Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
इश्क़ को बेदर्दियों का ख़ौफ़ है
ताज़रों को फ़र्दियों का ख़ौफ़ है
जानवर इन्सान का दुश्मन कहाँ
आदमी को वर्दियों का ख़ौफ़ है
ओस, कोहरा, बर्फ़ और ठण्डी हवा
बेघरों को सर्दियों का ख़ौफ़ है
ज़ख़्म को मरहम न मिल जाए कहीं
ज़ुल्म को हमदर्दियों का ख़ौफ़ है
मन के जज़्बातों को दुनिया में ‘चिराग़’
तन की गुण्डागर्दियों का ख़ौफ़ है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
बिना मांगे मुझे सब कुछ मिरा दातार देता है
वो दरिया है जो पत्थर को नया आकार देता है
सरे-महफ़िल मुझे जो बेवज़ह दुत्कार देता है
अकेले में वो मिलता है तो मुझको प्यार देता है
बताओ कौन है मुज़रिम, ग़रीबी या कि वो बापू
जो बच्चों की तमन्नाओं को हर दिन मार देता है
मिरे भीतर के शाइर को कोई व्यापार सिखलाए
ज़माना दर्द देता है तो ये अशआर देता है
फ़साना एक ही होता है शाइर और वीणा का
जो छेड़ो तो तड़पकर इक नई झनकार देता है
कोई कितना भी दुनिया में भटक ले, पर यही सच है
हमेशा आसरा अपना ही घर-परिवार देता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
रुके आँसू, दबी चीखें, बंधी मुट्ठी, भिंचे जबड़े
इन्हीं के तर्जुमे से मुल्क़ में विस्फोट होता है
ये बम रखने का काम अच्छा-बुरा औरों की ख़ातिर है
ग़रीबी के लिए तो सिर्फ़ सौ का नोट होता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
ग़रीबों के बच्चों की
भूखी आँखों में पलते कोरे स्वप्न
अनायास ही मिट जाते हैं
सागर-तट पर फैली रेत पर लिखे
नाम की तरह।
रेतीली चित्रकारी को मिटाने आयी लहर
हर बार दे जाती है
एक नया चित्र
सागर के तट को
ताकि
व्यर्थ न हो
यात्रा
भविष्य में आनेवाली लहर की!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
(एक)
आलीशान शोरूम के
चमचमाते शोकेस में
महंगी विग सिर पर लगाये
हज़ारों रुपये के लहंगे से सजा
इतरा रहा था पुतला।
(दो)
अंग्रेजी स्टाइल के
फास्ट-फूड कॉर्नर में
जगमगा रहा था
आकर्षक-स्वादिष्ट राजकचौरी से सजा
महंगा ख़ूबसूरत काउण्टर
…मद्धम नीले प्रकाश के साथ।
बोनचाइना के महंगे प्यालों में रखे
आइसक्रीम के सैम्पल
चांदी की प्लेटों में रखी मिटाइयाँ
और काँच के बाउल में सजी
महंगी नमकीन मिक्सचर
बढ़ा रही थी
दुकान की शोभा
और पेट की भूख!
(तीन)
चर्च की दीवार की ओट में
सिमट रही थी
बीस-बाइस साल की
सस्ती-सी ज़िन्दगी।
उलझे-बिखरे भूरे बाल
नक़ली नहीं थे
भद्दा-मैला
पुराना कुचला कुरता
ढँक नहीं पा रहा था
पाँच-साढ़े पाँच फुट का
गेहुँआ बदन।
बड़ी-बड़ी भूखी आँखें
देख रही थीं
फास्ट-फूड कॉर्नर के
आलीशान काउण्टर की ओर।
आसपास देख सहम जाती थी
लाचार जवानी
कमज़ोर हाथों से छिपा रही थी
अपना ग़रीब बदन
रह-रहकर।
और हाथ में दुपट्टा उठाए
मुस्कुरा रहा था
शोकेस में खड़ा पुतला।
✍️ चिराग़ जैन