फ़ुरसत
धूप इक रोज़ ढल ही जाती है
उम्र सूरत बदल ही जाती है
थोड़ी फ़ुरसत निकालकर देखो
ज़िन्दगी तो निकल ही जाती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
धूप इक रोज़ ढल ही जाती है
उम्र सूरत बदल ही जाती है
थोड़ी फ़ुरसत निकालकर देखो
ज़िन्दगी तो निकल ही जाती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
यूँ न समझो उदास बैठा हूँ
आज मैं ख़ुदशनास बैठा हूँ
मुझसे कोई अभी न बात करो
मैं अभी अपने पास बैठा हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
हे अर्जुन,
सूर्यास्त को देखकर
न धैर्य छोड़ो,
न धनुष;
हो सकता है
सूर्य गया हो
जयद्रथ को बुलाने!
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
मैंने काँच से सीखा है
कि
दुनिया को
सच दिखाने के लिए
छोड़ना ही पड़ता है
पारदर्शी स्वभाव
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
जो लोग कला फ़िल्मों के मापदण्ड से सी-ग्रेड सिनेमा का आकलन करने निकले हैं, उनकी बुद्धि किसी का आकलन करने के लिए सक्षम नहीं है।
वे आलोचना करने के प्रयास में विद्रूपता को प्रचारित कर रहे होते हैं और उन्हें आभास भी नहीं होता कि वे क्या पाप कर रहे हैं। सिद्धांत तो यह है कि जिसे लुप्त करना हो उसकी चर्चा बंद कर दो। किन्तु गंदगी की चर्चा न करने की चर्चा इतनी हो जाती है कि गंदगी का आकार बढ़ने लगता है।
धीरे-धीरे इस चर्चा में रस आने लगता है। फिर यह दंभ जागता है कि, “ये साले क्या अश्लीलता दिखाएंगे, हम चाहें तो इनसे ज़्यादा अश्लीलता कर सकते हैं।’ ऐसा कहते-कहते हम एक दिन चाह लेते हैं और अश्लीलता करने लगते हैं।
सात्विक प्रतिभा कला फिल्म की तरह चर्चा से बाहर अपनी साधना करती रहती है और सी-ग्रेड सिनेमा पीवीआर से लेकर ओटीटी तक पैर पसारने लगता है।
आश्रमों में रहकर कला की साधना करने वाले कुछ लोग कला के भौंडे पाखण्ड के दम पर उठती इमारतों को देखकर झल्लाने लगते हैं। नंगेपन को ‘आर्ट’ और नैतिक निर्लज्जता को ‘स्टारडम’ कहनेवालों के प्रति क्रोध से भरकर कला के शुद्ध साधक अपनी सृजनात्मक ऊर्जा को विद्रूपता के विरुद्ध व्यय करने लगते हैं।
…और यही तो विद्रूपता चाहती थी।
इसलिए उसकी चर्चा न करें जो आपको पसंद नहीं है। उस बिरवे को अपनी अनुशंसा का पोषण दें, जिसकी सुगंध आपको सुख देती है। धूल के बवंडर में उड़कर आपकी आँख में जा गिरे करकट से विचलित होकर आँखें बंद होना स्वाभाविक है किन्तु बिलबिलाकर, आँखें मसलते हुए पूरे बवंडर को गाली मत दीजिए क्योंकि वायु के इस वेग में तमाम करकट के साथ कुछ हरे पत्ते भी उपस्थित हैं जो अभी भी सुगंध के अस्तित्व को बचाने की कोशिश में बवंडर के प्रचंड वेग से असहाय जूझ रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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