Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आर्टिस्ट ग्रीन रूम में तैयार था मगर
इस ज़िन्दगी ने मंच का परदा गिरा दिया
जिजीविषा की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद ठहाके का हिचकी में तब्दील होना यकायक पलकें नम कर गया। ऐसा लगा ज्यों किसी ने अचानक हमारे बिल्कुल आसपास की रौनक को वीराने में बदल दिया हो। मृत्यु को बहुत नज़दीक से देखा है, इसलिए भयभीत तो नहीं हुआ लेकिन विरक्ति का एक आश्चर्यबोध मन में अवश्य भर गया।
इस ख़बर को सुनने के बाद स्वयं से देर तक वाद-विवाद हुआ। क्या हम कलाकारों का संघर्ष कभी यह विश्व समझ पाएगा? क्या सफलता-विफलता के मध्य खड़े एक कोरे मनुष्य के ललाट का लेखा पढ़ने की फ़ुरसत कभी इस जगत् को मिल सकेगी? ट्रेड मिल पर दौड़कर स्वयं को सुदर्शन बनाए रखने की क़वायद हमें क्यों करनी पड़ती है, क्या इस प्रश्न का उत्तर यह दुनिया कभी ख़ुद से मांगेगी?
दिल्ली के निगम बोध घाट पहुँचा तो राजू भाई की अंत्येष्टि में भारी भीड़ थी। इस हुज़ूम में दस प्रतिशत मीडियाकर्मी थे, जो दुनिया को अलविदा कहकर जा रहे कलाकार की अंतिम यात्रा की कुछ फुटेज जुटाने के उद्देश्य से वहाँ उपस्थित थे। दस प्रतिशत कुटुम्बीगण थे, जिनके भीतर का रीतापन माप पाना उस दिन किसी पैमाने के वश में नहीं था। पन्द्रह-बीस प्रतिशत मित्र, सहकर्मी तथा प्रशंसक रहे होंगे, जो किसी साथी के छूट जाने की अंतिम छुअन को अनुभूत करने वहाँ पहुँचे थे।
इसके अतिरिक्त शेष सभी वहाँ एक साथ कई सारे सेलिब्रिटीज़ के साथ सेल्फ़ी खिंचाने का अवसर भुनाने पहुँचे थे। मसान के भयावह सत्य में एक ओर फूलों से सजी गाड़ी में से दिवंगत राजू श्रीवास्तव का पार्थिव शरीर उतारा जा रहा था और दूसरी ओर ‘अबे देख सुरेन्दर शर्मा’; ‘ओए वो देख अशोक चक्रधर’ की उत्सुक प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए लोग अपने स्मार्टफोन में तस्वीरें उतारने में व्यस्त थे।
एक बार तो मुझे लगा कि डिजिटाइज़ेशन ने मृत्यु की भयावहता को घिनौना भी बना दिया है। लेकिन फिर समझ आया कि एक आमजन के जीवन में कलाकार का कुल अस्तित्व मनोरंजन की एक रात या सेल्फी के एक अवसर से अधिक कुछ नहीं है। मैं भीड़ से दूर एक बेंच पर बैठा सब कुछ देख रहा था, कोई मेरे साथ फोटो खिंचाने आया भी तो मैंने अपने विरक्तिसिक्त मन से उसकी इच्छा पूरी कर दी।
एक ओर मंत्र पढ़े जा रहे थे, दूसरी ओर कुछ जोशीले युवा ‘राजू भाई अमर रहें’ के नारे लगा रहे थे। एक तरफ़ कुछ आँखें भीग रही थीं, दूसरी ओर कुछ चेहरों पर इस बात की ख़ुशी थी कि कितने सारे सितारे इतनी आसानी से मिल गए।
इस आसानी की क़ीमत चुकाकर राजू भाई चिता पर लेट चुके थे। शो-बिज़ का भौंडा दिखावा ज़ारी था। छोटे-मोटे कलाकार भरे मन से इस दिखावटी दुनिया में होने का मूल्य अदा कर रहे थे और असली फनकार चिता की लपटों में लिपटा हवा हुए जा रहा था। चिता के धुएं से हवा में कुछ आकृतियाँ उभर रही थीं, मानो ठहाकों का शहंशाह हवा की मिमिक्री करता हुए दूसरे लोक में जा रहा हो…!
✍️ चिराग़ जैन
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नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी लेखक एलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन का एक उपन्यास है- ‘द कैंसर वार्ड’। इस उपन्यास में एक स्थान पर कैंसर वार्ड में भर्ती एक रोगी की पीड़ा को देखकर, उसका मन बहलाने के लिए नर्स एक गाना गाती है। गीत के बोल थे- ‘आवारा हूँ, आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ।’
यह उद्धरण आज इसलिए प्रासंगिक है कि इस गीत के रचयिता शंकरदास केसरीवाल ‘शैलेन्द्र’ की आज जयंती है। 43 वर्ष के कुल जीवन में लगभग 800 गीतों से हिंदी सिनेमा को समृद्ध करनेवाले इस कवि का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं।
बचपन में माँ की मृत्यु हो गयी। स्वास्थ्य कारणों से पिता रावलपिंडी का काम-धंधा छोड़कर मथुरा आ बसे। पिता की बीमारी ने आर्थिक स्थिति ऐसी कर दी कि भूख मारने के लिए शैलेन्द्र और उनके भाइयों को जबरन बीड़ी पिलाई जाती थी। यही ग़रीबी इलाज के अभाव में उनकी इकलौती बहन को लील गई।
रेलवे में नौकरी मिली तो लेखन और नौकरी के बीच संघर्ष छिड़ गया। खुद्दारी ऐसी कि राजकपूर को यह कहकर लौटा दिया कि मैं पैसों के लिए नहीं लिखता।
परिस्थितियाँ जब किसी सिद्धांतवादी को झुकाने कि ठान लेती हैं तो उसके परिजनों को दाँव पर लगाती हैं।
पत्नी गर्भवती थी और परिवार की आर्थिक आवश्यकताएँ बढ़ रही थीं। विपन्नता के अभिशाप से अपनों को खो चुके शैलेन्द्र ने अपने सिद्धांतों की लक्ष्मण रेखा लांघकर फ़िल्मों में गीत लिखना स्वीकार किया। ‘बरसात में हमसे मिले तुम सजन’ से प्रारम्भ हुआ यह सफ़र ‘जीना यहाँ मरना यहाँ’ की आखि़री संवेदना तक जारी रहा।
14 दिसंबर 1966 को जब इस रचनाकार ने दुनिया से मुँह फेरा तब इसके दिल में ‘तीसरी कसम’ की विफलता का विषाद और लिवर में ‘लिवर सिरोसिस’ का रोग तो था ही, साथ ही अपनों के द्वारा छले जाने का क्षोभ भी था। संवेदनशील व्यक्ति किसी पर बहुत आसानी से विश्वास कर लेता है। अपनी निश्छलता की लत के चलते बहुत आसानी से किसी के भी सामने अपना मन खोलकर रख देता है। वह व्यापार में भी संवेदना तलाशने की भूल करता है और शुद्ध व्यावसायिक लोग उसकी संवेदनशीलता का लाभ उठाकर उसके विश्वास की हत्या करते रहते हैं।
जो लोग यह समझते हैं कि शैलेन्द्र की मृत्यु 14 दिसंबर 1966 को हुई, वे केवल स्थूल दृष्टि से शैलेन्द्र को देख पाते हैं। संवेदनशील व्यक्ति जब छला जाता है, तो चला जाता है।
बाद में लोगों ने ‘तीसरी कसम’ को सेल्युलायड पर लिखी कविता कहा। बाद में लोगों ने शैलेन्द्र को सदी का कवि कहा। बाद में आलोचकों ने उन्हें संत रविदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि बताया। बाद में भारत सरकार ने शैलेन्द्र के नाम पर पूरे 5 रुपये का डाक-टिकट भी जारी किया। बाद में ‘तीसरी कसम’ मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में शामिल होकर भारत का गौरव बन गई। लेकिन बाद में हुए इस आकलन से ख़ुश होने के लिए जीवित न थे, शैलेन्द्र। व्यावसायिक छल और अपनत्व की अवसरवादिता से उत्पन्न पीड़ा से व्यथित होकर ‘मारे गए गुलफाम’।
✍️ चिराग़ जैन
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बचपन में पाठ्यक्रम में एक रेखाचित्र पढ़ा था- ‘गौरा’। इसे पढ़कर गाय के प्रति तो मन आकृष्ट हुआ ही; महादेवी जी के प्रति भी मन प्रेम से भर उठा। फिर तो मैंने खोज-खोजकर महादेवी जी को पढ़ना शुरू कर दिया। उनका गद्य मेरे लिए प्रेरणास्रोत बनता गया और उनका पद्य मेरे संवेदी तंतुओं की ख़ुराक़ बन गया।
महादेवी जी से मेरा प्रथम परिचय शब्दों के माध्यम से ही हुआ था। कई वर्ष तक उन्हें पढ़ता रहा किन्तु कभी उन्हें देखने की उत्कंठा उत्पन्न नहीं हुई। हाँ, ज्यों-ज्यों उन्हें पढ़ता; उनके प्रति प्रेम और प्रगाढ़ होता जाता था।
मैंने उन्हें पढ़-पढ़कर उनकी एक छवि अपने मन में बना ली थी, जिसमें सिर पर पल्ला किये एक सम्भ्रांत महिला का आकार-सा तो था किंतु चेहरे के नैन-नक्श की कोई मूर्ति नहीं थी। यूँ कहें कि मन इतना जुड़ गया था कि चेहरे की कभी आवश्यकता ही महसूस न हुई। उन दिनों गूगल नहीं था, इसलिए किसी साहित्यकार का चित्र देखना इतना सरल नहीं था, जितना अब है।
बहुत वर्ष बाद, एक दिन पुस्तक मेले में महादेवी जी की तस्वीर एक एलबम में देखी। देखकर मुझे कोई आश्चर्य न हुआ। बल्कि अनुभूति हुई कि दैव ने सौंदर्य के एक-एक तत्व का समावेश उनके मन के निर्माण में कर दिया, अतएव देहयष्टि के लिए सौंदर्य का कोष बचा ही न रहा होगा।
उस दिन महादेवी जी की तस्वीर को बहुत देर तक निहारा और उनकी तमाम रचनाओं को उस मुखाकृति के साथ पुनः अनुभूत किया… उस दिन से मुझे महादेवी जी से और अधिक प्रेम हो गया।
एक दिन श्री रामनिवास जाजू जी की पुस्तक डिज़ाइन करते समय मोहन गुप्त जी ने मुझे महादेवी जी का खिलखिलाता हुआ चित्र दिया। उस दिन मैंने महीयसी को पहली बार खिलखिलाते हुए देखा… मैं और अधिक प्रेम से भर उठा। उनकी खिलखिलाहट में उनकी पीड़ा और भव्य हो उठी थी। वह चित्र आज भी मेरे कोष में सुरक्षित है और उस चित्र की खिलखिलाहट आज भी पीड़ा की उस साकार मूर्ति के प्रति मुझे सम्मोहित कर देती है।
आज सब महादेवी जी के विषय में कुछ-कुछ लिख रहे हैं। मेरा भी मन हुआ… तो उनके प्रति अपनी मनोदशा यथावत लिख डाली। और हाँ, यह लिखते हुए मैं महादेवी जी के प्रति और भी अधिक प्रेम से भर उठा हूँ!
✍️ चिराग़ जैन
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अप्रैल 2002 में मैंने कवि-सम्मेलनों में कविता पढ़ना प्रारम्भ ही किया था कि रोहिणी (दिल्ली) के एक कवि-सम्मेलन में एक पतले-दुबले कवि के दर्शन हुए। देहयष्टि प्रभावी नहीं थी लेकिन उनके भीतर के कवित्व और आँखों के सम्मोहन से मैं अछूता न रह सका।
मुझे याद है कि उस दिन उस मंच का संचालन भी उन्होंने ही किया था। छोटे माइक पर अर्द्ध-पद्मासन लगाकर जब वे मसनद पर विराजित हुए तो ऐसा लगा कि विद्वत्ता साकार होकर मंच का मोर्चा संभाल रही है। मुखर हुए तो ऐसा लगा जैसे शब्दों का प्रक्षालन करके उन्हें साधकर प्रस्तुत करने का आदेश पालन हो रहा हो। कवि-सम्मेलन के बीच जहाँ कहीं हास्य का प्रसंग हुआ तो उनकी भाव-भंगिमा में शरारत घुल गयी।
उस दिन मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा और व्यंजना से आच्छादित उनके व्यक्तित्व और प्रेम की विरह धारा से निर्मित उनके कृतित्व में एक संपूर्ण कवि को अनुभूत किया। उस दिन के बाद लम्बे समय तक उनकी संगत हुई।
उनका सान्निध्य मेरे भीतर करवट ले रहे ‘कवि’ को रोचक लगने लगा। यह दौर उनके संघर्ष का भी दौर था। संघर्षशील व्यक्ति से अधिक समृद्ध गुरुकुल कोई नहीं हो सकता। सो मैं उनकी ख़ूब संगत करता और विपरीत परिस्थितियों में उनके निर्णयों की सफलता और विफलता से जीवन का पाठ पढ़ता रहता।
किसी का आकलन करना मेरी प्रवृत्ति का अंश नहीं है, सो उनकी गतिविधियों और क्रियाकलापों को कभी सही और ग़लत के तराजू में तोलने की मैंने आवश्यकता महसूस नहीं की। मेरा मत है कि हर व्यक्ति एक ‘प्रवृत्ति’ होता है, और प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। इसी कारण उनके साथ बिताए लंबे-लंबे दिन और रात में मैं कभी परीक्षक बनकर नहीं, केवल शिक्षार्थी बनकर उपस्थित रहा।
अपनी भरपूर मेधा और शब्द-मंजुषा से उन्होंने मुझे ख़ूब निहाल किया। मैंने देखा कि संघर्ष से उपजने वाली खीझ से आँखें नम करने की बजाय दंतपंक्ति को आपस में रगड़ लेना अधिक कारगर सिद्ध होता है। मैंने देखा है कि जब परिस्थितियाँ चारों ओर से आघात कर रही हों तो थककर बैठ जाने की बजाय टूटे रथ का पहिया उठाकर जूझ जाने में सफल होने की गुंजाइश बची रहती है। मैंने देखा है कि उन्होंने रथ का पहिया उठाकर दर्जनों चक्रव्यूह भेदे हैं।
जो किसी का बुरा नहीं होता वह निष्क्रिय होता है। जो सक्रिय होगा उसे आलोचना मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन अपनी आलोचना से बिलबिलाने की बजाय दोगुनी ऊर्जा से जुटे रहना किसी को कुमार विश्वास बना सकता है।
राजनैतिक जीवन हो अथवा साहित्य जगत्… डॉ कुमार विश्वास ने बुलेटिन भर-भर आलोचना झेली है। सोशल मीडिया के ट्रोलर्स की चोट सहना आसान नहीं होता। डॉ विश्वास ने वह चोट बार-बार भोगी है। जब किसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की निंदा की कोई उचित दर दुकान नहीं मिलती तो निंदक उसकी निजता के गोदाम में प्रवेश करके ‘नियरे’ आने का प्रयास करने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने न तो जनता की सिम्पैथी से उन्हें खदेड़ा न ही गोदाम पर ताला लगाया… बल्कि भरे गोदाम में उन्हें रीते हाथ बाहर लौट आने पर विवश कर दिया।
2002 से 2022 तक के इस लंबे सफ़र में मैंने उनका अपनत्व और परायापन… दोनों भोगे हैं, लेकिन इस परायेपन में भी मैंने उनसे यह सीखा है कि एक फोन कॉल से किसी भी पराएपन को अपनत्व में बदला जा सकता है।
मेरे एक शे’र को दुबई के मुशायरे में उद्धृत करके डॉ कुमार विश्वास ने मुझे यह सौभाग्य दिया है कि मुझे अज़ीम शायर जनाब अहमद फ़राज़ ने फोन करके आशीष दिया। इस बात के लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। मेरी एक क्षणिका की घुमावदार पगडण्डी को उन्होंने न जाने कितने ही लोगों तक पहुँचाया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। उनसे नाराज़ भी बहुत कारणों से रहता हूँ, लेकिन वह हमारी निजता का विषय है…!
✍️ चिराग़ जैन
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हिन्दी की वाचिक परम्परा में अनेक विभूतियों का संसर्ग मिला है। मंच पर सक्रिय होने के कारण ऐसे अनेक सितारों को स्पर्श करने का अवसर मिला है जिन्हें हमेशा दूर से ही देख सका था।
ऐसे ही एक दीप्त नक्षत्र हैं- डॉ अशोक चक्रधर। कवि-सम्मेलनीय व्यस्तताओं के बीच अनवरत सृजन तथा शोध में संलग्न रहने का फ़ार्मूला क्या है -यह मैंने अशोक जी से सीखा। उनसे मिलने पर ज्ञात हुआ कि हमें जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ करने के लिए नहीं मिला है। इसीलिए बहु-अवधान का कौशल विकसित किये बिना एक ही जीवन में ढेर सारे काम करना सम्भव नहीं है।
सामान्यतया कवि-सम्मेलनीय यात्राओं में हम लोग बातचीत और हँसी-ठट्ठा करके समय काटते हैं, लेकिन अशोक जी ज्यों ही यात्रा में निकलते हैं तो वे अपने तीन संस्करण बना लेते हैं। पहले क्लोन का काम होता है कि साथ के कवियों की बातचीत को सुनते हुए बीच-बीच में हुंकारा भरकर उसमें अपनी उपस्थिति बनाए रखे और आवश्यक होने पर उसमें पूरे मनोयोग से सम्मिलित भी हो। ठीक इसी समय में दूसरे क्लोन को प्रशंसकों की मुस्कान का प्रत्युत्तर देते हुए सेल्फ़ी और ऑटोग्राफ आदि में संलग्न रहना होता है। और इसी के समानांतर तीसरे अशोक जी अपने आईपैड या मोबाइल पर कोई लेख, स्क्रिप्ट, कविता या कांसेप्ट लिखने में जुटे रहते हैं।
इस प्रकार एक ही समय में अपने मस्तिष्क को तीन अलग-अलग दायित्वों में लगाकर वे हर पल तिगुना जीवन जी रहे होते हैं।
सृजनशील रहना या काम करना सामान्यतया लोगों की विवशता होती है। कुछ लोग इसे शौक़ बना लेते हैं और बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिन्हें काम करने का रोग हो जाता है। अशोक जी, ये तीसरी तरह के लोगों में हैं। काम करने का रोग इतना भयावह है कि उसमें अपनी मानसिक पीड़ा तो दूर, दैहिक रोग भी दिखाई देना बंद हो जाता है।
अभी हाल ही में एक दुर्घटना के कारण उनके उत्तरदायी कंधों में कुछ टूट-फूट हो गयी। कंधे का अस्थिभंग जब टीसता है तो दुनिया के समस्त कार्य अनावश्यक लगने लगते हैं। इस बात को अनुभूत करके मैंने और अन्य कवियों ने उनका हालचाल जानने के लिए भी उन्हें कम-से-कम ही फोन मिलाया कि कहीं फोन उठाने में उन्हें कष्ट न सहना पड़े। लेकिन इस एकांत का लाभ उठाकर अशोक जी ने आईसीयू में लेटे-लेटे अपने आईपैड पर अपनी नातिन के जन्मदिन की शानदार किताब तैयार कर दी।
कविग्राम में उनका एक नियमित स्तम्भ प्रकाशित होता है। गत माह उन्हें तीसरी लहर के कोरोना ने जकड़ लिया और उनके ज्वर का पारा ऊर्ध्वगामी हो गया। 20 जनवरी को मैंने उन्हें कहा कि इस बार आपके स्तम्भ के बिना अंक निकाल लेंगे, और मैं सम्पादकीय टिप्पणी में स्तम्भ प्रकाशित न होने की कोई वजह लिख दूंगा। लेकिन अशोक जी को मेरी बात अच्छी न लगी। उन्होंने मुझे कहा कि महीने की आखि़री तारीख़ तक रुक जाओ, तब तक न लिख सका तो तुम निर्णय ले लेना। मैंने पत्रिका पूरी तरह तैयार करके रख ली और 31 जनवरी को यह सोचकर उसे फाइनल पैक कर दिया कि अब अशोक जी का लेख नहीं छप सकेगा। उन्हें फोन करने से इसलिये बच रहा था कि कहीं वे लिखने का दबाव न महसूस करें। लेकिन 31 जनवरी की सुबह 10 बजे उनका फोन आया कि उन्होंने स्तम्भ लिखकर भेज दिया है। फोन पर अपनी सद्य-सृजनोपरांत उपजने वाले उत्साह के साथ उन्होंने स्तम्भ के कुछ अंश पढ़कर भी सुनाए।
वे स्तम्भ सुना रहे थे और मैं उनके बुखार का ताप महसूस कर रहा था। उस दिन मैंने एक बार फिर सीखा कि सृजनशील व्यक्ति को स्वस्थ होने के लिए आराम की नहीं काम की ज़रूरत होती है।
आज पद्मश्री डॉक्टर अशोक चक्रधर का जन्मदिन है। अपने कंधे की पीड़ा को अंगरखे से ढाँप कर वे उसी कंधे पर अपनी गर्दन टिकाए जन्मदिन की बधाइयों का मुस्कुराते हुए उत्तर दे रहे होंगे।
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भाषा से खेलने का अधिकार केवल उसे प्राप्त है, जिसने भाषा की आत्मा को स्पर्श करके उसकी संवेदना के सबसे महीन तंतुओं को महसूस किया हो। शब्द का सिंगार करके उसकी अर्थ-व्यवस्था को बलवती बनानेवालों को भाषा की समृद्धि का श्रेय मिलता है।
आदरणीय डॉ अशोक चक्रधर, उन एकाध हिंदीभाषियों में से एक हैं, जो इस श्रेय के सम्यक अधिकारी हैं। किसी कवि की रचनाधर्मिता जब कविता गढ़ते-गढ़ते, शब्द भी गढ़ने लग जाए तो यह इस बात की सूचना है कि उसकी सर्जना अपनी भाषा के शब्दकोश की सीमा के पार निकल गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि उसकी भावभूमि के लिए भाषा में उपलब्ध शब्दों का आकाश छोटा रह गया है।
इस बिंदु पर कवि कविता के साथ-साथ शब्द रचने लगता है। कभी ये शब्द आस-पड़ोस की भाषाओं से अपनी भाषा के संयोग का प्रतिफल होते हैं, तो कभी अपनी ही भाषा की पुरातन परम्परा से टटोलने पर हाथ लगते हैं, जिन्हें कवि नई साज-सज्जा के साथ पुनः लोकार्पित कर देता है। यही कारण है कि इन शब्दों का कोई विलग शब्दकोश न होने के बाद भी ये बिना समझाए समझ आ जाते हैं। ये शब्द इतने समर्थ होते हैं कि ये न केवल अपना अर्थ स्पष्ट करते हैं, बल्कि अपना सन्दर्भ तक आसानी से समझा देते हैं।
डॉ अशोक चक्रधर के सृजनलोक में ऐसे अनेक शब्द मौजूद हैं जिन्हें किसी विशेष सन्दर्भ के लिए उन्होंने बाक़ायदा रचा है। उनकी अनेक रचनाओं में निरर्थक शब्दों से अर्थ उत्पन्न होता दिखाई देता है। बच्चों की तोतली बोली में शब्द जब अपना रूप बदलकर अष्टवक्र हो जाता है, तब उसके दर्शन को पकड़कर उसे भी लिपिबद्ध करने का सामर्थ्य उनकी अनुभूति को लब्ध है।
वर्तमान में अशोक जी की रचनात्मक चेतना लोक-अभिरुचियों की चिंता से ऊपर उठकर शाश्वत साहित्य की साधना में संलग्न है। यह सृजन की तुरियावस्था है। यहाँ दैहिक पीड़ा, व्याधि, यश, लोभ और लौकिक सफलता की तमाम बेड़ियाँ छूट चुकी होती हैं। यहाँ मनुष्य लोक से मुक्ति पाकर बोध का आनंद भोगने लगता है। यहाँ कवि मुक्तिबोध होने लगता है।