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खोते मंज़र

चाहकर भी नहीं बचा पा रहे हैं हम वह सब जो आनंदित करता है हमें तनाव के क्षणों में। क्षमा नहीं करेंगी हमें हमारी ही सन्तानें क्योंकि छीन लेते हैं हम रोज़ाना आनंद के अनिवार्य तत्व अगली पीढ़ी से …आधुनिक बनने की कोशिश में मिटा देते हैं रोज़ाना प्रकृति में बिखरे काव्यांश...

मापदण्ड

टूट गया था मैं ठीक वैसे ही ज्यों कठोर धरातल पर गिरते ही टूट जाता है कच्चा बर्तन। क्वारी-गर्भवती कन्या के मजबूर बाप की तरह कसमसा उठी थी मेरी आत्मा। जून की झुलसती गर्मी में सड़क-किनारे खड़े शिकंजीवाले की गीली रेहड़ी पर पड़े बर्फ़ के छोटे-से टुकड़े की तरह पिघल गईं थीं मेरी...

मधुमास

खण्ड-खण्ड कर रहे देश की अखण्डता को, ऐसे दुष्ट लोगों का विनाश होना चाहिए जातिवादियों के जीवन में हलाहल घुले, साम्प्रदायिकों का सर्वनाश होना चाहिए ज्वालाएँ प्रचण्ड मेरे भारत में फिर जलें, एक-एक कोने में प्रकाश होना चाहिए न हो कोई जाति न धरम कोई शेष रहे, पूरे भारत में...

इक पहेली हूँ

धूप में निखरोगे मेरी छाँव में जल जाओगे इक पहेली हूँ, कहाँ तुम ढूंढने हल जाओगे बर्फ़-सी ठंडक तो उसकी बात में होगी मगर छू लिया जिस पल उसे उस पल ही तुम जल जाओगे विषधरों के दंश का संकट भी झेलोगे ज़रूर जब कभी लेने किसी जंगल से संदल जाओगे धूप बनकर तुम दलानों में पसरते हो मगर...

आयात-निर्यात

जंगल के सभागार में बहुत बड़ा आयोजन हुआ जिसमें सर्वप्रथम भारत माँ के चित्र के सम्मुख दीप-प्रज्वलन और फिर मेंढ़क जी का स्वागत भाषण हुआ। भाषण में अजीव ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ था भाषण का सार कुछ यूँ था- “भैंसा दल के अध्यक्ष श्री कालूूप्रसाद जी! टबासीन मछलियो! रंग-बिरंगी...
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