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कल की छोड़ो, कल का क्या है

ऐसा मत सोचो कि जब सब सोचेंगे तब सोचेंगे पहले हम सोचेंगे तब ही तो इक दिन सब सोचेंगे आख़िर बंदूकों से ही जब सारे काम निकलने हैं आयत रटने से क्या हासिल अहले-मक़तब सोचेंगे दो और दो को पाँच बनाने की तरक़ीबें क्या होंगीं इस उलझन का हल कुर्सी पर बैठे साहब सोचेंगे आज जिन्हें...

क़ुसूर

सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं क़ुसूरवार हूँ कोई गुनाह्गार नहीं मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है मुझे किसी के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं ✍️ चिराग़...

दुःख

वाह के मज़मों में अक्सर मौज़ूद होती है आह भी। जैसे बहुत कुछ पा लेने पर भी नहीं मिट पाती है कसक कुछ खो जाने की। दुःख जन्मता है ख़ुशियों की कुक्षि से कदाचित् यही सिद्ध करने के लिये जलती हैं खलिहानों में रखी फ़सलें फटते हैं धरती पर उतरते अंतरिक्ष-यान मरते हैं जवान बेटे...

आदमीयत का अंदाज़ा

हम मुहब्बत का अंदाज़ा करेंगे वो हिमाक़त का अंदाज़ा करेंगे जब तलक दूरियाँ न हों शामिल कैसे चाहत का अंदाज़ा करेंगे आदमी को समझ न पाए जो क्या वो क़ुदरत का अंदाज़ा करेंगे दौरे-ग़म में कहे कोई कुछ भी सब नसीहत का अंदाज़ा करेंगे आदमी ज़िब्ह करने वाले ही आदमीयत का अंदाज़ा करेंगे ख़ुद ही...

मुझे अहसास है

किसी पत्थर से जब तूने ये हाले-दिल कहा होगा तेरी आँखों से बरबस दर्द का सागर बहा होगा मेरे दिल ने भी पीड़ा को हज़ारों बार झेला है मुझे अहसास है तूने वो ग़म कैसे सहा होगा ✍️ चिराग़...
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