+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

ऐब्स्ट्रेक्ट

किसी की याद के कुछ रंग यक-ब-यक बिखर जाते हैं ज़ेहन के कॅनवास पर। और मैं ठहर कर निहारने लगता हूँ उस कलाकृति की ख़ूबसूरती को। बूझने लगता हूँ अतीत के स्ट्रोक्स की जटिल पहेलियाँ। आज तक समझ नहीं पाया हूँ कि ये ऐब्स्ट्रेक्ट बना तो बना कैसे? ✍️ चिराग़...

दिल्ली

वे भी दिन थे जब पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ अकारण ही मुस्कुरा देती थीं नज़र मिलने पर अजनबियों से भी। दरियागंज की हवेलियाँ अक्सर देखा करती थीं एक कटोरी को देहरी लांघकर इतराते हुए दूसरी देहरी तक जाते कुछ दशक पहले तक। शाहदरा के बेतरबीब मकान चिलचिलाती धूप में अक्सर दरवाज़ा...

रोटी

पेट को जब भूख लगती है तो अक्सर पाँव सबके घर से बाहर आ निकलते हैं भूख के कारण सभी प्राणी, परिन्दे, जानवर सब कीट और इन्सान तक संघर्ष करते हैं तितलियाँ लड़ती हैं अक्सर आंधियों से चींटियाँ चलतीं कतारों में निकलकर बांबियों से साँप, बिल को छोड़कर फुफकारते हैं शेर, तजकर मांद...

सच के नाम पे

दुनिया की बदसलूक़ी का तोहफ़ा लिये जिया फिर भी मैं अपने सच का असासा लिये जिया कोई महज ईमान का जज्बा लिये जिया कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिये जिया टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ इक शख़्स सच के नाम पे क्या-क्या लिये जिया जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब तब तक मैं बेग़ुनाही...

सार्थकता

सच बोलने की भी जो हिम्मत जुटा न सके ऐसी निरी खोखली जवानी किस काम की शोषण को देख नहीं लहू में उबाल आए बोलो ऐसी ख़ून की रवानी किस काम की लाज, प्रेम, करुणा की नमी यदि सूख जाए भला फिर आँख बिन पानी किस काम की जिसके निधन पे न चार नैन नम हुए ऐसे आदमी की ज़िन्दगानी किस काम की...
error: Content is protected !!