो वह पाइप फोड़कर निकलता है। हालांकि मैं फिर भी इस बात पर अडिग हूं कि किसी भी तरह की अराजकता अंततः हानिकारक ही सिद्ध होती है। यह बात सिस्टम को भी समझनी होगी और जनता को भी। सिस्टम को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि अपेक्षा, बात और शिकायत दरअस्ल सिस्टम का विरोध ही हैं। ठीक इसी तरह जनता को भी यह समझना होगा कि प्रशासन चलाते समय कहा गया हर शब्द अभिधा नहीं होता।
एक और महत्वपूर्ण बात। यदि केवल अध्यापकों को राष्ट्रप्रेमी, ईश्वर के अवतार और ऐसे ही हाइपोथेटिकल विशेषणों से नवाज़ने का सिलसिला ज़ोर पकड़ गया तो मूल विषय धूमिल हो जाएगा। जैसे किसान आंदोलन के समय हुआ। जैसे डॉक्टरों की हड़ताल के समय हुआ। जैसे खिलाड़ियों के समय हुआ।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर मनुष्य में कुछ खामी हो सकती है। जिस देश में डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अध्यापक हुए हैं उस देश में कोई अध्यापक भ्रष्ट हो ही नहीं सकता, इस सामान्यीकृत धारणा से अपने समाज को बचाना आवश्यक है। और जिस देश में एक पत्रकार दारू पीकर लड़खड़ाती हुई एंकरिंग करता हुआ रिकॉर्ड हुआ है, उस देश में सभी पत्रकार दारुड़िये हैं, यह धारणा भी अपरिपक्व है। मेरा तो मानना है कि जो पत्रकार दारू पीकर न्यूज़ पढ़ता हुआ मिला है, वही पत्रकार कभी सत्ता की आंखों में आंखें डालकर प्रश्न करता हुआ मिल जाए तो उसका उस विशेष साहस के लिए सम्मान किया जाना चाहिए। और फिर वही पत्रकार किसी दिन पीत पत्रकारिता करता पाया जाए तो उसी पत्रकार की आलोचना होनी चाहिए।
पत्रकारों को यह बात समझनी पड़ेगी कि जनता का जो गुस्सा इस समय पत्रकारिता के विरुद्ध आंधी की तरह फूट रहा है, वह किसी एक पत्रकार की एक स्टेटमंेट का परिणाम नहीं है। पत्रकारों को यह याद करना होगा कि इस देश ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी सरीखे पत्रकारों को देखा है। इस देश की पत्रकारिता ने साहस और नैतिकता के इतने बड़े प्रतिमान खड़े किए हैं कि व्यावसायिकता और सत्ता के दबाव से उत्पन्न आपकी कोई भी विवशता यह देश नहीं समझ सकेगा। इसलिए अपनी रिपोर्टिंग में दबाव का अनुपात आटे में नमक जितना ही रखें। इससे अधिक दबाव दिखा तो खानेवाला आपकी रसोई के कौर को थूक देगा।
✍️ चिराग़ जैन

अपने-अपने त्योहार, अपनी-अपनी गालियाँ

भारत की राजनीति में आजकल ऑफ बीट सेक्युलरिज्म का दौर चल रहा है। सबने अपने-अपने महापुरुषों और अपने-अपने त्योहारों का कॉपीराइट करा लिया है। इसलिए जब भी कोई त्योहार आता है तो हर खेमे के लोग अपने-अपने कलैंडर खोलकर बैठ जाते हैं और उसके जवाब में अपने किसी महापुरुष की कोई घटना लेकर ताल ठोक देते हैं।
जिस खेमे का त्योहार होता है, उसकी ओर से बधाइयों के मैसेज भेजे जाते हैं और बाकी सारे खेमे एकजुट होकर उन बधाइयों के नीचे गालियाँ लिखने का काम करते हैं। इस तरह सबके मिले-जुले परिश्रम से सोशल मीडिया कंपनियों पर चांदी बरस रही है।
अभी 25 दिसंबर के दिन यही स्थिति बनी। स्वयं को सेक्युलर समझनेवालों ने बड़े दिन के अवसर पर अपने बड़े दिल का प्रदर्शन करने के लिए चैटजीपीटी की मदद से क्रिसमिस के सजावटी पोस्टर तैयार किये और डायरेक्ट मदर मेरी के आंगन में बधाइयाँ गाने पहुँच गए।
उनकी यह हरक़त भाजपा की सोशल मीडिया आर्मी को रास नहीं आई और उन्होंने सैंटाक्लॉज़ को ट्रोल करने के लिए कमर कस ली। जहाँ-जहाँ सैंटा, जीसस या क्रिसमिस लिखा दिखा, वहाँ-वहाँ कार्यकर्ताओं माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की सौवीं जयंती का पोस्टर चिपका दिया।
हर पोस्ट के साथ यह कहते हुए लानत भेजी जाने लगी कि, ‘पश्चिमी सभ्यता के त्योहार याद रहे और अपने अटल जी की जयंती को भूल गए।’
ये और बात है कि किसी महापुरुष को भूल जाने की लानत भेजनेवाले ख़ुद महामना मदनमोहन मालवीय जी की जयंती को भूले हुए थे। बहरहाल, क्योंकि अटल जी को हथियार बनाकर सोशल मीडिया की वार में अपना पलड़ा भारी पड़ रहा था तो मालवीय जी को परेशान करने की क्या ज़रूरत थी?
इधर भाजपा अटल जी की सौवीं जयंती का पांचजन्य बजा चुकी थी, उधर एक अलग खेमा पहले ही गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्रों की कुर्बानी को याद करने का अभियान छेड़ चुका था। इस खेमे का जोश इतना अधिक था कि 26 दिसंबर की घटना से ही 25 दिसंबर के त्योहार को चारों खाने चित्त कर दिया गया था।
क्रिसमस का उत्साह दीवार में चिन गया और भाजपा ने अटल जी की जन्मशती का उत्सव धूमधाम से मना लिया।
उधर कट्टर सेक्युलरों ने भी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी-अपनी हार्डडिस्क का हज़ारों टीबी डाटा खंगाल मारा और भाजपा नेताओं की चर्चप्रेयर की तस्वीरें खोज-खोजकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दीं।
त्योहार का उत्साह ऐसा रहा कि सबने एक-दूसरे को धूमधाम से गालियां देकर रात काट दी। सुबह फेसबुक मेमोरी ने याद दिलाया कि इसी 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में पिछले साल ज़ोर-शोर से मनाया गया था। तुलसी मैया इस वर्ष भी अपने पूजन के महामहोत्सव की राह तकती रह गईं लेकिन सोशल मीडिया आर्मी को इस बार अपने आंगन की तुलसी दिखाई ही नहीं दी।
अपने-अपने त्योहार के शुभ अवसर पर सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगे हैं। गले मिलने के अवसरों पर हम गिरेबान में झाँकने की नसीहतें देने लगे हैं। उपहार के मौकों पर उपहास की गुंजाइश तलाशी जा रही हैं। उत्साह और उन्माद के बीच का अंतर समाप्त हो गया है। और जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ये महाभारत जारी है, उन्हें दीपावली, ईद और क्रिसमिस में कोई अंतर नज़र नहीं आता।

✍️ चिराग़ जैन

कांग्रेस, कर्नाटक और नाटक

सोशल मीडिया पर एक विपक्षी ने मोदी जी के उन भाषणों का वीडियो पोस्ट कर दिया जिनमें वे गिरते रुपये के मुद्दे पर केंद्र सरकार को कोस रहे हैं। वीडियो देखकर एक भाजपाई भड़क गया। उसने कमेंट में लिखा- ‘ज़्यादा अर्थशास्त्री बनने का नाटक मत करो और अपना कर्नाटक संभालो।’
राजनैतिक गलियारों में जो दल दूसरे को नंगा करने निकलता है, वह अपने कपड़े पहले ही उतार चुका होता है। इससे किसी और के हाथों नंगा होने का ख़तरा टल जाता है।
कर्नाटक-कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर रस्साकशी चल रही है। दक्षिणपंथियों को यह देखकर सुकून मिल रहा है कि दक्षिण में कांग्रेस का कोई मध्यममार्ग नहीं निकल पा रहा है।
डीके शिवकुमार किसी गुप्त समझौते की बात कर रहे हैं। उधर सिद्धारमैया यह सिद्ध करने पर तुले हैं कि जब तक सरकार रहेगी, तब तक वे ही मुख्यमंत्री रहेंगे। कर्नाटक से संबंध रखनेवाले कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा एक आधिकारिक बयान दिया गया जिसमें कवि का तात्पर्य यह था कि कर्नाटक के विषय में अंतिम निर्णय राहुल गांधी जी विदेश से लौटकर लेंगे।
जब गुत्थी सुलझने को तैयार नहीं हुई तो अध्यक्ष महोदय ने गुत्थी की गेंद बनाकर थर्ड अम्पायर के पाले में फेंक दी।
राहुल गांधी एक जेब में हाथ डालकर कर्नाटक कांग्रेस के क्रिकेट मैच की अंपायरिंग करने निकले। चूँकि डीके शिवकुमार कांग्रेस के आर्थिक संकटमोचक हैं इसलिए जेबवाला हाथ डीके ने पकड़ रखा है। अब बेचारे राहुल जी को एक हाथ से दोनों धड़ों का फैसला करना है।
राहुल जी जेबवाले हाथ से मुट्ठी भींचकर दूसरे हाथ को हवा में उठाने की कोशिश करते हैं। जैसे ही हाथ थोड़ा उठने लगता है, सिद्धारमैया अपना पंजा उनकी कोहनी पर गड़ा देते हैं। समय की मार देखो, एक घूसे में नारियल फोड़नेवाले राहुल गांधी, अपनी कोहनी टस से मस नहीं कर पा रहे हैं।
जेबवाले हाथ पर एक पक्ष का कब्ज़ा, हवावाले हाथ पर दूसरे पक्ष का कब्ज़ा। इस भावुक दृश्य को देखकर कांग्रेस की आँखें भीग जाती हैं। भारत जोड़ो यात्रा के प्रवर्तक एक बार अपने दोनों हाथ जोड़ना चाहते हैं लेकिन दोनों हाथ अलग-अलग दिशा में खींचे जा रहे हैं।
राहुल जी ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अपने पंजे को कांग्रेस के चुनाव-चिह्न की मुद्रा में लहराया। भावुक कांग्रेसियों को लगा कि वे पार्टी का निशान दिखाकर नेताओं को मर्यादा सिखा रहे हैं। लेकिन व्यावहारिक कांग्रेसी समझ गए कि वे दरअस्ल ‘ओके-टाटा-बाय-बाय’ कर रहे हैं।
इस नाज़ुक समय में अमित शाह यदि कर्नाटक की ओर मुँह करके खड़े भी हो जाएँ तो कांग्रेस के पसीने छूट सकते हैं। लेकिन भाजपा अभी ऐसा कुछ नहीं करेगी। वह तो चुपचाप तमाशा देख रही है कि दोनों दावेदारों में से किसे भाजपा की सदस्यता दिलानी है और कौन कुछ दिन और कांग्रेस में ही रहनेवाला है।

✍️ चिराग़ जैन

न्याय के मुँह पर जूता

भारतीय लोकतन्त्र लगभग उस मुकाम पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ से ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ के मध्य की खाई इतनी चौड़ी हो जाती है कि किसी के लिए भी दोनों ओर पैर रखकर टिके रहना असंभव हो जाए। एक ओर तन्त्र है, जो संविधान की मूल भावना से भटककर अपने-अपने वाद तथा अपने-अपने गुटों के साथ इस हद तक छितरा गया है कि अब इस ताने-बाने का हर ताना अपने बाने पर प्रतिशोध तानकर खड़ा दिखाई देता है।
दूसरी ओर है लोक, जो तन्त्र से नाराज़ रहते हुए भी सदैव तन्त्र की ओर ही आशा भरी निगाहों से देखता है। यह लोक वर्तमान में अपने-अपने ‘सोशल मीडिया समूहों’ द्वारा प्रसारित विचारधाराओं तथा नैतिकताओं का अनुसरण करते-करते इतना अंधा हो गया है कि अराजकता की सीमा-रेखा इसे दिखाई देनी बंद हो गयी है।
एक शिष्ट तथा समृद्ध लोकतन्त्र में तन्त्र, लोक की भावनाओं का सम्मान करते हुए संविधान लागू करवाता है और लोक, तन्त्र की सीमाओं को समझते हुए संविधान लागू करने में सहयोग करता है। किन्तु वर्तमान स्थितियों में कम से कम अपने देश में लोकतन्त्र का यह सौहार्द लगभग धूमिल हो चुका है। न जनता के मन में तन्त्र के लिए कोई सम्मान शेष रह गया है, न ही तन्त्र के मन में जनता के लिए कोई सौहार्द।
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका नामक तीन शक्तियाँ लोकतन्त्र के ब्रह्मा-विष्णु-महेश के रूप में लोकतन्त्र की समूची सृष्टि को सुचारू रूप से संचालित करती हैं। सृष्टि के संचालनार्थ कभी सुरों को तो कभी असुरों को वरदान दिये जाते रहे हैं। यदि किसी परिस्थितिवश कोई एक शक्ति किसी अयोग्य पात्र को अनुचित वरदान दे भी आई तो शेष दोनों शक्तियों ने अपनी बुद्धिमत्ता से उस वरदान का निदान खोजा और सृष्टि को विनाश से बचा लिया।
चूँकि मूल उद्देश्य सृष्टि का कल्याण ही है, इसलिए यदि किसी वरदान को निष्फल करने का उपाय ढूँढने में किसी शक्ति को विषपान भी करना पड़ा तो वह उससे कभी पीछे नहीं हटा। ऐसी किसी चूक का सुधार करने के लिए किसी शक्ति को अपमान भी झेलना पड़ा तो वह शक्ति उससे पीछे नहीं हटी।मैंने ‘पुरुषोत्तम’ में दो पंक्तियाँ लिखी हैं-
जब राजसभा पर राजा की निजता हावी हो जाती है
तब राजनीति की चाल अचानक मायावी हो जाती है

किन्तु वर्तमान संदर्भों में लोकतंत्र के इन त्रिदेवों के मध्य ऐसा ईगो-क्लैश जारी है कि देव और दानव अपनी समस्याएँ लेकर इनके पास जाने की बजाय अपने स्तर पर ही लड़-भिड़कर समाधान निकालने में विश्वास रखने लगे हैं।
यह परिस्थिति घातक ही नहीं, विध्वंसक भी है। यह परिस्थिति स्वीकार्य नहीं है। तन्त्र को चाहिए कि वह लोकतन्त्र के अस्तित्व को बचाने के लिए अपने-अपने वर्चस्व की लड़ाई से बाहर निकलें। और लोक को चाहिए कि स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने की बजाय तन्त्र की विवशताओं का सम्मान करना सीखे।
हमने विधायिका के चेहरे पर स्याही फेंकी, हमने राजनीति के गाल पर तमाचे मारे, हमने कार्यपालिका के साथ धक्का-मुक्की की, हमने पुलिसवालों का अपमान किया …यह सब हमेशा से होता रहा है। यद्यपि मैं व्यक्तिगत रूप से इस आचरण को भी अराजकता ही मानता हूँ। किन्तु अब जब हमने न्यायपालिका पर जूता फेंकना सीख लिया है तब मैं अपने ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ दोनों के सम्मुख यह निवेदन रखना चाहता हूँ कि अराजकता की आंधी जब आपका घर उजाड़ रही हो तो अपनी जान बचाना स्थिति-सम्मत है, किंतु अराजकता की आंधी के साथ मिलकर अपना घर उजाड़ने में सहयोग करना कोरा पागलपन है।
भारत एक सक्षम देश है। विचारधाराओं की कहासुनी इसके लोकतान्त्रितक स्वरूप को पुष्ट करती है किन्तु खरेपन और बदतमीज़ी के मध्य का अंतर करना यदि हमने अपने युवाओं को नहीं सिखाया तो हमारी यही युवापीढ़ी एक सुंदर देश को गृहयुद्ध की त्रासदी से ग्रस्त होते देखेगी।

✍️ चिराग़ जैन

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