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आचमन

आचमन, हिन्दी की वाचिक परम्परा का एक ऐसा नया पौधा है जो अपने शैशव काल में ही नन्हें अंकुरों के लिए वटवृक्ष की भूमिका निर्वाह कर रहा है। जिस दौर में कवि सम्मेलन की सरलता पर अव्यवस्थित चमक-दमक का आधिपत्य स्थापित होने लगा हो, उस दौर में सुव्यवस्थित सादगी से कवि सम्मेलन के...

अज्ञातवास

राज्य, वैभव और निज पहचान तक से हाथ धोकर चल दिये पाण्डव स्वयं के शौर्य से अज्ञात होकर वीरता के उपकरण को गौण रहना है शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है भाग्य ने क्या खेल खेला है विवशता के पलों में सूख जाने की अनोखी खलबली है बादलों में शस्त्र, जिनको प्राप्त करने के लिए...

समय के चक्रव्यूह का अथक जोधा : शैलेश लोढा

वर्ष 2005 में हिंदी कवि सम्मेलन टेलिविज़न के परदे पर नए रूप में अस्तित्व खोज रहे थे। तमाम चैनल प्राइम टाइम में कवि सम्मेलन दिखा रहे थे, लेकिन कवि सम्मेलनों का परंपरागत प्रारूप टीवी के फॉर्मेट में फिट नहीं हो पा रहा था। ऐसे में सम्भवतः 2005 में talent hunt का प्रयोग...

चिराग़ों के घर नहीं होते

सदा तो सँग तलक दर-ब-दर नहीं होते कहा ये किसने चिराग़ों के घर नहीं होते अभी असर न दिखा हो तो इंतज़ार करो हैं ऐसे दांव भी जो बेअसर नहीं होते ग़मों की धूप में नाज़ुक बदन मुफ़ीद नहीं गुलों के जिस्म नरम, सूखकर नहीं होते खुद अपना बोझ उठाने में कोई हर्ज़ नहीं पराये पाँव बहुत...
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