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दिल की डायरी

दिल में काफी बड़ा घोटाला पकड़ा गया है। जिस विभाग को शरीर में ख़ून वितरित करने का उत्तरदायित्व दिया गया था, वह पिछले 36 वर्ष से कुछ रक्त बचाकर दिल के भीतर फेंकता रहा है। इस भ्रष्टाचार की वजह से दिल का पूरा तंत्र कमज़ोर होता रहा और अब वह अपनी क्षमता का एक-चौथाई काम ही कर पा रहा है।
जाँच कमेटी ने उक्त विभाग को बदल देने की कड़ी सिफ़ारिश की है। काफ़ी देर तक पड़ताल के बाद जाँचकर्ताओं को पता चला कि दिल बड़ा है। यह सुनकर मुझे हँसी आ गयी। छोटा रहा होता, तो कविता कैसे लिख पाता!
बहरहाल, ज़िन्दगी ने मुझे यह अवसर दिया है कि अपना दिल चीर के दिखा सकूँ। देख लेना, कुछ नहीं निकलेगा इसमें। फिर मैं डंके की चोट कह सकूंगा कि मैं कोई बात दिल में नहीं रखता।
✍️ चिराग़ जैन

मशहूर कविता, गुमनाम कवि

रचना और रचनाकार का सम्बन्ध पिता और सन्तति का सम्बन्ध होता है। यह किसी रचनाकार की सफलता का उत्कर्ष है कि उसकी कोई पंक्ति जनभाषा के मुहावरे में शुमार हो जाये। ‘अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो’ से लेकर ‘पोशम्पा भई पोशम्पा’ तक का हमारा बचपन ऐसी ही सौभाग्यशाली कविताओं की उंगली थामकर चला है। किन्तु इन कविताओं के साथ एक दुर्भाग्य भी जुड़ा हुआ है कि इनके रचनाकार का नाम इनकी लोकप्रियता के वेग में कहीं गुम हो गया है। यदि मेरे जीते जी विज्ञान ने टाइम मशीन बना ली तो ऐसी उपयोगी कविताओं के कवि को तलाशने की इच्छा ज़रूर पूरी करूंगा।
कभी-कभी लगता है कि अपने कवि के नाम के बिना दुनिया भर में घूम रही इन कविताओं के रचनाकारों के साथ अनजाने में ही सही, लेकिन बड़ा अन्याय हो गया है। मैंने अपने आसपास के भाषाई मुहावरे की पड़ताल की, तो पाया यह अन्याय आज भी बदस्तूर जारी है। बल्कि सोशल मीडिया के दौर में तो इसमें ख़ासी वृद्धि देखने को मिलती है।
कोई एक काव्यप्रेमी कवि की वॉल से कविता कॉपी करता है तो न जाने क्यों उसका माउस कविता के नीचे लिखा कवि का नाम कॉपी नहीं कर पाता। फिर वही रचना व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और न जाने किन-किन मुहल्लों में बिना नाम के घूमती-फिरती है और एक दिन कोई अन्य काव्यप्रेमी उसका ख़ूबसूरत वॉलपेपर डिज़ाइन करके उसके नीचे ग़ालिब, बच्चन या गुलज़ार का नाम चिपका देता है। इस यात्रा में और भी अनेक पड़ाव आते हैं, लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी करूंगा।
फिलहाल मैं आपको कुछ ऐसी कविताओं से परिचित करा रहा हूँ जिन्हें आप अपनी अभिव्यक्ति को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए सहज ही प्रयोग कर लेते हैं। कभी मुहावरा बनकर तो कभी लोकोक्ति बनकर ये कविताएँ हमारी बोलचाल में इतनी रच बस गयी हैं कि इनके रचनाकार का नाम जानने का हमें ख़्याल ही नहीं आता। कबीर इस प्रवृत्ति के सर्वाधिक शिकार रहे हैं। उनके कुछ दोहों की पंक्तियाँ तो बाक़ायदा मुहावरा बन चुकी हैं। आइए आपको कुछ दोहों से परिचित करवाया जाये –

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

और

करता था तो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय

शायद ही हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाये, जिसे इन दोनों रचनाओं की पहली पंक्ति याद हो। और शायद ही हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाए, जिसे इन दोनों रचनाओं की दूसरी पंक्ति याद न हो। यद्यपि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम जनजीवन में सर्वाधिक उद्धृत किये जानेवाले कवियों में कबीर अग्रणी हैं। कबीर का ही एक और दोहा है जिसकी पहली पंक्ति प्रसिद्धि को प्राप्त हुई और दूसरी गुमनामी को –

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैंठ
मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ

उर्दू शायरी में भी अनेक ऐसे मिसरे मिल जाते हैं, जो इतनी तेज़ी से लोकभाषा का मुहावरा बन गये कि उनका अपना दूसरा मिसरा ही उनकी गति का साथ न दे सका। ऐसे में ये मिसरे अकेले ही प्रचलन में आ गये। इस मुआमले में उर्दू के ग़ालिब की स्थिति भी लगभग वैसी ही है जैसी हिन्दी में कबीर की है। मिर्ज़ा ग़ालिब के कुछ मिसरे देखें –

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

इसी तरह जिगर मुरादाबादी का ये शेर देखिए –

ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

उर्दू में ऐसे और भी अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ कोई एक ही मिसरा दूर तक पहुँचा और दूसरा मिसरा अपने शायर के नाम के साथ गुमनाम रह गया। मसलन मुज़फ्फर रज़्मी का एक मिसरा लगभग रोज़ ही कहीं न कहीं पढ़ा जा रहा होता है –

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई

इसी तरह फै़ज़ अहमद फै़ज़ की नज़्म का एक मिसरा हर नुक्कड़-चौपाल पर सुनने को मिल जाता है –

और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा

दिल्ली के बाशिंदे अक्सर ज़ौक़ साहब के इस शेर का एक ही मिसरा दोहराते देखे जाते हैं –

इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़कर

कभी कोई काव्यांश किसी फिल्मी गीत में प्रयुक्त हो गया तो फिर उसके मूल रचनाकार और रचना को तलाशना और कठिन हो जाता है। मसलन तुराब ककोरबी के इस शेर का एक मिसरा ज्यों ही फिल्मी गीत में जा मिला तो अस्ल शेर याद करने की न तो किसी को फुरसत मिली न ज़रूरत ही महसूस हुई –

शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी
कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को

इसी तरह मियाँ दाद खां सय्याह के इस शेर का एक मिसरा अक्सर वक़्त-ए-शाम सुनने को मिल जाता है –

कैस जंगल में अकेला है, मुझे जाने दो
ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता ‘बबूता का जूता’ की एक पंक्ति फिल्मी गाने से जुड़ गई और मूल कवि का ज़िक्र तक करने की नैतिकता नहीं निभाई गई। जब यह फिल्म आयी थी तो इस विषय को लेकर शायद कुछ कानूनी विवाद भी हुआ था लेकिन सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की ओर से लड़नेवालों की इतनी पहुँच नहीं थी कि फिल्मी गुलज़ारों से टक्कर ले पाते –

इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में

बुल्लेशाह के लेखन पर तो ऐसी फिल्मी डकैती ख़ूब पड़ती रहती है। उनके लिखे को अपनी शायरी में फिट करके कई लोगों के चमन गुलज़ार हुए जा रहे हैं। अब बात करते हैं उन रचनाओं की जो उद्धृत तो कविता के रूप में ही होती हैं लेकिन उनके रचनाकार की सुधि किसी को नहीं आती।
एक गीत जो झण्डा फहराते समय ख़ूब गाया जाता है। बचपन में विद्यालय के महोत्सवों से लेकर दफ़्तर में स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण करने तक यह गीत हर भारतीय ने दर्जनों बार सुना भी है और गाया भी है। इस भूमिका से ही गीत के बोल आपको याद आ गये होंगे- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।’ लेकिन इस गीत के रचयिता का नाम जाननेवाले लोग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। यह अमर गीत रचा है श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने।
लगभग इतनी ही प्रसिद्धि प्राप्त करनेवाली दो पंक्तियाँ ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटनेवालों का यही बाकी निशां होगा’ भी जगदम्बिका प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ जी के नाम को पीछे छोड़कर बहुत आगे निकल गईं।
‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ गीत देश भर के विद्यालयों में रोज़ सुबह प्रार्थना की तरह गाया जाता है। यह दरअस्ल एक फिल्मी गीत है, जो अभिलाष जी ने अंकुश फिल्म के लिये लिखा था। इसके बावजूद किसी विद्यालय में विद्यार्थी तो क्या अध्यापकों तक के भीतर यह जिज्ञासा नहीं उपजती कि जिसकी रचना से दिन की शुरुआत की जाती है उसे रचनेवाला शख़्स कौन है! जो गीत भजन बन गया उसके रचनाकार का नाम ग़ायब हो जाना तो लगभग निश्चित ही है। कीर्तन मंडलियाँ और जागरण की आर्केस्ट्रा पार्टियाँ किसी भी भजन को गाते समय उसमें अपना नाम इतनी बेहूदगी के साथ घुसेड़ती हैं कि यदि मूल रचनाकार सुन ले तो स्वयं अपनी रचना पर दावा करने का विचार त्याग दे। इस प्रवृत्ति ने मीराबाई की रचना ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’ तक को नहीं छोड़ा। ‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर’ वाली पंक्ति गाते समय ‘मीरा’ शब्द को न जाने किस-किस के नाम से बदल दिया जाता है और प्रभु गिरिधर नागर चुपचाप देखते रह जाते हैं।
कुछ रचनाएँ ऐसी भी हैं जो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति ने किसी सन्दर्भ में उद्धरित कर दें तो लोग उन्हें उन्हीं व्यक्तित्वों के नाम से जानने लगे। इस क्रम में नरसी भगत की रचना ‘वैष्णव जन ते तेने कहिये’ सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह गीत महात्मा गांधी का प्रिय गीत था, किन्तु एक बहुत बड़ा तबका इसे गांधी जी का गीत ही मान बैठा है। इसी प्रकार शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की रचना ‘ना हार में ना जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं’ किसी सभा में श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने उद्धृत की तो लोग इसे अटल जी की रचना ही मानने लगे।
इसी तरह एक ग़ज़ल है, जो भारतीय क्रांति के इतिहास में रह-रहकर याद की जाती है। ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ -यह ग़ज़ल आज़ादी के दीवानों का मंत्र बन गयी, लेकिन इसके शायर, बिस्मिल अज़ीमाबादी को इसका श्रेय मिलने की बजाय इसे क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से जाना जाता है।
श्री सोहनलाल द्विवेदी जी का एक गीत भी ऐसे ही किसी भ्रम के कारण श्री हरिवंशराय बच्चन जी के नाम से मशहूर हो गया। और यहाँ तक मशहूर हुआ कि बाद में श्री अमिताभ बच्चन ने सार्वजनिक मंच पर इस बात का स्पष्टीकरण दिया कि ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ श्री सोहनलाल द्विवेदी जी की ही रचना है।
इसी प्रकार श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध की रचना ‘उठो लाल अब आँखें खोलो’ कहीं सोहनलाल द्विवेदी जी के नाम से लिखी मिलती है तो कहीं द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी के नाम से।
श्री गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ जी का एक काव्यांश ‘जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।’ इस रचना को अपने भाषण आदि में प्रयोग करने वाले लोग भी सनेही जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना अक्सर भूल जाते हैं।
राजेन्द्र राजन जी का एक क़त्अ है जो राजनैतिक तथा सामाजिक जलसों में अक्सर प्रयोग किया जाता है:

वतन की जो हालत बताने लगेंगे
तो पत्थर भी आँसू बहाने लगेंगे
कहीं भीड़ में खो गई आदमीयत
जिसे ढूंढने में ज़माने लगेंगे

इसी प्रकार जयशंकर प्रसाद जी की ये पंक्तियाँ भी जाने किस-किसके नाम से यत्र-तत्र लिखी मिल जाती हैं –

नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत-नग पगतल में
पीयूष स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में

प्रसाद जी की ही यह कविता भी भरपूर उद्धृत की जाती है-

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतन्त्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पन्थ है बढ़े चलो, बढ़े चलो

सुमित्रानन्दन पन्त जी का भी एक काव्यांश भरपूर प्रयोग किया जाता है। यद्यपि अधिकतर यह कवि के नाम के बिना ही प्रयोग किया जाता है, लेकिन इसके रचनाकार के नाम की गवाही देने वाले लोग अभी जीवित हैं-

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान
निकलकर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान

इसी क्रम में श्री गोपालदास नीरज जी के गीत का यह मुखड़ा भी ख़ूब सुनने को मिलता है-

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये

दुष्यंत कुमार का एक शेर ख़ूब रेखांकित किया जाता है, लेकिन उसे बिल्कुल सही पढ़ने वाले लोग बहुत कम हैं। कोई आकाश की जगह आसमान या अम्बर पढ़ने लगता है तो कोई सूराख को छेद पढ़कर शेर की जान निकाल देता है। शब्दों का क्रम बिगाड़कर शेर को बेबह्रा पढ़नेवाले तो बहुतायत में हैं ही। बहरहाल, यहाँ वह शेर अपने मूल स्वरूप में प्रस्तुत है-

कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो!

इन सब रचनाओं के इतर यहाँ ऐसी अनेक रचनाओं की सूची दी जा रही है, जो या तो अपने रचनाकार के नाम के बिना प्रयुक्त हो रही हैं, या किसी अन्य के नाम से चल रही हैं या फिर आधी-अधूरी और ग़लत-सलत तरीक़े से उद्धृत की जा रही हैं-

जब नाश मनुज पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है
-रामधारी सिंह दिनकर

सदियों की ठण्डी बुझी आग सुगबुगा उठी
मिट्टी, सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन ख़ाली करो, कि जनता आती है
-रामधारी सिंह दिनकर

देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो, किन्तु उकताते नहीं
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं
-अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

चार हाथ, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूकै चौहान
-चन्द बरदाई

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटि तानी थी
बूढ़े भारत में भी आयी, फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की क़ीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी
बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
ख़ुब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी
-सुभद्राकुमारी चौहान

जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करुणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
-महादेवी वर्मा

यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता जमुना तीरे
मैं भी इस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे
-सुभद्राकुमारी चौहान

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक
-माखनलाल चतुर्वेदी

होंगे क़ामयाब, हम होंगे क़ामयाब एक दिन
मन में विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे क़ामयाब एक दिन
-गिरिजाकुमार माथुर

ऐसे और भी अनेक काव्यांश हैं, जिनके मूल रचयिता का नाम कहीं समय की परतों के नीचे खो गया है। हाल ही में एक राजनैतिक दल ने एक नारा देकर देश की राजनीति का रंग-रूप बदल दिया। इस नारे के प्रचार से सत्ता परिवर्त्तन जैसा बड़ा उद्देश्य हासिल कर लिया गया। यद्यपि दावा किया गया कि यह नारा इस अभियान के मुख्य क़िरदार के मुख से अनायास ही निकला, लेकिन पुरानी कविताओं को खंगालते हुए उस नारे के दर्शन एक गीत के मुखड़े में हो गये।

जब दुःख पर दुःख हों झेल रहे, बैरी हों पापड़ बेल रहे
हों दिन ज्यों-त्यों कर ढेल रहे, बाक़ी न किसी से मेल रहे
तो अपने जी में यह समझो
दिन अच्छे आने वाले हैं
-गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’

इसी तरह वंशीधर शुक्ल जी का लिखा ‘उठ जाग मुसाफ़िर भोर भयी’ भी रोज़ कहीं न कहीं रेखांकित किया जाता है, लेकिन कवि का नाम लेने को यहाँ भी कोई तैयार नहीं होता। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी का क़दमताल गीत ‘क़दम-क़दम बढ़ाये जा, ख़ुशी के गीत गाये जा, ये ज़िन्दगी है क़ौम की, तू क़ौम पे लुटाये जा’ भी मूल गीतकार के नाम के बिना ही दुनिया भर में जोश भरने का काम कर रहा है। इस गीत का अनेक फिल्मों में भी प्रयोग किया गया है।
देश की एक प्रमुख विचारधारा की नियामक संस्था में तो यह नियम ही है कि वह जिस भी रचना का प्रयोग करेगी, उसके रचनाकार का नाम नहीं बतायेगी। इस नियम में भी एक बेईमानी झलकती है। क्योंकि उस संस्था के संस्थापकों की किताबें छापते समय इस नियम का ध्यान नहीं रखा जाता और माननीयों की किताबें सुरुचिपूर्वक उनके नाम के साथ ही छापी जाती हैं। इस संस्था के इस नियम के कारण ही राष्ट्रीय महत्व की अनेक रचनाएँ अपने रचयिता की पहचान खो चुकी हैं। समझ नहीं आता कि सर्जक का कृतज्ञता ज्ञापन करने से कौन सी नैतिकता भंग हो जाती है!
बहरहाल, जयशंकर प्रसाद की रचना ‘ले चल वहाँ भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे’; बालकृष्ण शर्मा नवीन की रचना ‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये, एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये’; अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की रचना ‘सबसे ख़तरनाक़ होता है सपनों का मर जाना’; भारतेन्दु हरिश्चंद की ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’; संत रविदास की ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’; भगवती चरण वर्मा की ‘हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले’; द्वारका प्रसाद माहेश्वरी की ‘वीर तुम बढ़े चलो’; श्याम नारायण पाण्डेय की ‘हल्दीघाटी’; भवानी प्रसाद मिश्र की ‘गीतफ़रोश’; हरिवंश राय बच्चन की ‘अग्निपथ’, ‘मधुशाला’ और ‘जो बीत गयी सो बात गयी’; मैथिलीशरण गुप्त की ‘नर हो न निराश करो मन को’ तथा ‘सखि, वे मुझसे कहकर जाते’; रघुवीर सहाय की ‘रामदास’; अल्लामा इक़बाल का क़ौमी तराना ‘सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा’; सोहनलाल द्विवेदी की ‘खड़ा हिमालय बता रहा है’; कुम्भनदास जी की ‘सन्तन को कहा सीकरी सों काम’; मजरूह सुल्तानपुरी का शेर ‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मग़र, लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया’; बशीर बद्र का शेर ‘दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है, जो भी गुज़रा है, उसने लूटा है’; मीर का शेर ‘देख तो दिल कि जां से उठता है, ये धुआँ-सा कहाँ से उठता है’; रबीन्द्रनाथ टैगोर का ‘एकला चलो रे’; नवाज़ देवबन्दी का शेर ‘उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नम्बर अब आया, मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नम्बर आपका है’; रहीम का दोहा ‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय’; कबीर के दोहे ‘निन्दक नियरे राखिये’, ‘प्रेम गली अति साँकरी’ और ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’; तुलसीदास की ‘सकल पदारथ हैं जग माही, कर्महीन नर पावत नाही’ मलूकदास जी का दोहा ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गये सबके दाता राम’ जैसी अनेक रचनाओं ने जनता की अभिव्यक्ति को रोचक तथा प्रभावी बनाने में महती भूमिका निर्वाह की है, लेकिन हमने इन रचनाकारों को श्रेय देने में पूरी ईमानदारी नहीं दिखाई।
सोशल मीडिया के इस दौर में यदि इस श्रेय देने की परम्परा का प्रादुर्भाव इस लेख के बाद हो सका, तो सृजन की इस बगिया में जड़ों की देखभाल करने वाले लोगों को अपने मिट्टी सने हाथों को देखकर क्षोभ न होगा। एक बार हमें ठहरकर यह विचार करना चाहिए कि रचनाकार को ‘कर्त्ताभाव’ से मुक्त करने के चक्कर में कहीं हम स्वयम् तो ‘कृतज्ञताभाव’ से मुक्त होकर कृतघ्न नहीं हो गये।
✍️ चिराग़ जैन

तहख़ाना

विचारों के भाजी बाज़ार से दूर,
मस्तिष्क के
पिछवाड़े वाले तहख़ाने में
भरे पड़े हैं
ऐसे हज़ारों बिम्ब
जिन्हें आँखों ने
चित्त के शिकंजे से बचाकर
यहाँ छिपा दिया था।

जब कभी
सहजता की सवारी करके
प्रिविष्ट हुआ हूँ
इस तहख़ाने में
बस तभी
बटोर लाया हूँ
…ढेर सारे बिम्ब
…ढेर सारी कविताएँ!

आपके भीतर भी होगा
ऐसा ही इक तहख़ाना;
बस इसमें
कभी मुखौटा लगाकर
मत जाना!
✍️ चिराग़ जैन

कान्हा की उंगली पर गौवर्द्धन

जिनकी कविताएँ पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है, उन सब युवाओं की पिछले दो-तीन दिन की क़वायद ने बुझती हुई आँखों में नयी रौशनी भर दी है। दिन-रात लगकर ये सब अनजान लोगों की मदद के लिये सबके आगे हाथ फैला रहे हैं।
न खाने का होश है न पीने की चिंता। बस यहाँ ऑक्सीजन, वहाँ इंजेक्शन, वहाँ डोनर, वहाँ प्लाज़्मा और यहाँ तक कि किसी के घर खाना कैसे पहुँचे इसकी भी ज़िम्मेदारी उठा ली है इन मासूम कंधों ने।
इनसे कोई पूछ ही नहीं रहा कि तुम्हारी अपनी तबीयत तो ठीक है ना! जब किसी तक मदद पहुँचाने में सफल हो जाते हैं तो इनके स्टेटस में लिखे शब्द बल्लियों उछलने लगते हैं और जब कहीं निराशा हाथ लग जाती है तो निढाल हो जाते हैं।
कोई छल-कपट नहीं है इनमें। इनके ये प्रयास किसी मन्दिर की आरती और मस्जिद की अज़ान से ज़्यादा पवित्र जान पड़ते हैं। जिसकी मदद की गुहार सुनते हैं, उसका धर्म-जाति, भाषा वगैरा कुछ भी सोचे बिना बस उसके शहर का नाम पढ़ते हैं और धड़ाधड़ सम्पर्क साधने में जुट जाते हैं। ये इस देश का असली जज़्बा है। इन्हें जिसकी सहायता करनी है, मतलब करनी है। उसके लिए डीएम से लेकर सीएम तक जिसका नम्बर मिल जाए, ये धड़ल्ले से उसे फोन खटका देते हैं। ऐसा ही देश सोचा होगा हमारे पुरखों ने।
क़ीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ी है लेकिन इस बीमारी के कारण मेरे देश की फुलवारी ने वटवृक्षों को सहारा देना सीख लिया है। इनके हौसले को बनाए रखने में जो मदद हो सके, ज़रूर कीजिये।
इन्हें ध्यान से देखो, हर बालक में एक कन्हैया दिखाई देगा जिसने अपने गोकुल की रक्षा के लिये अपनी नन्हीं उंगली पर गौवर्द्धन उठा लिया है।
इति शिवहरे, ललित तिवारी, रुचि चतुर्वेदी, प्रिंस जैन, दीपाली जैन, पार्थ नवीन, सृष्टि सिंह, प्रियांशु गजेंद्र, भूमिका जैन, सुनील साहिल, अजय अंजाम, अवनीश त्रिपाठी, स्वयं श्रीवास्तव, सुदीप भोला, रामायण धर द्विवेदी, रश्मि शाक्या, कमलेश शर्मा, अनुज त्यागी, नंदिनी श्रीवास्तव, दीपक पारीक, नीर गोरखपुरी, विनोद पाल, दुर्गेश तिवारी, कुमार सागर, पूजा यक्ष, सरगम अग्रवाल, शालिनी सरगम, गौरव चौहान, संदीप शजर, रूपा राजपूत, भावना राठौर, पल्लवी त्रिपाठी, एकता भारती, गोपाल पाण्डे, हिमांशु भावसार और न जाने कितने सारे ऊर्जावान युवा लगातार लोगों के आँसू पोंछने के लिए अपनी नन्हीं हथेलियाँ लिए उपलब्ध हैं।
इन्हें नाम की कोई चाह नहीं है। जिस तक मदद पहुँच जाए, उसके लिए की गयी मदद की गुहार वाली पोस्ट भी ये अपनी वॉल से डिलीट कर देते हैं। कई ऐसे भी हैं जो व्हाट्सएप समूहों में लगातार जुटकर लोगों की मदद कर रहे हैं लेकिन उनका नम्बर मेरे पास दर्ज नहीं है इसलिए उनका नाम तक मैं नहीं जानता।
सचमुच, ये ऐसे मदद कर रहे हैं जैसे मदद की जानी चाहिये। ईश्वर मेरे जीवन के सारे पुण्य इन सब पर बरसा दे!

✍️ चिराग़ जैन

विद्वेष और कविता

कविता मुहब्बत की ज़ुबान है। किसी भी परिस्थिति में घृणा के उद्वेग बोने का काम कविता नहीं कर सकती। कविता बलिदान का शौर्यगायन कर सकती है, किन्तु किसी को ‘किसी भी परिस्थिति में’ बलि लेने के लिए उकसा नहीं सकती।
किसी भी वाद या विचार से दूर मनुष्यता को सर्वाेपरि रखना कवि होने की प्रथम वरीयता है। राजनीति और साहित्य में मूल अंतर यही है कि राजनीति आपको मनुष्यता से दूर ले जाकर जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, विचारधारा, वाद, वर्ण, देश और नस्लों के शिकंजों में क़ैद कर लेना चाहती है, जबकि कविता आपको इन सब शिकंजों से मुक्त करके संवेदना के धरातल पर ले आने के लिए कटिबद्ध है।
हिंसा, अराजकता, बर्बरता और वैभत्स्य को हतोत्साहित करने के लिये कविता, करुणा को पोषित करती है। कविता कट्टरता की जड़ों में मट्ठा डालने के लिये रूढ़ियों का उपहास करती है। कविता भय को मिटाने के लिये खिलखिलाने की वक़ालत करती है। कविता विकारों को श्रीहीन करने के लिए श्रृंगार के गीत गाती है।
राजनीति, शक्ति के मद में अकड़ने लगे तो कविता राजनीति पर हास्य करने लगती है। समाज कट्टरता की ज़ंजीरों में जकड़ने लगे तो कविता परंपराओं को रेगमाल की तरह घिसने की पैरवी करती है।
कट्टरता की कीचड़ में पड़े समाज को सड़ांध मारते नियमों से बाहर निकालने की बजाय कीचड़ में सने लोगों के नख-शिख सौंदर्य का गान न तो शायर के लिये शोभनीय है न ही समाज के लिये।
दुर्भाग्यवश यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक धार्मिक समुदाय में घर करती जा रही है। हमारे समुदाय के व्यक्ति न ग़लत किया या सही, हम उसके साथ होंगे। हमारे धर्म के विषय में कुछ भी कहा, तो काट दिये जाओगे -कौन से धर्म में यह घृणा सिखाई गयी है भाई। क्राइस्ट की सर्वाधिक प्रसिद्ध पेंटिंग में वे ब्रेड और वाइन के साथ दिख रहे हैं। श्रीराम कंचन मृग का शिकार करने जाते हैं। नारद मुनि को बन्दर बनाकर विष्णु उन्हें स्वयंवर में भेजते हैं और उनका उपहास करते हैं। कृष्ण इन्द्र की पूजा के नियम को तोड़ने में नहीं हिचकते। कृष्ण प्रेम करते हैं। कृष्ण युद्ध में छल करते हैं। …यदि हास-परिहास से परहेज किया गया तो ये सब पौराणिक पात्र जड़ हो जायेंगे। फिर अशोक वाटिका ध्वस्त करते हनुमान जी का दृश्य दिखाकर रामलीलाएँ ठहाके न लगा सकेंगी। जैन धर्म का प्रथमानुयोग फिर किसी अंजन को ‘आणं ताणम्….’ बोलते न देख पायेगा।
इस जड़ता से बाहर आइये साहिब। धर्म कोई भी हो, कट्टरता उसके विकास के लिये सर्वाधिक घातक सिद्ध होती है। विश्वास कीजिये हमारे धार्मिक संस्कारों की जड़ें इतनी कमज़ोर नहीं हैं कि उनको अपमानित करके कोई भी उन्हें ध्वस्त करने में सफल हो जाये। जब हज़ारों मूर्तियाँ खण्डित करके कोई औरंगज़ेब सनातन मंदिरों को नष्ट न कर सका, तो संस्कारों की जड़ें तो मंदिरों की बुनियाद से कहीं अधिक गहरी होती हैं।
इस्लाम हो या वैष्णव धर्म; किसी भी ओट में मनुष्यता को भुला देना स्वीकार नहीं किया जा सकता। और हाँ, जब भी कोई शख़्स, धर्म की आड़ लेकर विद्वेष फैलाने की बात करने लगे तो समझ जाइये कि न तो वह धार्मिक है, न कवि है…. वह कोरी सियासत कर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन

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