Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
शायरी में ढूंढ लेना सिसकियों की दास्तां
चश्मे-तर की सुर्ख़ियां अख़बार से मत पूछिए
आदमी होकर सियासत में दख़ल मुम्किन नहीं
आदमीयत का पता सरकार से मत पूछिए
दुश्मनी ही कर रहे हो तो ज़रा तल्ख़ी रखो
सच बता दूँगा मैं सब कुछ, प्यार से मत पूछिए
शुक्र है आवाज़ से महरूम होती है दुआ
किस क़दर ऊबा है घर, बीमार से; मत पूछिए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
अब सही काम कर रहा हूँ मैं
अपने अंदर उतर रहा हूँ मैं
मैं कहाँ हूँ बता नहीं सकता
शायरी से गुज़र रहा हूँ मैं
चाहतें जो मुझे चिढ़ाती थीं
उनके अब पर कतर रहा हूँ मैं
जी रहा हूँ ये बात भी सच है
ये भी सच है कि मर रहा हूँ मैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
इस महफ़िल में चुपचुप बैठी एक क़लम ऐसी है जिसने
ग़ालिब से ग़ज़लें सीखी हैं, तुलसी से चैपाई ली है
अम्बर के उद्दीप्त सितारो, उसको किरणों से दुलराना
जिसने कविता के उपवन में अभी-अभी अंगड़ाई ली है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
सुबकियाँ गहरे उतर जाती हैं दिल के छोर तक
हिचकियाँ यादों में अटकाती हैं हमको भोर तक
फिक्र और चिंता को लेकर बाहर आता अट्टहास
मन की निर्मलता छलकती है नयन की कोर तक
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Nazariya, Prose, Reviews
स्त्री मन की बेलाग अभिव्यक्ति का दस्तावेज है कवयित्री संध्या यादव का सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह “चिनिया के पापा”। कुल 147 कविताओं का यह संग्रह मूलतः नारी की उन अनुभूतियों का बयान है जिनमें पीड़ादायी परिस्थितियों की स्वीकारोक्ति को वरीयता दी गई है।
इन कविताओं में कवयित्री न तो नारी मुक्ति आंदोलन की रवायत निभाते हुए पीड़ा से आज़ाद होने को छटपटाती दिखाई देती है न ही नियति के द्वारा किये जा रहे दुर्व्यवहार से व्यथित होकर भाग्य को कोसती नज़र आती है। मन की कचहरी में अपने अनुभव और चिंतन की गवाही दर्ज कराने भर का उपक्रम है यह काव्य संग्रह। यह ऐसे ही है ज्यों चोट लग जाने पर एक आह अनायास ही मुँह से निकल जाए; ज्यों छले जाने पर एक सिसकी अनायास ही आँखों से बह निकले। इसमें प्रयास करके आँसू बहाने के परिश्रम की गुंजाइश नहीं है। इसमें स्वयं को दीन-हीन दिखाने का पाखण्ड नहीं है। यही कारण है कि पीड़ा से व्यथित होने के बावजूद कवयित्री की लेखनी स्वाभिमानी तो होती दीख पड़ती है किंतु विद्रोही नहीं।
अपने उत्तरदायित्वों से विमुख होकर परदेस में विलसमग्न पति को चिट्ठी लिखते समय गिड़गिड़ाहट और दोषारोपण के स्थान पर स्वाभिमान से उत्पन्न कटाक्ष की भाषा इन कविताओं की विशेषता है। बलात्कार की शिकार किसी लड़की के साथ सामाजिक व्यवहार की विद्रूपता से पूर्व उसके परिवार के व्यवहार का नश्तर इन कविताओं की विशेषता है। ससुराल की प्रताड़ना के घिसे-पिटे जुमलों से हटकर पीहर के वीभत्स सत्य का शब्दांकन इन कविताओं की विशेषता है।
बहुओं पर हो रहे ज़ुल्म की हज़ारों कहानियां हम लिख-पढ़-सुन चुके हैं। बेटियों के अनकहे मन की आवाज़ भी बहुधा कविता की शक्ल में हमारे सामने से गुज़री है। किंतु ब्याहता बेटी के सम्मुख पीहर के भावनात्मक शोषण के कारण जो चुनौतियां उत्पन्न होती हैं उनकी प्रतिध्वनि संभवतः पहली बार इन कविताओं में आकर ले पाई है।
पुरुष की आकांक्षाओं में दिखाई देती ‘केवल’ दैहिक सुख की कामना से स्त्री मन पर जो खरोंचें पड़ती हैं उनको बयान करते समय कवयित्री साफ़गोई की चौखट तक तो कई बार गई है किंतु उसने कभी भी अश्लीलता के आंगन में प्रवेश नहीं किया। संबंधों पर से जब अपनत्व का मुलम्मा उतर जाता है तो उसके माथे पर कभी न पिघलने वाले कुछ बल पड़ जाते है। इन त्यौरियों को भी कवयित्री ने कई कविताओं में स्वीकारोक्ति के साथ स्वीकार किया है।
इस सबके बावजूद कवयित्री किसी भी सीमा तक जाकर संबंधों को निभाने की पक्षधर है। वह संबंध को बंधन घोषित कर उससे आज़ाद हो जाने की वकालत नहीं करती। वह मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को स्त्री अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह मानकर उसका उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करती।
शिल्प पक्ष की बात करें तो बिल्कुल आम बोलचाल की शब्दावली के साथ सहज प्रतीकों का प्रयोग इन कविताओं में दिखाई देता है। गांधारी की आँखों पर बंधी पट्टी को पुरुष के अहंकार का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करने में भी संध्या हिचकती नहीं हैं और गूगल पर अपने अभीष्ट की सर्फिंग से भी उन्हें कोई परहेज नहीं है। रसोईघर की सामग्री से भी वे अपनी अभिव्यक्ति के बिम्ब खोज लेती हैं और पेड़, जड़, फूल, पत्तियों से भी अपनी कविताओं की क्यारी सजा लेने में दक्ष हैं। इन कविताओं में अपने हिस्से के आधे चांद को कूरियर से भेजने की कल्पनाशीलता भी है और पुरुषवादी मानसिकता के मन में पल रही कुंठाओं का सच भी है।
किताब के सफ़हे पलटते हुए पीड़ा की साफ़गोई से उत्पन्न नकारात्मकता पाठकों को विचलित कर सकती है किन्तु इस विचलन से भी मन की परतों के उघड़ने का रोमांच कहीं कम नहीं होता। इक्कीसवीं सदी की कामकाजी महिलाओं के सामान्य जीवन में सम्मिलित विशेषता को जानने के लिए यह काव्य संग्रह कारगर सिद्ध होगा।
पुस्तक के प्रारम्भ में कवयित्री का आत्मकथ्य और प्रदीप जैन जी की भूमिका के साथ सुरेन्द्र शर्मा की विश्लेषणात्मक टिप्पणी पाठकों को पुस्तक की मूल सामग्री से जुड़ने में सहयोगी सिद्ध होगी।
कवयित्री ने अनुरोध किया है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस पुस्तक के पृष्ठ पलटे जाएं। पाठक यदि इस अनुरोध को स्वीकार कर सकेंगे तो निश्चित रूप से इन कविताओं का सेतु उन्हें रचनाकार की मनःस्थिति का पर्यटन कराएगा।
✍️ चिराग़ जैन