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फ़ुरसत

धूप इक रोज़ ढल ही जाती है उम्र सूरत बदल ही जाती है थोड़ी फ़ुरसत निकालकर देखो ज़िन्दगी तो निकल ही जाती है ✍️ चिराग़...

भूमिका

यदि कोई साहित्यकार, जनता की रुचियों के लिए अपने समाज के नैतिक स्वास्थ्य को अनदेखा कर रहा है तो समझ लीजिए कि वह औषधालय का बोर्ड लगाकर हलवाई की दुकान चला रहा है। ✍️ चिराग़...

स्वार्थ

तीर कोरे स्वार्थ के जब तरकशों से जुड़ गए बाम पर बैठे कबूतर फड़फड़ाकर उड़ गए स्वार्थ शामिल हो गया जब से हमारी सोच में पग हमारे ख़ुद-ब-ख़ुद राहे-गुनाह पर मुड़ गए ✍️ चिराग़...
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