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रिसाला

याद है मुझको अभी भी मैंने तुमको एक जीती-जागती कविता कहा था। सुन के तुम शरमा गई थी खिलखिलाकर हँस पड़ी थी और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए मेरी आँखों में उतर आई थी तुम। याद है मुझको कि उस लम्हा बिना सोचे ही तुमने टप्प से उत्तर दिया...

आख़िर क्यों माँ?

माँ दुनिया तुझको अक्सर ममता की इक मूरत कहती है मैं भी तेरे त्याग, नेह और वात्सल्य का क़द्रदान हूँ। लेकिन माँ इतना बतला दे तब वो सारी नेह-दिग्धता भीतर का सारा वात्सल्य कहाँ दफ़्न कर दिया था तूने जब तूने इक सच्चे दिल से दोनों हाथ बलैयाँ लेकर अपने रब से दुआ करी थी इक बचपन...
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